मंगलवार, सितंबर 02, 2014

इससे पहले कि

घोड़े जैसे मुंह वाला ये समय
चींटी से भी धीमा चल रहा है, मेरे लिए
हो सकता है तुम्हारे लिए ये समय
गति की परिभाषा हो
और तुम हर पल में सदियाँ जी रहे हो

खैर इससे पहले कि
आदमी भाप बन जाएँ
उनकी चिंताएं, सवाल और दर्द
दर्ज कर लिए जाएँ

उनकी आँखों में
आइना उतरने से पहले
हम अपनी-अपनी तस्वीरें देख लें
वर्ना आइनों के झूठ को हम सच कहेंगें
और सच दूर खड़ा होकर रोयेगा
किसी गूंगे बच्चे की तरह

इससे पहले कि
आदमी सीढ़ियों से उतर कर
नदी बन जाए
उनसे पूछ लिया जाना चाहिए
क्या इसके अलवा उनके पास कोई और विकल्प नहीं है
और सीढियों से उतरना और नदी बनना क्या इतना जरूरी है
कि जीवन के परिभाषा में क्रांति करनी पड़े

तुम्हारे और हमारे समय में
इतना अंतर है कि
तुम जिन्हें इंसान समझते हो
वो हमारे लिए मशीन और जानवर हैं
और जिन्हें हम इंसान समझते हैं
उन्हें तुम कुछ समझते ही नहीं

खैर जंगलों में बजते गीतों में आग लगे
और जलते हुए लोग चलें आयें शहर की ओर
तुम आदमी को आदमी की तरह देखो
इससे पहले कि
तुम्हारी बनाई सारी आकृतियाँ टूटें
तुम अपनी रेखाओं, त्रिभुजों, वृतों और चतुर्भुजों की परिभाषाएं और माप सुधार लो
और कहो कि जीवन गलतियाँ सुधारने का दुसरा नाम है

खेत-खलियान, जंगल और जमीन
कल-कारखाने, दुखिया और दीन
नहीं रह सकते अब बहस से बाहर

इसलिए इससे पहले कि
तुम्हारी भाषा के गोल महल में
भटकतीं आत्माएं और व्यथाएं
बगावत कर दें
तुम उतार कर फेंक दो, अपना मुकुट
अपना सिंहासन जला दो
और त्याग तो शाही वस्त्र
और कहो कि
मुझे मंजूर है आदिम बराबरी

और यदि नहीं करते तुम ऐसा
तो समय का चेहरा बदल दिया जायेगा
आदमी सीढियों से उतर कर
नदी बनकर बहेगा
और जीवन के परिभाषा में क्रांति कर दी जाएगी

उस वक़्त तुम नहीं होगे वहाँ
याद करने के लिए
मेरी चेतावनियाँ और भविष्यवाणियाँ
 तुम्हारा-अनंत 

ये जाना है प्रेमी ने, प्रेम करके

वक़्त के हांथो मजबूर प्रेमी
समय का सबसे बड़ा दुश्मन होता है
वो समय को पूरी तरह नष्ट कर देना चाहता है
इसीलिए वो एकांत से बातें करता है
और चाँद की ओर देख कर उदास हो जाता है
वो कमरे की बत्तियां बुझा देता है
और कभी कुछ नहीं करता

एकांत से बातें करने
चाँद को देख कर उदास होने
और अँधेरे में पड़े रहकर, कुछ न करने से
समय नष्ट हो जाता है
ये प्रेमी ने जाना है, प्रेम करके

प्रेम करने के बाद
आत्मा की भाषा बदल जाती है
और उसे अनुवाद और अनुवादक की जरुरत पड़ती है
पर यदि अनुवादक मना करदे, अनुवाद करने से
तो अपनी ही आत्मा अनजान सी लगती है
और प्रेमी कैद हो जाता है, अपनी ही देह में
एक परग्रही आत्मा के साथ

कितना दुखद होता है
अपनी ही देह में
अपनी ही आत्मा को परग्रही होते हुए देखना
ये प्रेमी ने जाना है, प्रेम करके

