शनिवार, अप्रैल 08, 2017

यादख़ोर आदमी ..!!

मैं "उसे" एक लम्बे उपन्यास की तरह जीना चाहता था। पर वो मेरे भीतर एक लघु कथा की तरह रह गयी। ठीक वैसे ही जैसे कई और अलग अलग रंगों की अलग अलग नामों वाली लघु कथाएं मेरे दिल में यहाँ-वहाँ  बिखरी हुई हैं। सोचता हूँ, किसी दिन इन लघु कथाओं को करीने से लगा दूँ। सोचता हूँ, किसी दिन मैं अपने दिल के खंडहर को भी सजा लूँ। सोचता हूँ, किसी दिन यादों की ताल पर खुद को गा लूँ।  

रश्मि आ गयी और मैंने डायरी बंद करके, दराज़ में डाल कर ताला लगा दिया। मैं चाहता था कि मेरे मरने के बाद ही उसे जीवन बीमा, इस डायरी और "उसके" नाम के बारे में पता चले। उससे पहले मैं रोज़ डायरी लिखना चाहता था और रश्मि के आने से पहले उसे छुपा देना चाहता था। जैसे कोई अपराधी अपना अपराध छिपता है। जैसे कोई कपटी अपने मन का मैल। जैसे कोई डरा हुआ आदमी अपना डर। जैसे कोई यादख़ोर अपनी यादें।

तुम्हारा-अनंत    

शुक्रवार, अप्रैल 07, 2017

इसका नाम कन्हैया से बदल कर नरेंदर रख दो..!!

दयाशंकर जी बड़े देशभक्त किस्म के इंसान हैं। तन समर्पित, मन समर्पित, जीवन का क्षण-क्षण समर्पित टाइप देश भक्त। और जितने देशभक्त उतने सफाई प्रेमी भी। भारत माता की जय बोलते समय। सीना छपन हो जाता है। पहले छत्तीस होता था। इधर बीते कुछ सालों से छप्पन होने लगा है। कारण का पता लगाने के लिए मोहल्ले के वैज्ञानिक लोग रोज शाम को चार से छ : बजे तक शोध करते हैं। रिपोर्ट बन गयी है। जल्द ही सब्मिट करेंगे। 

खैर दयाशंकर जी इलाहबाद ऑर्डिनेंस डिपोट में हैं। इसलिए दफ्तर में ज्यादा काम होता नहीं है। कुर्सी  में बैठ जाते हैं और राम कथा बांचते रहते हैं। राम जी के वनवास का प्रकरण तो ऐसा सुनते हैं कि जान निकल जाए। लोग रोने लगते हैं। और बाद में दयाशंकर जी हँस-हँस के अपने इस हुनर का बखान करते हैं। कहते हैं, वक्ता ऐसा हो, जो रुला दे।  हंसा तो जोकर भी देता है। 

वो राम के अलावा राष्ट्र पर भी बेहद बढ़िया बोलते है। जब वो राष्ट्र  के बारे में बोलते हैं। तो लोगों की नसें तन जातीं हैं। लोग दौड़ कर बलिदान हो जाना चाहते हैं। अपने नाम के आगे शहीद ऐसे देखना चाहते हैं जैसे श्री लिखा हो। दो मिनट में कश्मीर से कन्या कुमारी तक का मामला सुलझा-सुलटा देते हैं दयाशंकर जी।  

तीसरा प्रेम उन्हें गाय से है। कई बार गाय के पैर छूने के चक्कर में दुलत्ती खा चुके हैं। गाय के बारे में  अपार ज्ञान है। उसकी उपयोगिता पर व्याख्यान के लिए लोग इन्हें दूर दूर से बुलाते हैं। और ये पैसे ले के जाते हैं। तो कुल मिला के, बेहद चकमदार व्यक्तित्व है दयाशंकर जी का। वक्ता, विद्वान्, देशभक्त और दार्शनिक सब साथ में। कम्प्लीट पैकेज हैं दयाशंकर जी।  

दराशंकर जी पांच बजे दफ्तर से घर आ जाते हैं। आधा घंटा चाय-वाय पी कर, साफ़ सफाई में लग जाते हैं। घर के चबूतरे और दुवारे झाड़ू लगाते हैं। घर के सामने की नाली खुद साफ़ करते हैं। और जो कूड़ा निकलता है उसे आँख बचा कर कभी शुक्ला जी के घर के सामने, कभी शर्मा जी के घर के सामने डाल देते हैं। मौका नहीं लगा तो तिवारी जी के प्लाट पर दो कदम बढ़ कर डाल दिया। सुबह जो उनके प्रवचन में अखंड भारत अफगानिस्तान तक हिलोरे मरता है वो पांच बजे के बाद अपने घर के दुआरे तक सीमित हो जाता है। उनके घर का दुवारा अखंड भारत होता है। और उसे स्वच्छ रखना उनका परम कर्त्तव्य।  पांच से आठ बजे के बीच अगर गाय दिख जाती है तो कोहनी से उसे मारते हैं। क्योंकि इस बीच गाय के  गोबर से भिन्नाए  रहते हैं। उनका चबूतरा रोज गन्दा कर देती है। 'आवारा गाय" कहींकी। लोग दूध दूह लेते हैं और हगने के लिए छोड़ देते हैं दयाशंकर दुबे के दुवारे। मरेंगे हग मारोगी ससुरी" जब भिन्नाते  हुए बोल के मारते हैं। गाय दुम उठा कर भागती है। 

रात आठ बजे तक सुपरमैन अवतार में रहते हैं दयाशंकर जी। आठ बजे नहाते हैं। गौग्रास लेकर फिर बाहर निकलते हैं। गाय माता को ढूंढ कर खिलाते  हैं। करीने से पैर छू कर आशीर्वाद लेते हैं और फिर कहीं खाना खाते हैं।  साढ़े आठ से नौ-साढ़े नौ तक कन्हैया को देशप्रेम और व्यक्तित्व विकास पर प्रवचन देते हैं। कन्हैया दस साल का उनका पोता है।  पिछले कुछ दिनों से वो उनके लिए परेशानी और दुःख का कारण बना हुआ है। वो टीवी पर हमें चाहिए आज़ादी वाले नारे उसे बहुत पसंद आ गए हैं। सुबह-शाम दौड़ दौड़ के वही रटता रहता है। दयाशंकर जी का दिल दरक जाता है। दिमाग दहक जाता है। पर क्या करें ? बच्चा है। पोता है। 

कल वो उसे राष्ट्र, भारत माता और गाय माता के बारे में बता रहे थे कि उसने दो तीन सवाल दनादन पूछ लिया। बाबा हमारा देश आदमी है या औरत ? बाबा गुस्सा गए,  क्या मतलब ? बच्चे  ने पूछा, हम इसे भारत माता कहते हैं। तो ये हमारा देश नहीं, हमारी देश होना चाहिए। वो डांटते हुए बोले, क्या ? बच्चे ने कहा, हाँ। बताइये। दयाशंकर जी चुप रहे। फिर बच्चे ने पूछा, बाबा आप गाय को माता कहते हैं  तो उन्हें मारते क्यों हैं ? गाली क्यों देते हैं ? ये सवाल सुन के दयाशंकर जी पूरी तरह भिन्ना गए।  बच्चे ने आगे एक दो सवाल और पूछे पर उन्हें कुछ सुनाई नहीं दिया। उनके कानों में बस हमें चाहिए आज़ादी, सच बोलन की आज़ादी, पढ़न-लिखन की आजादी, आज़ादी आज़ादी.......!! नारे गूंजते रहे। उन्होंने अपने बेटे अमित को आवाज़ लगाई।  अमित-अमित !! ये लौंडा बर्बाद हो रहा है। देशद्रोही हो  जायेगा ये। इसका नाम तुरंत बदलो। तुम इसका नाम कन्हैया से बदल कर नरेंदर रख दो। अबतो बस यही एक चारा है !! दयाशंकर जी बोले। और आँख बंद करके गुस्सा शांत करने लगे। 

तुम्हारा-अनंत   

वो थी रेखा..!!

वो बहुत दिन बाद मिली थी।  शादी के बाद पहली बार, ढाई साल हो गए थे, उसकी शादी को। नहीं-नहीं, तीन साल हुए थे। चौक में रहीम चाचा वाले मोड़ पर मिली थी।  मैं और रेखा बचपन के दोस्त थे। लोग रेखा-रुकसाना बहन-बहन हैं, कहते थे। और हमें लगता भी ऐसा ही था। पर जैसे जैसे हम बड़े होने लगे।  हमें लगने लगा कि जो हमें लगता था, गलत था । मेरे घर वाले मुझे डाँटते थे कि "रेखा के घर मत जाया कर" और रेखा के घर वाले रेखा को। उन्हें डर था कि मैं हिन्दू और वो मुस्लमान लड़के से इश्क़ न कर बैठें। वो इसे अपनी ज़बान में फंसना, टांगना, पटना जैसा कुछ कहते थे। सो हमारे घर वालों को डर था कि हम कहीं गैर मजहब के लड़कों से न फंस जाएँ, टंग जाएँ, पट जाएँ। इसलिए हमारा मिलना जुलना बेहद कम हो गया था। पर दिलों में हम एक दूसरे से मिले हुए थे। हमने अपना दीन, अपना नाम, अपने माँ बाप, रिश्ते-नाते खुद नहीं चुने थे पर हमने एक दूसरे को अपना दोस्त खुद चुना था। इसलिए हमें अपने रिश्ते से मोहब्बत थी।

रेखा को सीधी रेखा पर चलना पसंद नहीं था। इसलिए वो कुछ न कुछ अड़ा-तिरछा कर ही देती थी। हमें जिस तरह हिन्दू मुस्लमान लड़कों से दूर रहने को कहा गया था। हमारे मन में उनको जानने की एक अनकही सी आरजू रहा करती थी। पर हम डरते थे। इसलिए जैसा घर वाले कहते थे, वैसा ही करते थे। पर रेखा को सीधी रेखा पर चलना पसंद नहीं था, इसलिए वो वसीम भाई से प्यार करने लगी थी। ये बात उसने मुझे कभी नहीं बताई जैसे मैंने उसे कभी नहीं बताया कि मैं राहुल को चाहने लगी थी। राहुल कालेज की क्रिकेट टीम का कैप्टन था और वसीम भाई कालेज के महबूब शायर, पूरे कालेज की लड़कियां उनपर मरतीं थीं पर वो रेखा पर मरते थे. रेखा का हुस्न उनकी ग़ज़लों से बढ़ता जा रहा था और उनकी गज़लें रेखा के हुस्न से हसीन होतीं जा रहीं थीं । ये बात पहले कालेज की दीवारों के कानों में गयीं फिर रेखा के घर वालों के और फिर रेखा का कालेज आना अचानक बंद। बंद मेरा भी हो गया।  दंगों के बाद से।

दंगों में सूअर और गाय के मांस की हवा उडी। लोग रुई की तरह उड़ने लगे और जब गिरे तो लाश बन चुके थे। भीड़ लोगों की घरों  में घुसी  और घर को मकतल बना कर निकल आयी। दंगों में न हिन्दू मरे, न मुसलमान, मरे तो बस इंसान।  जो हिन्दू, मुस्लमान थे। वो चुनाव लड़े। जीते और एक मंच पर नैतिकता और शिष्टाचार के नाम पर गले मिले, मालाएं पहनी।  वसीम भाई भी उसी दंगों में मारे गए, उन्हें लगता था। वो शायर हैं तो दंगे रोक लेंगे। अपने कुछ दोस्तों के साथ चौराहे  पर कौमी  एकता पर तक़रीर कर रहे थे। और लव जिहाद के नाम पर उनसे आपसी रंजिस निकाल ली गयीं । वसीम भाई, गांधी के देश में गांधी की तरह मार दिए गए।  

उसके बाद मेरा निकाह  हुआ और रेखा की शादी हुई। और लगभग तीन साल बाद चौक में रहीम चाचा वाले मोड़ पर हमारी मुलाकात। मैंने पूछा, कैसी हो रेखा ? अच्छी हूँ, जवाब आया। ये क्या हाल बना रखा है ? तुम हो बुढ़िया लगने लगी हो! वो मुस्कुराई। और कहने लगी "किसी ने मुझे बताया था मैं बेहदहसीन हूँ, मैंने मान लिया था।  आज तुम कह रही हो, मैं बदसूरत हो गयी हूँ, बुढ़िया की तरह लगती हूँ, मैं ये भी मान लेतीं  हूँ" मैं क्या बोलूं, ये सोच ही रही थी कि रिक्शा वाला आया और वो उसमे बैठ कर हाँथ हिलाते हुए निकल गयी।  उस समय मुझे लगा, उस दिन दंगे में वसीम भाई के साथ कोई और भी मारा था।  वो थी रेखा। 

तुम्हारा-अनंत              . 

कौन बेवफा था ? क्या मजबूरियां थीं ?

उसने कहा,"मैं उसे भूल जाऊं"
मैं अपना नाम भूलने लगा और अपना पता भी। उसके जाने के बाद, मैं इधर उधर पागलों की तरह भटकता और लोग कहते, "अभी तक तो सही था नजाने क्या हो गया ?" मैं उन्हें देखता, कभी तेजी से हँसता, कभी रोता, कभी मुस्कुरा देता" मैंने एक पल में ही भविष्य में झाँक कर ये सब देख लिया। और लगभग पत्थर की तरह खड़ा रहा।

वो मेरे हांथो को अपने हांथो में लिए आसमान के उस पार देख रही थी। वो आसमान के उस पार भी देख सकती थी और मेरी आँखों के उस पार भी। इसलिए मुझे उसकी आँखों से प्यार हुआ था।

मैंने कहा, क्या तुम मुझे भूल गयी हो ?
उसने कहा, हाँ।
ये कैसे हो सकता है? तुमने कहा था मैं तुम्हारी धड़कनो में धड़कता हूँ,'लगभग चीखते हुए मैंने कहा'
मुझे सब याद है, ,'लगभग रोते उसने कहा'
कुछ देर हम दोनों चुप रहे। जैसे कोई बच्चा सहम कर शांत हो जाता है।
फिर मैंने बुबुदते हुए कहा, कह दो तुम झूठ बोल रही हो।
उसने कहा, कुछ झूठ इसलिए बोले जाते हैं कि सच पता चल जाए।
मैंने कहा, सच क्या है?
उसने कहा, हम कभी एक नहीं हो सकते।
तो झूठ क्या है? मैंने कहा।
मैं तुमको भूल गयी हूँ, उसने कहा।

उसके बाद हम उठे और वहां से अपने घरों की तरफ फिर कभी न मिलने के लिए चल दिए। बाग़ के पेड़ पौधे अगर सोच सकते होंगे तो यही सोच रहें होंगे। कौन बेवफा था ? क्या मजबूरियां थीं ?

तुम्हारा-अनंत

मंगलवार, अप्रैल 04, 2017

बोलो, मुंह तो थोड़ा खोलो..!!

बोलो, मुंह तो थोड़ा खोलो
बन के काल के जैसे डोलो
हवा बानी थीं तुम तो बहुत दिन
थोड़ा सा तूफ़ान भी होलो
देखें बदलाव को, वो कैसे रोकते हैं-2

सिर के पल्लू को परचम कर लो
अपने ज़ख्मों को मरहम कर लो
खुद को उनके बरहम कर लो
कफ़स तोड़ के अब तुम दम लो
देखें जलती आग में वो क्या झोंकते हैं-2

उठ मेरी जाँ साथ है चलना
तुम सूरज सा अब न ढालना
दर्द के पर्वत को है गलना
दहलीज़ों के पार निकलना
देखें बढ़ते कारवां को कैसे रोकते हैं-2

चूड़ियां, कंगन, बिछिया, नथिया
छेनी, खुरपी, हथौड़ा, हंसिया
बोले ज़ोर लगा के हैय्या
चलना साथ में बहिनी- भइया
मिलके सारी जंज़ीरों को अब तोड़ते हैं-2

अब न आप, न बाप से डरना
न पुण्य, न पाप से डरना
न आशीष, न शाप से डरना
न शुचिता के जाप से डरना
देखें नया फ़तवा वो क्या ठोकते हैं-2

तुम्हारा-अनंत

कफ़स-पिंजरा
नोट-"आप" को समाज के प्रतीक और "बाप"को पितृसत्ता के प्रतीक के लिए लिया गया है

सोमवार, अप्रैल 03, 2017

बाबू जी नहीं रहे..!!

-तुम आज तक कोई गिफ्ट नहीं दिए हमें !!
वो चुप था
-कोई ऐसे भी बॉयफ्रेंड बनता है क्या ?
वो फिर भी चुप रहा
- रोमांस कैसे किया जाता है, मालूम ही नहीं तुम्हे
वो फिर चुप रहा
-अब चुप ही रहोगे कि कुछ बोलेगे भी ?
वो फिर चुप रहा
-मेरी सहेलियां सही कहतीं थीं।
क्या कहतीं थीं? उसने पूछा ।
- यही कि तुमसे न हो पायेगा। अब मैं चलती हूँ। तुम बहुत बोर करते हो।
वो वहां से चली गयी और वो वहीँ बैठे-बैठे घर से आयी छोटे भाई की चिट्ठी पढता रहा। जिसमे लिखा था।

बाबू जी नहीं रहे। पिछले बरसात में उनके पैर में फरुहा लग गया था। जिसका इलाज नहीं करा सके और कैंसर बन गया। बाबू जब मरें तो आपका परीक्षा चल रहा था इसलिए हम नहीं बताये आपको। बाबू जी ही कहे थे आपको परेशान ना करें। पढ़ाई ख़राब होगा। हम यहाँ संभाले हुए हैं। चार बीघा और अधिया ले लिए हैं। इस बार कलेक्टर हो जाइएगा न भैया ? पैसा का कौनो दिक्कत हो तो बताइयेगा।
आपका
छोटुवा

वो वहां से उठा और मुनिरका अपने कमरे के लिए निकल गया।
रास्ते भर सोचता रहा पर क्या, पता नहीं !!
तुम्हारा- अनंत

गुरुवार, मार्च 30, 2017

ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है..!!

मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

एक मुट्ठी है, गहरी भारी, जिसमे कैद आज़ादी है
एक ज़ंज़ीर है, जिसमे जकड़ी भारत की आधी आबादी है
बिस्तर के भूगोल के बाहर भी दर्द का एक इतिहास मचलता है
वो देखो चुप्पी वाला सूरज धीरे धीरे ढलता है
वो दिन भी आ जायेगा जब रातो-दिन एक बराबर हों
जो अबतक राही बनीं रहीं, वो भी कभी तो रहबर हों
जो अक्सर उनके ही हिस्से में आयी
ये कैसी फूटी-फाटी किस्मत है
मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

वो हयात मांग रही है और तुम हया थामते फिरते हो
बात असल ये है कि तुम उसकी आवाज़ से बेहद डरते हो
कभी सुरक्षा, कभी प्यार, कभी दुलार दिखाते हो
नाम बदल-बदल कर तुम कितनी शाजिश करते हो
जिसने तुमको जना है प्यारे
वो तुमको मना भी कर सकती है
जिन आँखों में प्यार है प्यारे
उनमे अंगार भी भर सकती है
लोक-लाज के इस अज़ाब आडम्बर को
उसमे उलटा-पुलटा करने की भी जुर्रत है
मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

वो सर के पल्लू को अपने हांथो का परचम कर सकती है
वो अपनी आवाज़ को अपने दर्द का मरहम कर सकती है
तुम लाख करो उसको पीछे, वो खुद को तुम्हारे बरहम कर सकती है
ज़ख्म से झरते लहू को गंगा, आँख से गिरते अश्कों को ज़मज़म कर सकती है
पर उसने तुमको मोहलत दी है, कुछ टूटे न सबकुछ बच जाए
ख्वाबो और ख्यालों की दुनिया आँखों में रच जाए
ये जो प्यार से हो पाए तो बेहतर
वार्ना उसमे लड़ने और झगड़ने की भी हिम्मत है
मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

हांथो की महेंदी, आँखों का अंगार बने, इससे पहले तुम जागो
चूड़ियां, कंगन, बिंदिया, नथिया, हथियार बने इससे पहले तुम जागो
जो हथेली हाँथ मिलाने को है खुली हुई, वो मुट्ठी बन जाए, इससे पहले तुम जागो
इस दुनिया में एक लड़ाई आज़ादी वाली ठन जाए इससे पहले तुम जागो
तुम जागो क्योंकि नींद से जागना ही सबसे बेहतर है
हम सभी बराबर है प्यारे, न कोई किसी से कमतर है
बेखबरी की नींद हम सो लिए बहुत
अब नींद से जागना ही सबसे बेहतर है
मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

तुम्हारा- अनंत

बुधवार, नवंबर 18, 2015

मीरा, पिता जी और मासूम पेंटर..!!

जब आपकी एक माँ के मरने और दूसरी के पैदा होने के बीच, एक साल का भी अंतर न हो, तो आप शब्दों में व्यक्त न किया जा सकने वाला कोई एहसास भोग लेते हैं. और अपने माँ बाप की शादी में जिन-जिन लोगों को जाने का मौका मिलता है. उनके लिए मृत्यु अपनी सारी भयावहता खो देती है. और एक रुई के टुकड़े या बर्फ के गोले से ज्यादा कुछ नहीं बचती. मुझे कुछ ऐसी अजीब बातें पता चलने लगीं थी कि दुनिया मेरे लिए छोटी होती जा रही थी. और मैं जो कुछ भी आड़ी-तिरछी रेखाओं से गढ़ता था. वो सदी की सर्वोच्च पेंटिंग हो उठती थी. ऐसा मेरा मन कहता था और मैं उसे किसी को नहीं बताता था. दुनिया मेरी पेंटिंग देखती, मेरी उम्र पूछती फिर समय पर हंसती और मुझे किसी परग्रह से आया हुआ मान कर न जाने किस भाषा में बात करने लगती कि मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता. मेरे दिमाग में कुछ रेंगता रहता था और दिल में धंसता रहता था. मैं जब भी उसके बारे में लिखने की सोचता तो एक दुसरे को काटती हुई बेतरतीब रेखाएं खींचता. कभी चीखता हुआ पैर कटा घोड़ा बनता तो कभी उडती हुई मुर्दा मछली. और भी बहुत कुछ बनता था पर आप यकीन मानिए, मैं ऐसा कुछ भी नहीं बनाना चाहता था. मैं अपने दिमाग में रेंगने वाले और दिल में धंसने वाले उस जीव के बारे में लिखना चाहता था. जो मेरे साथ बड़ा हो रहा था.