प्रेमी के दिल में, हर वक़्त
नीलाम होते घर की किसी दीवार पर पड़े जले सा भाव उमड़ता है
और आस-पास की आक्सीजन एकदम ख़तम कर देता है
ऐसे समय में कविता लिखना, जीते रहने का एकमात्र विकल्प है
इस तरह दुनिया में जितने कवि है
वो सभी जीने की विवशता में
कविता को पी रहें हैं
और बस इसी तरह जी रहें हैं

अतः कवि होने की एकमात्र कसौटी
मृत्यु को नकार कर जीना है
और आक्सीजन की जगह, कविताओं को पीना है

एक कोमल कहानी ख़त्म होने से पहले
कई बार आंसुओं से नहाती है
बिना आक्सीजन के जीते हुए कवितायेँ लिखती है
और प्रेमी को ये बताती है
कि शब्द सिर्फ बोलने के लिए ही नहीं हैं
जीने के लिए भी हैं

शब्द कैसे कविता
और कविता कैसे जीवन बनती है
ये जाना है प्रेमी ने, प्रेम करके


तुम्हारा-अनंत  

जहाँ “कुछ” नहीं है, वहां “कुछ नहीं” है !!

खाली जगह में भरे हुए एकांत को
जब जब महसूसा है
मुस्कुराया हूँ मैं
और कहा है खुद से
जहाँ “कुछ” नहीं है
वहां “कुछ नहीं” है

“कुछ” के चले जाने के बाद
“कुछ नहीं” बचता है “कुछ” की जगह में
और इस “कुछ नहीं” में
होतीं हैं “कुछ” की यादें
उसकी हंसी, उसका गुस्सा
उसका पागलपन, उसका नशा
उसकी चूड़ियों की खनक
उसके बालों की महक
उसकी पायल की झंकार
उसकी गीली-गीली पुकार

अँधेरे से कमरे में
अवसाद के बगल में
“कुछ नहीं” की शक्ल में
एकांत के बिस्तर पर
ऊब की उंगलियाँ फोड़ते हुए   
“कुछ नहीं” पड़ा रहता है, सातों दिन
कुछ नहीं करते हुए

“कुछ नहीं” कुछ इस तरह बात करता है मुझसे
कि और किसी को आजकल सुन ही नहीं पाता मैं
दुनिया की सारी आवाजें भाप बन जातीं हैं
जब “कुछ नहीं” उगता है सूरज की तरह
मेर ज़हन के हर एक कोने से

मैं एक टूटी हुई राग हाँथ में उठता हूँ
उस पर गिरह पर गिरह लगता हूँ
और जब गाने की कोशिश करता हूँ
तो मेरे शब्द उदास और आवाज़ घायल हो जाती है

मेरा मन करता है
कि मैं किनारों के संवाद को लिखूं
और नदियों के मौन को सहलाऊं

दो पहाड़ियों के बीच की खाई में
भरी हुई हवा से पूछूँ
कि कैसा लगता है उसे
जब रोतीं है पहाड़ियां
होतीं हैं उदास
और लिखतीं हैं, कोहरों के बदन पर कविताएँ

मन करता हैं
पूछूँ, उस आदिम मौन से
कि कैसे उसने शब्दों के समंदर को
अनुशासन पढ़ाया है

मन करता है
पूछूँ, सूनसान रास्तों से
कि कौन सा मुसाफिर
उन्हें यहाँ तक ले कर आया है

मन करता है
मैं इस तरह खामोश रहूँ
कि आवाज परिभाषित हो, मेरी ख़ामोशी से
और विश्व भर की भाषाओँ को
मेरी शांति के सहारे की जरुरत पड़े

मैं जानता हूँ
कि उदास रहना कितना ख़तरनाक है
इस उदास समय में 
और मैं ये भी जानता हूँ
कि मेरी एक सांस और दूसरी सांस के बीच
सिवाय उदासी के “कुछ नहीं” है

“कुछ नहीं” जब करवट लेता है
मैं उदासी की एक गोली खा लेता हूँ
दूसरी करवट पर, दूसरी गोली