मेरी एक माँ ने मुझे पैदा किया था और दूसरी को मैंने. पहली माँ को मुझे पैदा करने में जो कष्ट भोगने पड़े होंगे. मुझे उसका ठीक ठीक अंदाजा हो गया था. इस तरह मैं दुनिया का एक विशेष जीव था. जिसने अपनी माँ को पैदा करना अनुभव किया था. एक दिन मेरे पिता ने मुझसे कहा कि वो शादी करना चाहते हैं और जल्दी ही वो मुझे एक नई माँ ला कर देंगे. उनके ये शब्द उनके मुँह से निकल कर मेरे पेट में घुस गए और उस दिन के बाद मेरा पेट तबतक जलता रहा जबतक मैंने अपने पिता की बारात में बेहोश होने तक डांस नहीं किया. मुझे जब होश आया तबतक मेरी नई माँ मेरी जिन्दगी में आ चुकी थी और मेरे पेट की आग भी अब बूझ गयी थी. मेरी पहली माँ ने मुझे बताया था कि उसकी जिंदगी में जब मैं आ रहा था. तब वो भी बेहोश हो गयी थी और जबतक उसे होश आया. तबतक मैं उसकी जिंदगी में आ चुका था. उसके पेट में भी एक जलन रहती थी. जो मेरे आने के बाद ख़तम हो गयी थी. शायद किसी को अपनी जिंदगी में लाने के लिए बेहोश होना और पेट में दर्द महसूस करना जरूरी होता होगा. ऐसा मैंने अपने मन में सोचा पर किसी से कहा नहीं. 

मैं मेरी पहली माँ की तरह होता जा रहा था. जैसे वो शौकिया उदास रहती थी. वैसे ही मुझे भी उदास रहने का शौक हो गया था. उदास रहना मेरी जिंदगी का दूसरा नाम होता जा रहा था. उन दिनों मुझे आईने में मेरी शक्ल नहीं दिखती थी. मैं जब भी आइना देखता, मुझे मेरी पहली माँ दिखती. शायद इसीलिए मेरी दूसरी माँ मुझे अपनी सौत समझती थी. और शायद मैं भी उसे अपनी सौत समझने लगा था. पिता जी को नहीं मालूम था कि वो दो पत्नियों के साथ रह रहे हैं. वो मुझे अभी भी अपना बेटा ही मानते थे जबकि मैं उन्हें प्रेम में डूबी देहाती पत्नियों की तरह बेतहाशा चाहने लगा था. उनका किसी और औरत के साथ होना मुझे सौतिया जलन में झोंक देता था. मैं रात भर सुबकता रहता था और चाहता था कि पिता जी मेरे साथ सोयें. जबकि पिता जी को लगता था कि तेरह-चौदह साल के लड़के को अकेले ही सोना चाहिए. तेरह-चौदह साल की उम्र में सुहाग-सौत, पति-पत्नी, जिंदगी-मौत जैसे शब्द बेमतलब से होते हैं. पर इन शब्दों में मुझे सैकड़ों अर्थ दीखते थे और हजारों रंग भी. मैं इन शब्दों को सूंघता था और महसूस कर सकता था. जब ये शब्द मेरे दिमाग में रेंगते थे या दिल में धंसते थे. तब मैं पेंटिग बनता था. और जब पेंटिग नहीं बनता था तब जासूसी करता था और जब जासूसी नहीं करता था तो कुछ नहीं कर पाता था. इस तरह मैं इस जीवन में पेंटर और जासूस होने के अलावा कुछ और नहीं हो सकता था. मैं कहीं भी रहता था, मेरा आधा हिस्सा मेरे पिता के कमरे के बाहर ही कहीं छिपा होता था. मेरा आधा दिमाग, आधी आँख, आधा कान, और आधी आत्मा. मैं अपनी नई माँ की हर धड़कन और पुराने पिता की हर सांस की खबर रखना चाहता. ये मेरा शौक नहीं था. ये मेरी मजबूरी थी क्योंकि मैं इसके बिना जिन्दा नहीं रह सकता था.   

एक दिन, जो सप्ताह का कोई भी दिन हो सकता है, शनिवार और इतवार को छोड़ कर. क्योंकि इतवार को मैं स्कूल नहीं जाता था और शनिवार को दो पीरियड क्लास के बाद एनसीसी की परेड होती थी, इसलिए मैं गुरविंदर के साथ नीम के पेड़ के नीचे नहीं बैठ पाता था. बाकी दिन हम वहीं बैठ कर स्कूल की लड़कियों को खेलते हुए देखते थे और अपने अपने लंच करते हुए उनके शरीर पर पाइथागोरस की प्रमेय हल किया करते थे. गुरविंदर मुझसे कहता, किसी आधार पर बने वर्ग और लम्ब पर बने वर्ग का योग उसके कर्ण पर बने वर्ग के योग के बराबर होता है. मैं इस सार्वभौमिक नियम को वहाँ खेलती हुई जिस किसी लड़की पर लगता, जवाब वही होता जो गुरविंदर बताता था. इस तरह गुरविंदर मेरे लिए संसार का सबसे ग्यानी आदमी था. और मुझे लगता था कि गुरविंदर न होता तो या तो मैं अँधा होता या अनपढ़. खैर उस दिन गुरविंदर ने जो बात कही थी. उसकी जगह शैलेश, मार्टिन या फैजल होते तो वो भी वही बात करते (गोया मैंने सब का खून चख रखा था और मुझे सब के खून का स्वाद एक सा ही मिला हो). गुरविंदर और मैं चौदह साला बच्चे या लड़के थे. बाकी दुनिया की तरह हमें भी नहीं मालूम था कि हम बच्चे हैं या लड़के. जब हमें कोई बच्चा समझता था तो हम लड़कों की तरह सोचते थे और जब कोई हमें लड़का समझता था तो हम बच्चे बन जाते थे. इस तरह हम बच्चे और लड़के होने के बीच, कहीं किसी चौराहे पर खड़े थे. इसलिए हमारी बातें तलवार की तरह धारदार और हवा की तरह पारदर्शी होतीं थी. जब हम बातें करते थे तो या तो लहुलुहान होते थे या पसीने से भीग उठते थे. कभी कभी हम भाप की तरह उड़ते हुए भी पाए जाते थे, पर ऐसा कम ही होता था. हम ज्यादातर खून या पसीने में से किसी एक हो ही चुनते थे. 

चूंकि हम 1947 के चौदह साला बच्चे या लड़के नहीं थे. इसलिए हम देश और देश के एकमात्र दुश्मन पाकिस्तान की बातें नहीं किया करते थे. और न ही हम 1975 में चौदह साल की दहलीज पर पहुंचे थे. जो हम आजादी और कैद की बातें करते. हम 1991 से 2000 के बीच भी कहीं नहीं थे. जो हम जय श्री राम और अल्ला-हू-अकबर के नारे लगाते, मंदिर और मस्जिद की बात करते. तोगड़िया और बुखारी का नाम लेते, शाहरुख खान का रोमांस और माधुरी दीक्षित के फिगर की बातें करते, कारगिल के शहीदों के लिए आंसू बहाते या मल्टीनेशनल कंपनी और भूख के बारे मे सोचते. हम 2012 के चौदह साला लड़के थे. इस समय तक इंटरनेट कामधेनु का दूसरा नाम हो चुका था और बाबा गूगल से जो भी मांगो वो तुरंत ही देने की क्षमता रखते थे. मानो बाबा ने करोड़ों वर्ष तपस्या करने के बाद ये शक्ति अर्जित की हो और सबको मनचाहा वरदान देने के लिए विश्व यात्रा में निकल पड़ें हो. वो हमारे देश भारत में भी आ पहुंचे थे. ये बात अलग है कि भारत में उनकी पहुँच (या उन तक पहुँच) सौ में से दस लोगों तक ही थी. इसमें गूगल बाबा का कोई दोष नहीं था. ये उन नब्बे लोगों का अपराध था. जो अबतक रोटी की कैद और आधारभूत जरूरत की ज़ंजीर में जकड़े हुए थे. ये वो लोग थे जो 1991 के बाद शुरू हुई अंधी दौड़ में पीछे छूट गए या योजनाबद्ध तरीके से छोड़ दिए गए थे. ये लोग गावों, कस्बों और छोटे शहरों में रहते थे. पर हम तो दिल्ली के रहने वाले थे. और हमारे बापों ने इतनी उड़ान भर ली थी कि हमें रोटी कपडा और मकान सुनने पर किसी फिल्म की याद आती थी और हम हँसने लगते थे. 

ये समय इंदिरा गांधियों और मोरारजी देसाइयों का नहीं था बल्कि सोनिया गांधियों और मोदियों का था. ये समय टाटाओं और बिरलाओं का नहीं या बल्कि अदानियों और अम्बानियो का था और न ही ये समय रामायणों, महाभारतों और शक्तिमानों का था बल्कि ये समय बिग बॉसों, रोड़ीजों और इमोशनल अत्याचारों का समय था. इसलिए गुरविंदर ने मुझसे पूछा- मेरी नई माँ की उम्र क्या है ? मैंने कहा यही कोई 23-24 साल होगी. गुरविंदर का चेहरा ब्लैकबोर्ड की तरह हो गया और उसने अपने होंठों से अपने चेहरे पर लिखा. तेरी माँ का फिगर क्या होगा ? मैंने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया. इसकी दो वजहें थीं. एक तो ये कि अगर मैं उसके इस सवाल का जवाब दे देता तो कहानी रेलवे स्टेशनों पर बिकने वाली पत्रिकाओं में छपती और कुंठित लोगों के दिमाग में बहुरंगी चित्र बनाने के काम में आती और दूसरी वजह ये थी कि मैंने मीरा को कभी इस तरह नहीं देखा था. इसलिए मुझे वाकई नहीं मालूम था की उसका फीगर क्या है ? मेरी नई माँ का नाम मीरा था. अब जब मैंने उसका नाम आपको बता ही दिया है तो मैं आगे से इस कहानी में उसे मीरा ही कहूँगा. क्योंकि गुरविंदर की बात सुनने के बाद मैं उसे माँ नहीं कह सकता. 

तो क्योंकि मैंने मीरा को गुरविंदर की नज़र से कभी नहीं देखा था इसलिए मैंने गूगल बाबा से कहा “मीरा एमएमएस स्कैंडल” और एक ही पल में विश्व भर की लाखों मीराओं का उनके प्रेमियों या होटलों द्वारा छले जाने का दस्तावेज मेरे सामने था. मैंने जितने भी वीडियो देखे सब में लड़कियों का चेहरा मीरा के जैसे था. इस तरह मैंने एक ही वीडियो को कई बार देखा और जब मुझे महसूस हुआ कि मेरे दिमाग और दिल में पलता हुआ जीव तेज तेज कदम ताल करने लगा है. तो मैंने कंप्यूटर बंद कर दिया और पेन्सिल से कागज पर एक वार किया. कागज पर एक रेखा बनी गोया किसी ने किसी का चेहरा काट दिया हो. फिर दूसरी, फिर तीसरी, चौथी..आपस में काटती हुई रेखाएं बनाता चला गया. और जब कागज पूरी तरह लहुलुहान हो गया तो मैंने देखा कि कागज पर एक निवस्त्र औरत है. जिसका कोई चेहरा नहीं है. चेहरे की जगह एक सन्नाटा है. और वो बर्फ के खेत में आग बो रही है. दूर एक चौदह साल का लड़का है. जो उसी आग में जल रहा है. चित्र में पानी भी है पर उसे एक तीसरे आदमी ने जंजीरों में जकड़ रखा है. पानी लड़के को खा जाना चाहता है और लड़का पानी को पी जाना चाहता है. पर न पानी लड़के तक पहुँच पाता है और न लड़का पानी तक. लड़का चीखता है और चीखता ही जाता है. उसकी हर चीख पर आसमान में उड़ता हुआ एक पक्षी गिर कर मर जाते है या मर कर गिर जाता है. लड़का भूखा है इसलिए वो उसे खुद के शरीर से उठती हुई लपटों में भूझ कर खाता है. इस बीच पिता जी आ जाते हैं और पूछते हैं, क्या हुआ ? मैं कहता हूँ, दर्द. वो मेरा माथा छूते हुए पूछते हैं, कहाँ ? मैं उनको दर्द की जगह नहीं बता पाता. क्योंकि मुझे भी नहीं मालूम था कि दर्द कहाँ हो रहा है. उनकी नजर कागज पर बने चित्र पर पड़ती है. उनका अगला सवाल होता है. ये क्या है ? मुझे जो दीखता है. उन्हें वो कागज पर नहीं दीखता. न वो निवस्त्र लड़की, न आग, न पानी को कैद किये हुए आदमी, न जलता हुआ लड़का और न ही मरते हुए पक्षी. मैं जवाब देता हूँ. ये मैं हूँ. तो वो इतना डर जाते हैं मानो 1984 की किसी शाम दिल्ली की सड़कों पर पगड़ी बाँध कर निकलें हो या 2002 के किसी दिन अहमदाबाद की सड़कों पर सफ़ेद जालीदार टोपी पहन कर. मैं उनसे कहता हूँ, मैं सच कह रहा हूँ गौर से देखिये, ये मैं ही हूँ. पिता जी के चेहरे पर एक अनजाना रंग उभरता है और वो कहते हैं कि मैं रहस्यमय होता जा रहा हूँ. ये सुन कर सूरज डूब जाता है और शाम रात में बदल जाती है.   

उस दिन के बाद कहानी में वो दिन आता है जब मैं स्कूल से पैदल वापस आ रहा हूँ. बस मैंने इसलिए छोड़ दी क्योंकि मैं उसे छोड़ना चाहता था. धूप थी पर उसमे काँटों की चुभन नहीं थी. और न रेशम की छुअन. सूरज न जल ही रहा था और न बुझा ही था. वैसे कहानी में ये दिन आने से पहले मेरी जिंदगी में और भी बहुत से दिन आए थे. पर उनका कहानी से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था. मैंने वो सारे दिन जासूस, पेंटर और गुरविंदर का दोस्त बन कर काटे थे. स्कूल में लंच टाइम में हमने नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर लड़कियों को पहेलियों की तरह देखा था और ज्यामिति की कई सारी प्रमेय हमने कल्पना के सूने कमरे में बैठ कर लड़कियों के कोरे देह पर हल की थी. उन सारे दिनों में गुरविंदर ने मुझे कई सारे रंगों से रंगा था. मुझें कई आँखें दी थी. मेरे शरीर के कई रहस्य मुझे बताये थे और मेरी आत्मा को अलग-अलग परिभाषाएं दी थी. मैं जिस राह से गुजर रहा हूँ वो एक सूनसान रास्ता है. रास्ते के दोनों तरफ बंगले हैं और बंगलों के आगे अशोक, नीम और पीपल के पेड़ों की कतारें हैं. मेरे मन में एक ख्याल आता है “अगर गुरविंदर न होता तो मुझे ‘मैं’ कौन बनता ?” मुझे गुरविंदर पर प्यार आता है और मैं अपने बालों में हाँथ फेर लेता हूँ. मेरे दिल में दूसरा ख्याल आता है कि “जीना एक भ्रम है और हम सभी भ्रम में हैं इसीलिए जी रहे हैं” ये ख्याल वहाँ की हवा में घुल जाता है और हवा का चेहरा उतर जाता है. रास्ते में खड़े पेड़ और राह पर पड़े कंकड़ मुझे यूं देखते हैं गोया मैं कोई दार्शनिक हूँ. और मैंने जो बात कही है या सोची है उसे जानने के बाद इन्हें मोक्ष मिल जायेगा. सभी पेड़ और कंकड़ आत्माओं की तरह आकाश में उड़ जायेंगे. और मैं बिलकुल अकेला बचूंगा. बंगले और उसमे रहने वालों को मैं अपने साथ नहीं मानता था. वो सभी मेरे लिए पारदर्शी थे और मैं उनके लिए. घर पहुँचने से पहले जो आखरी बात मैं सोचता हूँ उसमे गुरविंदर मुझसे कहता है (जब वो कह रहा होता है तब उसके चेहरे पर इन्द्रधनुष बना है) कि मीरा एक नागिन है और मेरे पिता एक अजगर. एक नागिन एक अजगर के साथ कभी खुश नहीं रह सकती. इसलिए वो अपने नाग को पागलों की तरह तलाशती होगी. वो मुझसे कहता है कि मैं भी एक नाग हूँ ये बात मुझे मीरा को बता देनी चाहिए. मैं बुझते हुए दीपक की तरह फडफडाने लगता हूँ और मेरी फडफडाहट की वजह गुरविंदर समझ जाता है. वो मुझे खुलकर बताता है कि मुझे क्या करना चाहिए. अब मैं देखता हूँ कि गुरविंदर का चेहरा आईने की तरह हो गया है और मेरा चेहरा उसके चेहरे में उतर आया है. वो मुझसे कहता है कि वो “मैं” बनना चाहता है पर उसकी किस्मत मेरी तरह नहीं है इसलिए वो मैं नहीं बन सकता. और चूंकि मैं, ‘मैं’ हूँ इसलिए मुझे ‘मैं’ होने का पूरा फायदा उठाना चाहिए. मैं अब घर पहुँच चुका हूँ. पिता जी आफिस से जल्दी आ गए हैं. वैसे उनका आफिस उनके फोन पर ही रहता है. वो प्रापर्टी डीलर हैं और कहीं भी, कभी भी करोड़ों की डील कर सकते हैं. पर पिता जी रोज सुबह 10 बजे आफिस निकल जाते हैं और शाम सात बजे से पहले कभी नहीं आते. और जिस दिन सात बजे नहीं आते उस दिन वो अगली सुबह ही घर आते हैं. तो मेरे एक कुंटल के गोल चेहरे वाले पिता जी ने मुझे देख कर एक गहरी मुस्कान अपने चेहरे पर चढ़ा ली. और पूछने लगे, कैसा रहा दिन ? और आज मैं बस से क्यों नहीं आया ? मैं उन्हें सब कुछ साफ़ साफ़ बता देना चाहता था. और पूछ भी लेना चाहता था कि क्या वो अजगर हैं ? और मीरा नागिन ? और ये भी कि क्या अजगर के साथ नागिन नहीं रह सकती. पर मैंने कहा, इंडिया मैच जीत जाएगी. पिता जी ने टीवी की ओर देखा और खुश हो गए. शायद धोनी ने छक्का मारा था. पिता जी धोनी को आशीर्वाद देने लगे तो मैं सीधे अपने कमरे में चला गया. मैंने कमरे में लाईट जलाई और अपने सारे कपडे उतार दिए. मैंने पागलों की तरह अपने भीतर रह रहे नाग को तलाशा और जब वो मिल गया जी भर के उसे प्यार किया. मैंने उससे कहा कि मैंने उसे पहचान लिया है. और जब भी मौका मिलेगा मैं उसके साथ न्याय करूँगा. बाहर टीवी पर इस वक़्त प्राईम टाइम डीबेट चल रही थी और कोई टकला आदमी कह रहा था कि अगर इस बार पाकिस्तान और भारत का युद्ध हुआ तो पाकिस्तान भारत को आधे दिन में मिटा कर रख देगा. और पहला परमाणु हमला दिल्ली पर ही किया जायेगा. डीबेट पैनल में बैठे सभी लोग हंसने लगे और मेरे पिता जी को सबसे ज्यादा हंसी आई थी मानो उन्हें लगा हो कि अगर वो इस बात पर नहीं हँसेंगे तो मर जायेंगे. मैंने दराज से एक डायरी निकली और उस टकले की बात डायरी में समय, तारीख और दिन के साथ नोट कर ली. उस दिन मैंने खाना नहीं खाया और सोने का बहाना करके अपने बिस्तर पर सो गया.

चूंकि मैं बहाना करके सोया था इसलिए रात में जब मेरे 44 साल के पिता और मेरी 24 साल की मीरा कमरे में गए. तो मैं अपनी कॉपी और पेंसिल लेकर दरवाजे के बाहर, दरवाजे पर हुए एक इंच के छेद पर अपनी आँख रख कर बैठ गया. मैं जान लेना चाहता था कि क्या वाकई मेरे पिता जी अजगर हैं. मीरा के बारे में मुझे पता चल गया था कि वो नागिन ही है. पिता जी ने कमरे में घुसते ही लाईट बुझा दी और मुझे सबकुछ साफ़ साफ़ दिखने लगा. क्योंकि मैं आजकल आवाज़ों को देखने लगा था और दृश्यों को सुनने लगा था. 

पिता जी ने कहा- मीरा, तुम्हारे बाल अँधेरे के जंगल हैं और इसमें सैकड़ों घोड़े अपना रास्ता भूल कर बेतहाशा दौड़ रहे हैं. मीरा ने एक मरी हुई सांस ली और मैंने देखा एक खट्टी से उदासी चारो तरफ फैल गयी पिता जी की आँखों ने कहा “मीरा तुम्हारा बदन चाँदी का है” और उनका हाँथ बोला “संगमरमर की सारी चिकनाई तुम्हारे बदन ने चुरा ली है मीरा”.