“कुछ नहीं” की हर हलचल के साथ
मैं उदासी की एक गोली खाता हूँ
इसतरह मैं उदासी का मरीज हूँ
और उदासी ही मेरी दवा है

कितना अजीब होता है न
मरीज, मर्ज और दवा का रिश्ता
अनंत भुजाओं वाले त्रिभुज की तरह
फैला होता है, जीवन के हर कोने तक
हर कण तक

बिना मरीज के मर्ज नहीं
बिना मर्ज के, दवा का क्या काम?
कितना प्रेम है न, तीनों में
कितना सामंजस्य है
एक के बिना दुसरे का कोई अस्तित्व नहीं
जहाँ एक नहीं, वहाँ दूसरा नहीं

मैं सोचता हूँ
मरीज, मर्ज और दवा ही जीवन का अकाट्य सत्य है
ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे लिए ईश्वर है
और मेरे लिए मृत्यू

जब सोचता हूँ मैं ये सब
“कुछ” हँसता है, मेरे भीतर और पूछता है
क्यों परेशान हो ? क्या हुआ ?
मैं कहता हूँ
“कुछ नहीं”

“कुछ” चला जाता है
और “कुछ नहीं” रह जाता है
“कुछ” की जगह पर


तुम्हारा-अनंत 

सोमवार, सितंबर 01, 2014

प्यार, इंसान, कुत्ता और भगवान !!

तुम्हारी आँखों ने मुझे मारा
और मैंने मृत्यु को जिया जीवन की तरह
सांस के अंतिम हिस्से में
जब काँच करकता था  
तो मैं तुम्हारा नाम लेता था
और तुम थोडा सा भगवान हो जाती थी
और मैं थोडा सा कुत्ता!

प्यार
इंसान, कुत्ते और भगवान को
इंसान, कुत्ता और भगवान बनाता है

उदासी के आठवें प्रहर में
मैंने लिखा ये डायरी में
और लिखते ही उड़ गए शब्द
आकाश में नहीं, पाताल में

मैं तनहा पड़ा था
और तुम बह रही थी, आँखों से
कविता की तलाश में
भटकता कोई आदिम फ़कीर, मुझे देखता
तो चूमता हज़ार बार
और मैं सोचता रहता, तुम्हारे बारे में
जैसे कोई भूखा सोचता है
रोटी के बारे में

तुम खुद को खोदना कभी
तुम्हारी अंतिम तह में
मैं दबा हूँ, साबूत
तुम्हे मालूम है या नहीं
मैं नहीं जानता
पर मैं मरा नहीं हूँ
जिन्दा हूँ वहाँ
इतना पता है मुझे

वहीँ से आती है मुझे साँसें
और वहीँ धड़कता है मेरा दिल
बाकी सब धोखा है
तुम्हारी 'न' में सोई हुई मौत
और मेरी 'हाँ' में जागती जिंदगी
सब धोखा है !

तुम्हारा-अनंत  

शनिवार, अगस्त 30, 2014

लोकतंत्र का त्रिभुज और कविता !!

मेरी चुप पर
एक चांप लगा कर
बनाया तुमने लोकतंत्र का त्रिभुज
जिसके एक बिंदु पर संविधान है
दुसरे पर संसद
और तीसरे पर
संविधान और संसद के जने भ्रम हैं 


संविधान, संसद और भ्रमों से घिरा आदमी
केंद्र में बैठ कर हाशिए को गा रहा है
और मेरे भीतर का कवि
इन सब के नंगे चेहरे को आइना दिखा रहा है
इन्हें इनकी जगह से हटा कर
कविताएँ बैठा रहा है
इसलिए मेरी कविताओं के सर पर सींग
और नाखूनों में बघनहे उग आए हैं

ये कविताएँ प्रेमिकाओं की जगह
माओं के काम आएँगी
जंगलों में लड़ेंगीं, गोलियां चलाएंगी
और जब तुम मासूक और मौसम की बात करोगे
तो तुम्हे और तुम्हारी बातों को घसीट कर
भूख और भात की ओर ले आएंगी


तुम्हारा—अनंत