मीरा ने न पिता जी की आँखों की बात सुनी और न हांथों का कहा माना. पिता जी जैसे जैसे मीरा को उसके शरीर की विशेषता और परिभाषा बताते गए. मीरा पत्थर होती गयी. पिता जी को इसबात से कोई फर्क नहीं पड़ा. और वो अजगर की तरह मीरा के बदन को जकड़ते चले गए. मीरा अपनी आँखें कभी अलमारी पर टिकाती, कभी रोशनदान पर रख देती. कभी कमरे की छत पर चिपका देती. उसकी आँखें जबतक अलमारी, छत और रोशनदान से होती हुई दरवाजे के छेद से बाहर आई तबतक मैंने कमरे की सारी आवाज़ों को पेन्सिल से कागज पर कैद कर लिया था. मीरा ने पिता जी के कानों में कुछ कहा और पिता जी का ढाई किलो का चेहरा तेजी से दरवाजे की ओर मुड़ा. कोई आवाज़ नहीं हुई इसलिए मुझे कुछ दिखा भी नहीं. अगले क्षण पिता जी दरवाजा खोले मेरे सामने खड़े थे. और जो दृश्य था उसने मुझसे कहा कि मुझे मर जाना चाहिए पर मैंने कागज पर पेन्सिल से अंतिम वार किया और चित्र बन गया.

यहाँ क्या कर रहे हो ? पिता जी ने कहा, मैंने कागज पिता जी के हांथों में दे दिया. उन्होंने दो सेकेण्ड कागज हांथों में पकड़ कर महसूस किया उन्हें न जाने क्या महसूस हुआ कि वो पसीने से भीग गए. उनका शरीर थर थर काँप रहा था. मीरा अन्दर उन्नींदी सी पड़ी थी जैसे कोई नागिन केचुल उतारते हुए पड़ी रहती है. मीरा के भीतर की नागिन ने मेरे भीतर के नाग को पहचान लिया और पिता जी ने भी जान लिया कि अब मैं बच्चा नहीं रहा. 
पिता जी ने फिर सवाल किया:- तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? इस बार उनकी आवाज़ इतनी जोर से चुभी कि मैं रोने लगा. उन्होंने अपने हांथों में अटके हुए कागज को देखा. जिस पर एक औरत जिसका आधा शरीर नागिन का है. एक बड़ी सी चट्टान पर पड़ी है. उसके शरीर पर एक अजगर लिपटा हुआ है और चट्टान के नीचे एक 14-15 साल का लड़का दबा पड़ा हुआ है. पिता जी का मन हुआ कि वो कागज फाड़ कर फेंक दें. पर उन्होंने उसे अपनी जेब में रख लिया और बोले “हे राम”.  उन्होंने हे राम ऐसे बोला जैसे किसी ने उन्हें गोली मार दी हो. उन्होंने मेरे बाल पकडे और दो तमाचे लगाये. मेरे मन ने कहा कि मैं बीमार हूँ और मुझे बेहोश हो जाना चाहिए. मुझे तुरंत बुखार आया और मैं बेहोश हो गया. उस समय पिता जी की घडी ने रात के 2 बजाये थे और सुबह 5 बजे जब मुझे होश आया तो मैं अपोलो हास्पिटल के कमरा नंबर 12 में पड़ा था. मैं इस प्राइवेट कमरे में प्राइवेट नर्स के साथ था. पिता जी मुझे भर्ती करा कर चले गए थे. ऐसा मुझे उस सांवली मगर खूबसूरत नर्स ने बताया. जिसका नाम मैंने तबतक नहीं पूछा जबतक मैं हास्पिटल से घर नहीं चला आया. मैं हास्पिटल में तीन दिन रहा और चूंकि मैं मंगलवार की सुबह 3 बजे भर्ती हुआ था इसलिए मुझे शुक्रवार को शाम 3 बजे डिस्चार्ज किया गया. मैंने सोचा कि पिता जी से डाक्टर ने जाते वक़्त कहा होगा कि उन्हें मुझसे ख़ूब बातें करनी चाहिए. मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ और अकेलापन मेरी बीमारी की वजह है. पर डाक्टर ने पिता जी से कहा था कि अब सब कुछ ठीक है और उन्हें फिकर करने की कोई जरूरत नहीं है. पिता जी रोज हास्पिटल में तीन दिन तक शाम 3-4 बजे के बीच मुझसे मिलने आते थे. और बस एक ही बात कहते थे “बेटा मीरा तुम्हारी माँ है” मैं उनसे न जाने क्या कहना चाहता था कि मेरी भाषा मुझे बहुत छोटी जान पड़ती थी और मैं चुप रह जाता था. एक दो बार रोया भी था. रोने पर पिता जी को एक अजीब सी ऊब होती थी और वो कहते थे कि ये रोने की नहीं सोचने की बात है. मैं उन्हे अब कैसे बताता कि मैं बस वही करता रहता हूँ. रातो-दिन सोचना. पर क्या सोचता हूँ मुझे खुद भी नहीं मालूम. 

पिता जी ने जब पहले दिन मंगलवार को दोपहर 3.30 बजे मेरे माथे पर हाँथ रखकर कहा था कि “बेटा मीरा तुम्हारी माँ है” तो मैंने उनके जाने के बाद मीरा और माँ दोनों को काफी देर तक याद किया. बीच बीच में मुझे अपनी और पिता जी की भी खूब याद आई थी. खुद को याद करना सैनाईट चाटने जैसा कुछ होता है. उसदिन मुझे ये बात पता चली थी. मैं पिता जी के जाने के बाद कागज पर पेन्सिल से अपनी बात उतारता रहा और जब मैं कार पर पिछली सीट पर पिता जी के साथ बैठा था और घर अभी एक किलो मीटर ही दूर था पिता जी ने फिर एक बार दोहराया “बेटा मीरा तुम्हारी माँ है” मुझे एक गहरी कोफ़्त हुई और मैंने ये जानते हुए भी कि पिता जी को कुछ समझ नहीं आता. मैंने जेब से वो कागज का टुकड़ा निकाल पर पिता जी के हांथों में दे दिया. जिसमे तीन निवस्त्र औरतें इस तरह आपस में जुड़ीं हुईं थीं कि धनुष बन गयीं थीं. ये धनुष एक निवस्त्र आदमी के हांथ में है. जो अँधेरे के एक पहाड़ पर खड़ा है और आकाश की तरफ देख रहा है. बारिश की बूंदों का अपहरण करके उन्हें जमीन के भीतर आग की छोटी कोठरियों में कैद कर दिया गया है. पहली औरत का चेहरा मेरी माँ से मिलता है और दूसरी औरत का चेहरा मीरा की तरह है और तीसरी औरत मेरी तरह लगती है. निवस्त्र आदमी की शक्ल पिता जी से मिलती है. 

मैं कागज पिता जी को दे कर गाडी से बाहर  देखने लगा और पिता जी को भी कागज हाँथ में लेते हुए जाने क्या हुआ कि उनकी आत्मा गाडी से बाहर कूद गयी और वो मरे-मरे से लगने लगे. हमने तबतक बात नहीं की जबतक ड्राईवर ने कार का दरवाजा खोलकर नहीं कहा “साहब ” घर आ गया है. मैं कार से बाहर निकला और अपने कमरे में जाने से पहले मैंने पिता जी से पूछा:- “हॉस्पिटल वाली लड़की का क्या नाम था ?” पिता जी ने एक शब्द में जवाब दिया माधुरी. मैं “अच्छा नाम है” कहते हुए, अपने कमरे में चला गया.

उस दिन के बाद मैं मीरा को माँ कहता रह और मीरा मुझे बेटा. जब मैं मीरा को माँ कहता था. तो मीरा को हंसी आती थी और मुझे कोफ़्त. और जब मीरा मुझे बेटा कहती थी तो मुझे हंसी आती थी और मीरा को कोफ़्त. पर हमारी हंसी और कोफ़्त के बीच पिता जी हमेशा हँसते हुए पाए जाते थे. मैंने चार महीने तक न कोई चित्र बनाया और न ही जासूसी ही की. इस बीच मैंने गुरविंदर से भी बात नहीं की. इसलिए उन चार महीनों में मैं जिन्दा था इस बात का मैं कोई सुबूत नहीं दे सकता. मुझे मीरा को माँ मानने के लिए रोज एक कुंटल सोचना पड़ता था. और जिस दिन भी मैं एक कुंतल से एक ग्राम भी कम सोचता मुझे बहुत रोना आता था और मैं रात भर सो नहीं पाता था. 

जब आप अकेले रोते हैं तो आपके आंसूं आँखों से निकल कर गलों पर जम जाते हैं. और आपका चेहरा काला पड़ने लगता है. पिता जी मुझसे पूछते थे कि मैं आजकल इतना काला क्यों होता जा रहा हूँ? मैं कहता था “मैं आजकल बहुत सोचता हूँ और अकेले रोता हूँ न इसलिए” पिता जी को ये बात हंसने वाली लगती थी और वो जी भर के हँसते थे और उनके जाने के बाद मैं जी भर के रोता था. 

उन चार महीनों के बाद एक दिन जिसका नाम 10 जुलाई था बिना ये बताये आ गया कि उस दिन मेरा जन्मदिन है. दिन ने नहीं बताया इसलिए न मुझे याद रहा और न पिता जी को. मीरा से 10 जुलाई का कोई परिचय नहीं था. इसलिए वो आपस में अनजान थे. तो खैर 10 जुलाई को सूरज डूब रहा था और मेरे दिमाग में बीतने वाले रविवार की नहीं आने वाले सोमवार की फिकर थी. मैंने छत पर बैठे हुए अपनी उदासी की पीठ पर सूरज की बची हुई रौशनी से अपनी माँ का चेहरा बनाया. माँ मुझे देख कर मुस्काई और मैं उसे देखता ही रहा. मेरे इस देखने में एक आवाज़ ने खलल डाली और चूंकि मैं आवाजें देख सकता था इसलिए मैंने देखा कि मीरा अविनाश की बाँहों में बर्फ की तरह पिघल रही है. वो कह रही है कि उसके बाल अँधेरे के जंगल हैं और इस जंगल में सैकड़ों घोड़े अपना रास्ता भूल कर बेतहाशा दौड़ रहे हैं. “बाल खोल दो” अविनाश कहता है और मीरा घोड़ों को आज़ाद कर देती है. मीरा फिर कहती है “उसका बदन चांदी का है और उसने संगमरमर की सारी चिकनाई चुरा ली है”. अविनाश कहता है “दिखाओ”. मीरा को अपने कपडे बेकार की चीज़ लगते है और वो खुद को और अविनाश को महज ज़िस्म बना देती है. 

अविनाश इस क्षण से पहले मेरे लिए भारत के सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों में से एक हिन्दुस्तानी था. मेरे बड़े से घर के छोटे से कमरे में रहने वाला एक पारदर्शी किराएदार. पर उस क्षण वो मेरी जिंदगी में बिन बुलाए इतनी जोर से दाखिल हुआ जैसे मौत दाख़िल होती है जिंदगी में. चूंकि मौत के आने के बाद आपके लिए और किसी चीज़ का कोई ख़ास मतलब नहीं रह जाता इसलिए अविनाश के आने के बाद मेरे लिए पिता जी की कही हुई बातों का कोई खास मतलब नहीं रह गया. और मैं दरवाजे पर बिजली की तरह टूट पड़ा. दरवाजा खुलने में पांच मिनट लगे. और उन पांच मिनट में मैंने पांच सौ गलियां दी. पर किसको, मुझे नहीं मालूम. जब दरवाज़ा खुला तब मीरा कुर्सी पर बैठी थी और अविनाश दरवाजे पर खड़ा था. मेरे मुंह से निकला “कि अच्छा तो तुम हो मीरा के नाग”. मैंने ये बात ना जाने किस अंदाज़ में कही थी कि मीरा खिलखिला के हंसने लगी और अविनाश की आँखों में एक डर तैर गया. मीरा की सर के ऊपर दिवार पर टंगी घड़ी ने मुझसे कहा “6 बजे हैं”. मेरे मन ने घडी से कहा जल्दी से सात बजा दे. 

मैं अपने कमरे में बैठे बैठे सात बजने का इंतज़ार कर रहा था और वो तीन लड़के जिनके नाम का कोई ख़ास मतलब नहीं था. हरियाणा के किसी गाँव के किसी कमरे में नीली फिल्म देख कर आँखों की रौशनी बढ़ा रहे थे. वो अपनी जन्दगी से इस तरह निराश थे की मौत का धंधा करने लगे थे. उनमे से एक का बाप मजदूर था, दुसरे का किसान और तीसरे का न मजदूर, न किसान, शराबी था. एक की प्रेमिका की शादी हो गयी थी. दुसरे की प्रेमिका ने प्रेमी बदल लिया था और तीसरे के जीवन में लड़कियां महज नीली फिल्मों से होकर आतीं थीं. उन तीनों को एक फोन आता है और तीनों एक कार में बैठ कर कहीं चले जाते हैं. एक ही समय में कितनी अलग अलग घटनाएं घटती है जो अगली एक घटना को तय करतीं है. तो उस पल एक साथ कई घटनाएँ घटीं और एक घटना तय की गयी. 

मेरे कमरे का दरवाजा खुला और अविनाश मेरे सामने खड़ा था. अविनाश ने कहा “मुझे तुमसे बात करनी है” मैंने कुछ नहीं कहा पर मेरी आँखें बोल उठीं “मेरे पिता जी तुमसे बातें करेंगे” तुम बाहर चलो मैं तुम्हे कुछ समझाना चाहता हूँ, अविनाश ने कहा. मेरे दिमाग ने मेरे पैरों से कहा “कहीं नहीं जाना” पर मेरे पैरों ने कहा नहीं माना और मैं अविनाश के साथ बाहर पार्क में बात करने चला गया. उसके बाद 6 गज़लें और साठ के दशक वाले दर्द में डूबे 8 गाने बजे और शाम रात में बदल गयी. चूंकि पापा 7-8 के बीच नहीं आए इसलिए वो अगली सुबह आयेंगे. मैं अब दिल्ली हरियाणा के बॉर्डर के पास खेत में बने एक कमरे में था. वो लोग इसे इंजन वाला कमरा कह रहे थे. ग़ज़लों में जो शब्द कठिन आता अविनाश बिना पूछे ही उसका मतलब सब को बताने लगता और तीनों में कोई न कोई उसे गाली दे देता. मुखर्जी नगर से हरियाणा बॉर्डर तक मुझे 15-16 उर्दू के शब्द पता चल गए थे. मैं सोच रहा था कि मैं जब कभी भी शायरी लिखने लगूंगा इन शब्दों का प्रयोग जरूर करूँगा. कमरे में एक पुराना रेडियों पड़ा था. जिसमे ‘तेरे बिना भी क्या जीना ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना’ गाना बज रहा था. उन तीनों में से एक ने कमरे की लाईट जलाई और जोर जोर से रेडियो पर बजता गाना गाने लगा. बाहर खड़े तीसरे आदमी ने अविनाश को जाने के लिए कहा और जब अविनाश जाने लगा तो मैंने अविनाश से कहा “तुम क्या कहना चाहते थे”  तो उन तीनों में से जो सबसे छोटा और मोटा था. वो इंसान और जानवर के बीच का कोई जीव था. जिसके जीवन में लड़कियां नीली फिल्मों की खिडकियों से कूद कर आतीं थीं. उसने मुझसे कहा, अब वो मुझे बताएगा कि अविनाश क्या कहना चाहता था. मुझे लगा कि मुझे चुप रहना चाहिए और मैं चुप रहा. 

रेडियो पर गाने बदल रहे थे और शराब इन तीनों को बदल रही थी. मेरे पास जेब में एक कागज था. जिसपर मैं कुछ बनाना चाहता था या लिखना चाहता था ठीक से नहीं कह सकता. पर मुझे पेन या पेन्सिल की बेहद जरूरत थी. तीनों में से नीली फिल्मों वाले आदमी ने मुझसे कहा कि “नाच के दिखा”. मैं उसके कहने का कुछ मतलब समझता उससे पहले ही उसने मेरी टांगें और हाँथ खोल दिए और एक तमाचा जड़ दिया. उसके मारते ही मैं नाचने लगा. बाकी दो लड़कों ने तीसरे को मना किया और जब वो नहीं माना तो वो कुछ खाने के लिए लेने बाहर चले गए. मैं नाचते नाचते उस बड़ी नोटबुक के पास जाना चाहता था जिसके भीतर एक पेन रखी थी. शायद ये नोटबुक पानी लगाने के समय को लिखने के लिए रखी गयी होगी. मैं नाचते नाचते उस नोट बुक तक पहुंचा और पेन अपने हांथो में ले लिया. नीली फिल्मों वाले उस आदमीं की आँखों में अब नीली फ़िल्में चलने लगीं थी. उसने मुझसे कहा कि मैं कपडे उतार दूं. मैं रोने लगा और वो खूब कस के हंसने लगा. उसके बाद उस आदमी ने मुझे बताया कि जिंदगी कितनी बदसूरत हो सकती है. मेरे शरीर में उठते दर्द और बहते खून ने मुझसे कहा कि मुझे मर जाना चाहिए. मैं अब “मैं” नहीं बचा था. मैं उस आदमी की भूख का सामान भर रह गया था. उसकी कुंठा मेरी नसों में बहने लगी थी और मैं कागज पर कुछ बनाता चला जा रहा था. पहले मैं रोया बाद में मुझे लाश की तरह महसूस करने लगा.  

अगली सुबह जब पिता जी आये तब मीरा रो रही थी. उसने उनसे कहा कि मैं कल रात से कहीं निकला हुआ हूँ. पिता जी ने सवाल किया “कितने बजे से ?” मीरा फिर रोने लगी. पिता जी बदहवासी में बाहर भागे और उनके कदम सीधे पुलिस स्टेशन पर रुके. वो मेरी गुमसुदगी की रिपोर्ट लिखवाना चाहते थे. पर पुलिस ने कहा एक दो दिन पहले ढूँढ लो फिर आना. पिता जी निराश होकर पूरा दिन शहर भर में मुझे ढूंढते रहे और मैं दिल्ली हरियाणा के बॉर्डर पर एक नाले में मरा पड़ा था. अगली सुबह मैं पिता जी को मिला अखबार के तीसरे पन्ने पर एक कलम में सिमटा हुआ. अखबार ने उन्हें बताया कि दुराचार के बाद मुझे मार कर फेंक दिया गया है. और मेरी लाश पुलिस के पास है. पिता जी पुलिस के पास मेरी लाश लेने पहुंचे. पुलिस ने उन्हें लाश के साथ एक कागज दिया. जिसमे मैंने वैसे ही एक उलझा हुआ चित्र बनाया था. जैसे पहले बना कर पिता जी को दिखा चुका था. मेरे पास संवाद का एक यही तरीका बचा था. पहली बार पिता जी ने उस चित्र को समझने की कोशिश की और फूट फूट कर रोने लगे. अब उन्होंने क्या समझा. मैं जीवित होता तो उनसे पूछता. शायद उन्हें मेरे उस चित्र में मेरा आखरी वाक्य “मीरा तुमने तो मार ही डाला” सुनाई या दिखाई दे गया हो.      

अनुराग अनंत 

गुरुवार, सितंबर 17, 2015

चल रही है जिंदगी..!!

चल रही है
चल रही है
चल रही है जिंदगी
ढल रही है
ढल रही है
ढल रही है जिंदगी

रोटी के खेल में
बस में कभी रेल में
भूख की जेल में
कट रही है जिंदगी

चल रही है
चल रही है
चल रही है जिंदगी
ढल रही है
ढल रही है
ढल रही है जिंदगी

धुप में, छाँव में
शहर में, गाँव में
घायल से पाँव में
चुभ रही है जिंदगी

चल रही है
चल रही है
चल रही है जिंदगी
ढल रही है
ढल रही है
ढल रही है जिंदगी

जिस्म में और जान में
इनाम में, ईमान में
आजकल मुसलसल
कुछ चुन रही है जिंदगी

चल रही है
चल रही है
चल रही है जिंदगी
ढल रही है
ढल रही है
ढल रही है जिंदगी
तम्हारा --अनंत

रविवार, मार्च 08, 2015

जब खून ज़मीं पर गिरता है..!!

मजलूमों, महकूमों का
मुफलिस और मासूमों का
जब खून ज़मीं पर गिरता है
तब वक्त हकीकत कहता है
तब किला जुल्म का ढहता है
जब खून ज़मीं पर गिरता है-3

ये निजाम है, गद्दारों का
झूठों और मक्कारों का
चोरों का, बटमारों का
डाकू और हत्यारों का
देख कर इनका काला धंधा
लहू मेरा उबलता है
जब खून ज़मीं पर गिरता है

तब वक्त हकीकत कहता है
तब किला जुल्म का ढहता है
जब खून ज़मीं पर गिरता है-3

इन्क़लाब के नारों से
संघर्ष के हथियारों से
मेहनत के औजारों से
अवामी ललकारों से
जुल्मी थर-थर करता है
भीतर भीतर डरता है
जब खून ज़मीं पर गिरता है

तब वक्त हकीकत कहता है
तब किला जुल्म का ढहता है
जब खून ज़मीं पर गिरता है-3

खेतों में, खलिहानों में
फैक्टरी, खदानों में
बागों और बागानों में
जेलों में जिन्दानों में
क्यों मेहनतकश ही पिसता
क्यों सांस-सांस पर लड़ता है
जब खून ज़मीं पर गिरता है

तब वक्त हकीकत कहता है
तब किला जुल्म का ढहता है
जब खून ज़मीं पर गिरता है-3

तुम्हारा-अनंत

शनिवार, फ़रवरी 28, 2015

न तड़पे, न आंसू बहाए, ये दिल उसे भूल जाए..

जब कोई अपना अजनबी बन जाए
तब इस दिल को कौन समझाए
ये उसे भूल जाए
न तड़पे, न आंसू बहाए
ये दिल उसे भूल जाए..

पर मुमकिन कहाँ है, गुल खुशबु को भूले
चाँद सितारों को भूले, आसमाँ सूरज को भूले
जिस्म जाँ को, रूह धड़कनों को भूले
जब कोई देखना ही न चाहे
तब ये जख्म किसको दिखाएँ

न तड़पे, न आंसू बहाए
ये दिल उसे भूल जाए..

जब जिंदगी के ज़ीने से उतारते हुए
दिखें ख्वाब सब बिखरते हुए
अश्कों के चश्मे बहते हुए
यादों के कांटे चुभते हुए
अब तो जीना पड़ेगा
उसके ख्यालों को जिगर में बसाए

न तड़पे, न आंसू बहाए
ये दिल उसे भूल जाए..

कोई किसी को न अपना बनाए
जो सच न हो, उसे न सपना बनाए
सपने टूट कर जिगर में चुभेंगे
जो सच है हम तो बस वो ही कहेंगे
जख्म देने वाला ही, जब मरहम लगाए
फरेब हम उसे न कैसे बताएं

न तड़पे, न आंसू बहाए
ये दिल उसे भूल जाए..

तुम्हारा- अनंत
   

बुधवार, फ़रवरी 25, 2015

दोनों मिल कर साथ चलेंगे...!!

कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदलेंगे
दोनों मिल कर साथ चलेंगे

जीवन हो जगमग, जगमग
या फिर अंधियारी हो मग
अधरों पर मुस्कान सजे
या फिर अश्रु में डूबे दृग
अब जो भी होगा इस जीवन में
दोनो मिल कर साथ सहेंगे

कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदलेंगे
दोनों मिल कर साथ चलेंगे.......

एक प्यारा सा सपना देखा
जिसमे तुम भी थे और हम भी थे
दोनों के लब मुस्काये थे
दोनों के नयना नम भी थे
इस स्वप्न गगन में हम साथ उगे हैं
दोनों मिल कर साथ ढलेंगे

कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदलेंगे
दोनों मिल कर साथ चलेंगे.........

सुख की सर्दी, ग़म की गर्मी
अश्कों की बरसात मिलेगी
फूलों जैसे दिन भी होंगे
पत्थर जैसी रात मिलेगी
बन के दीपक, बन के बाती
जीवन भर हम साथ जलेंगे

कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदलेंगे
दोनों मिल कर साथ चलेंगे.........

तुम्हारा-अनंत

सोमवार, नवंबर 10, 2014

शरीर, आत्मा, मैं और तुम

जब जब तुम्हारी आत्मा तक जाना चाहा है
तुम्हारा शरीर मिला है
एक रूकावट की तरह
एक रास्ते की तरह


उससे उलझा हूँ जब जब
उलझ ही गया हूँ बस 


उस पर चला हूँ जब जब 
चलता ही गया हूँ बस
शरीर, आत्मा, मैं और तुम
एक दूसरे की ओर चलते रहे
और बढ़ते रहे फासले
हर कदम के साथ
कितना अजब सफ़र है
कितने अजब मुसाफिर
और कितनी अजब राह है ये

तुम्हारा-अनंत

सोमवार, अक्तूबर 27, 2014

"रात के उस पार" का गीत..!!

चाँद सिरहाने रख कर
सोया है एक सपना
कुछ तेरा है
कुछ मेरा है
पर है पूरा अपना
इस सपने से एक दिन सूरज उट्ठेगा
और रात के उस पार मिलन होगा अपना
चाँद सिरहाने रख कर सोया है एक सपना...

धरती और उफ़क से कहने को
ख्याल बहुत है दरिया सा बहने को
पर आँखों की भाषा ये कहती है
कुछ और देर ये ख़ामोशी रहने दो
आँखे हर वो बात समझतीं हैं
जो है आँखों को कहना
चाँद सिरहाने रख कर सोया है एक सपना ...

सावन के बालों में उलझी
पानी सी एक कहानी है
अबकी सावन में मुझको
बस वो तुम्हे सुनानी है
मैं ख्वाबों की आवाज़ में बोलूँगा
तुम नीदों के कान से सुनना
चाँद सिरहाने रख कर सोया है एक सपना...

इस बार जो मिलेंगे हम
दरिया सा बह जायेंगे
जहाँ अम्बर और धरती मिलते हैं
वहीँ बैठेंगे और बतियाएंगे
मैं सागर सा तुम्हे पुकारूँगा
तुम रेत महल सा ढहना
चाँद सिरहाने रख कर सोया है एक सपना...

तुम्हारा-अनंत



सजनिया रे...!!

पाँव में बाँध कर नाचूं मैं तो
तेरी यादों की पैजनिया
सजनिया रे...
तूने मुझे पागल करके छोड़ दिया

रह रह बरसा, रह रह तरसा
भटका सागर, सहरा, नदिया
सजनिया रे...
तूने मुझे बादल करके छोड़ दिया

आँखों में उमड़ा दर्द एक गहरा
और सागर सी लहराई अखियाँ
सजनिया रे...
तूने मुझे काजल करके छोड़ दिया

सांस-सांस मेरी बजी मुसलसल
और धड़कन पर तू उभरी पल पल
सजनिया रे...
तूने मुझे पायल करके छोड़ दिया

चाह नहीं कोई बस आह बची है
मेरी निगाह में तेरी निगाह बची है
सजनिया रे...
तूने मुझे घायल करके छोड़ दिया

तुम्हारा-अनंत

बुधवार, अक्तूबर 22, 2014

एक खता हुई हमसे...!!

एक खता हुई हमसे बस, जो हमने तुमसे प्यार किया
तुमने, जीता हमको हमसे और हम पर अधिकार किया

ऐसा हमको बना दिया कि प्यार और किसी से न हो पाया
न दिल खुल कर हंस पाया और न दिल खुल कर रो पाया
भुला सके होते जो तुमको तो जीवन, जीवन बन जाता
तुम्हारी याद में ये जीवन बस, बेबस भटकन बन पाया
हमने तुमको माँगा और तुमने अपनी यादों का हार दिया  
एक खता हुई हमसे बस... 

जब दर्द तुम्हारा करवट लेता है, तो हम आह से गीत बनाते हैं
तुम बेवफा नहीं, मेरी वफ़ा ही ज्यादा थी, खुद को ये समझाते हैं
कोई वफ़ा किसी से यूं न करे कि खुद से बेवफा हो जाए
कोई याद किसी को यूं न करे कि जीवन आंसू बन जाए
हमने यादो की दुनिया में रो-रो कर जीवन गुज़ार दिया
एक खता हुई हमसे बस... 

हम जब भी पास तुम्हारे आए, बस यूं ही मुस्काते थे
तुमने जख्म दिए थे जो, वो हम तुमसे ही छिपाते थे
तुम कहते थे तो हंस देते थे, तुम कहते तो गाते थे
तुम जो मिल जाते थे तो हम धड़कन पा जाते थे
तुम्हारी यादों के जख्मों का, हमने तुम्हारी यादों से उपचार किया
एक खता हुई हमसे बस...


तुम्हारा-अनंत

रविवार, अक्तूबर 19, 2014

ए मौत तुझसे मिलने के बाद..!!

ए मौत तुझसे मिलने के बाद,
जिंदगी बेगानी सी लगती है |
सौ बार पढ़ा, सौ बार रटा
पर फिर भी जिसको भूल गया
ज़हन में उलझी, दिल में अटकी
एक कहानी सी लगती है
ए मौत तुझसे मिलने के बाद........

दर्द, उदासी और तन्हाई
घायल रौशनी, रोती परछाई
मेरी आँखों के कोरों में ठहरे
जख्मी पानी सी लगती है
ए मौत तुझसे मिलने के बाद........

तुमने याद किया और भूल गए
और हम फांसी पर झूल गए
तुम्हारी प्रेम में डूबी बोली अब
यादों की नीलामी सी लगती है
ए मौत तुझसे मिलने के बाद........

तुम्हारा-अनंत  

शनिवार, सितंबर 20, 2014

रात के उस पार

-चाँद फरेबी है
-तुम ऐसा कैसे कह सकते हो
-कैसे का क्या मतलब होता है ?
-कैसे मतलब, कोई सबूत है इस बात का ?
-नहीं मेरे पास कोई सबूत नहीं है. लेकिन चाँद फरेबी है.
-तुम ऐसी बातें मत किया करो
-कैसी बातें ?
-जिनका कोई सबूत न हो
-तो फिर तुम ही कुछ कहो
-आसमान नीला है
-मैं नहीं मानता, कोई सबूत है क्या ?
-नहीं
-तब मैं मान जाता हूँ
-क्यों ?
-क्योंकि बिना सबूत वाली बातें सच होतीं हैं
और उन्हें जान कर कुछ कहने का मन नहीं करता
और न जान कर हम घड़ी की तरह लगातार बोलते रहते हैं

मैं कहीं खोया हुआ हूँ और दिवार से गिरते हुए पलस्तर मेरे दुःख में ही गिर रहें हैं. मैंने खुद को जहाँ रखा था. वहाँ अब मेरी शक्ल थी पर मैं नहीं था. मैंने खुद को तुम्हारे और मेरे फोन के बीच फैले सागर और रेगिस्तान में खूब तलाशा, पुरानी डायरियों में खंगाला, फेसबुक पर खोजा, ईमेल के ड्राफ्ट में और बटुए के खालीपन में भी देखा पर मैं कहीं नहीं था. मेरी भाषा की जगह सिगरेट के फिल्टरों की भाषा थी और मेरे मौन की जगह तुम्हारी बोली ने ले ली थी.

-तुम आँख मिचौली मत खेलो
बाहर आयो जहाँ कहीं भी हो
-मैं खुद को खोज रहा हूँ
-पर तुम तो मेरे साथ हो
-नहीं मैं कोचिग में हूँ
या शायद दारागंज स्टेशन पर बैठा हूँ
या किसी मंदिर की आरती में हूँ
या फिर कहीं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ

तुम एक बड़े घर में, तीन कमरों में से बीच वाले कमरे में अपनी माँ के साथ हो. पहले वाले कमरे में चाँदी का ताला लगा है और तीसरे वाले कमरे में सोने का. बीच वाला कमरा खुला है पर इसका कोई ख़ास मतलब नहीं हो सकता क्योंकि दो तालों के बीच एक और ताला है. तुम्हारे पैरों में पड़ा पीतल का ताला.
-और मेरी माँ ?
-वो तो तालों की ही बनीं हैं
उनकी साँसों में सैकड़ों ताले हैं
और धडकनों में हजारों
वो लाखों तालों की बनीं एक औरत हैं
और जब कभी टूटेंगीं
तो करोड़ों लोगों को कैद हो जाएगी
और अरबों लोग फांसी पर चढ़ा दिए जायेंगे
-मतलब क्रांति हो जाएगी
-ऐसा मत कहो, मुझे हंसी आती है
-किस पर, माँ पर ?
-नहीं
-तो क्रांति पर ?
-नहीं, तालों पर
-और किस पर ?
-तुम्हारे भाइयों पर
जो अपने हांथों में सूरज
और जेब में पृथ्वी लिए घूमते हैं
उनके मोबाइलों में ओबमा का नंबर है
और राहुल गाँधी को जो पहचानते भी नहीं
मायावती से उन्हें घृणा है पर हांथी पर उन्हें प्रेम आता है.
इसलिए वो मायावती को बहनजी कहते हैं.
-और मुलायम सिंह और मोदी ?
-उनके बारे में कल बात करेंगे
-और अपने बारे में ?
-अभी, इसी वक्त
-तो उसदिन फेसबुक पर तुमने क्या लिखा था ?
और मेल पर और गूगल प्लस पर
हर जगह कोई एक ही मैसेज भेजता है क्या ?
-मैंने मैसेज कहाँ भेजा था ?
-तो फिर क्या था वो ?

मैं उससे सिगरेट की भाषा में कुछ कह रहा था और मेरे दिमाग में बारह साल से तड़पता हुआ दर्द टहलने लगा था. मुझे याद आया कि मैं भूखा दारागंज स्टेशन पर बैठा हूँ जबकि अभी तक मेरी सरकारी नौकरी लग जानी चाहिए थी. माँ का उदास चेहरा हंस रहा है क्योंकि वो चाहती है कि उसका कोई बेटा उदास न हो. उसे डर है कि जवान बेटे उदासी में आत्महत्याएं कर लेते हैं. पिता जी नहीं हैं. एक भाई है जो छोटा है पर पिता जी की तरह लगता है. एक बहन भी है. जो एक सेकेण्ड में हज़ार सपने देखती है और खुद को किसी फिल्म की हिरोइन समझती है. दुनिया का हर गोरा लड़का उसे शाहरुख़ खान लगता है और उसके भयानक सपने सच को खा जाते हैं.

मैंने उससे न जाने क्या कहा ? मैं कुछ सुन नहीं सका था. शायद कोई ट्रेन मेरे दिमाग से गुजरी थी और उसके सायरन ने मेरे कानों का गला घोंट दिया था.

-तुम अपना ख्याल रखा करो, "तुमने बच्चों की तरह तोतली आवाज़ में कहा"             

मुझे लगा अभी सबकुछ बदल जायेगा और कई सारे सच झूठ होकर तड़पने लगेंगे. दुनिया के सारे रेगिस्तानों में बाढ़ आ जाएगी और सातों समन्दरों का पानी मीठा हो जायेगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और मेरे खून में आग के बच्चे कबड्डी खेलने लगे. मैंने एक घूँट तेज़ाब पिया और मेरी भाषा की रीढ़ की हड्डी गल गयी

-मैं अपना ख्याल किसके पास और कहाँ रखा करूँ ? तुम कुछ बताओ तो.
-क्या तुम मुझे एक अच्छी लड़की नहीं बनने देना चाहते ?
-ये मेरे सवाल का जावाब नहीं है
-लड़कों का ख्याल अपने पास रखने वाली लड़कियां अच्छी लड़की नहीं होती.
-किसने कहा ये तुमसे ?
-मेरी माँ ने
-तुम्हारी माँ तो तालों की बनीं हैं
-मेरे भी तो पैरों में ताले हैं
-लेकिन कैद में तो मैं हूँ, फांसी तो मुझे होगी.
-तुम कुछ नहीं समझते
मैं एक अच्छी लड़की बनना चाहती हूँ
जिसका ताला शादी के पहले कोई तोड़े न और शादी के बाद जो अपने ताले खोले न. उसे तालों से मोहब्बत हो और जितनी बार उसकी तारीफ की जाए. वो एक ताला मुस्कुराते हुए पहन ले.
-मतलब तुम ताला बनना चाहती हो
-नहीं, नहीं. तालों का पहाड़, जैसे मेरी माँ है

तुमसे मिलने के बाद रात का एक सिरा तो पहले से ही गीला था पर उस दिन के बाद, जब तुमने निदा फ़ाज़ली का शेर पढ़ कर फोन काटा. मेरी रातों का दूसरा सिरा, और भी खारा, और भी गीला होता चला गया. रातें जितनी गीली होतीं जाती थीं मैं उतना ही बंजर होता जाता था. मुझे लगता था कि किसी दिन, रात में बाढ़ आएगी और मैं प्यास से मर जाऊँगा.
तुमने शेर पढ़ा,
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता
और मैं जमीन पर पड़ा तड़पने लगा था. राह चलते लोगों को लगा, मुझे चक्कर आया है पर मैंने मुस्कुरा कर उन्हें बताया कि ये मेरी आदत है. जो मुझे कक्षा 9 से पड़ गयी है और ये आदत धीरे-धीरे जान ले लेगी. जैसे भगवान धीरे धीरे हमारे जीने के दिन ले लेते हैं. लोगों को मेरी भाषा समझ नहीं आई. उनके दिमाग में कपिल शर्मा का एक चित्र बना और वो हँसते हुए इत्र की तरह उड़ गए.

तुम्हारे शेर पढने के बाद से मुझे, जमीन और आसमां में से किसी एक को चुनना था पर मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकता था इसलिए मैंने नदी को चुना. जो जमीन और आसमां के बीच थी. गंगा में बाढ़ आई हुई थी और गंगा का चेहरा समुद्र से मिलने लगा था. उस दिन अगर तुमने ये शेर न पड़ा होता तो या तो मैं आसमां को अपना समझकर उससे अपना दर्द कहते हुए सिगरेट पी रहा होता या तुम्हारे तीन कमरों वाले किले पर चढ़ाई करने के लिए जमीन के नीचे सुरंगे खोद रहा होता. मैंने ताला लोड़ने वालों की एक पूरी फ़ौज बना रखी थी. उनके चेहरे लाल थे और वो लाल रंग देखते थे तो उनकी आँखों से दूध गिरने लगता था. वो खड़े खड़े माँ बन जाते थे और किसी के भूखे सोने जैसी मजाकिया और अश्लील बातों पर रो-रो कर जान दे सकते थे. तो खैर क्योंकि जमीन और आसमां में से मुझे किसी एक को चुनना था इसलिए मैंने नदी को चुना और शहर के एक बदनाम पुल पर पहुँच गया. वहाँ हवाएं ज़ख़्मी पड़ी हुईं थीं और सूरज रो रहा था जैसे कोई किसी को आखरी बार देख कर रोता है. सूरज ने मुझसे कहा, मत जाओ. मैंने कहा, जाने दो. तो वो बोला, मेरे जाने के बाद चले जाना. कोई अंतिम बार आपसे कुछ मांगें तो दे देना चाहिए. इसलिए मैंने सूरज का दिल रख लिया और वहीँ पुल से सूरज का डूबना देखता रहा. चाँद की फिकर तो थी नहीं मुझे क्योंकि तुम्हारे आने के बाद चाँद चला गया था, मेरी जिंदगी से.

मैं वहीँ पुल पर बैठे बैठे अपना घर, जो पुल से आठ किलो मीटर दूर था, आखरी बार देखता हूँ. घर में माँ उदास बैठी है और रेडियों पर समाचार में, बाढ़ में डूबे लोगों की मौत की खबर हरमुनियम पर गाई जा रही है और माँ की दिमाग पर कोई लाल रंग से लिख रहा है. कल क्या खायेंगे ? क्या बनायेंगे ? वो चाहती है कि मेरी सरकारी नौकरी लग जाए और उसके दिल में गहरा काल धुंआ उठता है. पिता जी इस बार भी नहीं थे, बहन थी सपनों से घिरी बदहवास, खुद से पूछ रही थी शादी किसे कहते हैं ? छोटा भाई पसीने के दलदल में धंसा है और हर सांस पर कसम खाता है कि वो इस दलदल से जरूर बाहर आएगा. वो समय और देवताओं को ललकार रहा है. मुझे डर लगता है और मैं कहता हूँ, बेटा! ऐसे नहीं कहते. वो मुझसे कुछ नहीं कहता.
तुम्हारे घर भी जाता हूँ मैं, वहीं पुल पर बैठे बैठे. तुम्हारे घर के सारे दरवाजे बंद हैं और सब पर सौ-सौ ताले लगे हैं. मैं बाहर खड़ा रहता हूँ कि शायद तुम दिख जाओ और मैं तुमसे पूछ सकूं कि जमीं और आसमां में से मुझे दोनों थोडा-थोडा नहीं मिल सकता क्या ? पर तुम नहीं आई और मैं अपनी आँखें तुम्हारी बालकनी पर छोड़ कर पुल पर लौट आता हूँ. अब मैं अँधा हूँ. मुझे कुछ नहीं दीखता. न घर, न माँ, न उसकी चिताएं, न उसकी इच्छाएं, न बहन की शादी, और न भाई का पसीना और न ही वो रेलिंग जिससे ठोकर खाकर मैं नदी में जा गिरा. भीतर मछलियाँ गिटार बजा रहीं थीं और सन्नाटा गा रहा था और मैंने न जाने क्या चबा लिया था. जो मेरे दांत बंद होते जा रहे थे. नसें तन कर सिकुड़ने लगीं थीं.
मेरी आँखों का कुछ हिस्सा दौड़ कर मेरे पास आ गया था और मैंने देखा तुम बर्फ की रजाई ओढ़ कर लेटी हो. तुम मेरा नंबर मिलाती हो पर घंटी जाने से पहले काट देती हो. तुम मुझसे कोई और शेर कहना चाहती हो. जिसमे मजबूरी, बेवफाई, जिंदगी, मौत, याद रखना और भुलाना जैसे शब्द आये और उन्हें पढ़ कर या सुन कर बत्ती बुझा कर रोने का मन करे और कविता लिखने का भी. मरने का मन तो तुम्हारा पहला शेर सुन कर किया था.

मेरी बची हुई आधी आँख भी अब बंद होने लगी थी और मुझसे मेरा सब कुछ छूट रहा था. दिल से लेकर दिमाग तक. चूँकि दिल में एक इंच भी जगह नहीं थी. वहाँ तुमने इत्र वाली स्याही से प्रेम के कई खंडकाव्य लिख छोड़े थे. इसलिए मैंने दिमाग की ओर जाना ज्यादा ठीक समझा. वैसे मेरा दिमाग किसी पुरानी रद्दी डायरी से ज्यादा कुछ नहीं था. जिसमे मैंने तुम्हारी ही एक कहानी को हज़ार तरीके से लिखा था फिर भी वहाँ एक आखरी पन्ना था. जिस पर मैंने बची हुई साँसों की स्याही से लिखा
चाँद सिरहाने रख कर
सोया है एक सपना
कुछ तेरा है
कुछ मेरा है
पर है पूरा अपना
इस सपने से एक दिन सूरज उठ्ठेगा
और रात के उस पार मिलन होगा अपना

रात के उस पार, मेरे घर वाले पुल पर खड़े मेरी लाश का इंतज़ार कर रहे थे. मैं जब लाश की शक्ल में बाहर आया तो माँ को देखकर मुस्कुरा नहीं सका. माँ का बदन पसीने से भीग गया और वो बेहोश हो गयी. भाई को लगा उसे भी मेरी तरह गंगा के भीतर की दुनिया देख लेनी चाहिए पर उसने माँ का चेहरा देखा और रुक गया. बहन ने उसदिन एक भी सपना नहीं देखा पर तुमने छक कर खाए गोलगप्पे, तालों के टैडी बियर को जिगर से लगा कर सोयी और इतना हंसी कि मुझे शर्म आई अपने मरने पर.

तुम्हारा-अनंत