बुधवार, नवंबर 13, 2013

बसंत जिस गाँव में मारा गया था !!

इश्तिहारों में छपे चेहरे
जब देश की नियति तय कर रहे हों
और भूख की नींव पर खड़े
आज़ादी के किले ढह रहे हों
जब चौराहों पर खड़ी, बैठी और चलती लाशें
जल्लादों को मसीहा बताने पर तुलीं हों
तब उस वक्त रोटी के सवालों पर लड़ता आदमी क्या करेगा ?
क्या कहेगा ?

वो खामोश है 
या हमें ही नहीं सुनाई देती 
उसकी आवाजें
चीखें...

उसके सवालों का लश्कर न जाने कहाँ है ?
उसके खून में बहती जलन
और सांस में बैठी घुटन का
न जाने क्या बयाँ है ?

एक नंगा सच है कि
रीढ़ की हड्डी वाले लोग
बरदास्त नहीं है इस तिलिस्मी बसंत को
जवाबों के इस उत्सव में
सवालों के माथे पर मौत लिखी जा रही है
और जो लोग जिन्दा रहने की ज़िद में हैं
बन्दूक की नोंक पर
या देशप्रेम की झोंक पर
जंगलों में ठेले जा रहे हैं

विचारधारा के पेट में पलती नययाज़ औलादें
एक साथ पैदा हो गयीं हैं
और आदमी, जिसके पास विचारधारा है
स्वयं नाजायज़ होता जा रहा है 

दोपहर की ऊब के वक्त
जब जूठी थाली की तरह पड़ा हुआ आदमी
खुद की लाश को ये समझता है
कि यही सब कुछ तो होना था, जो हुआ है
और जो हुआ है, उसमें गलत क्या है ?
उसी वक्त उसके
खून में सना अँधेरा
उसे अधमरे सांप सा डसता है
आधा मारता है, आधा मरता है

भूख के मुंह पर देशप्रेम के नारे ठूस देना चाहते हैं वो
शायद उन्हें नहीं मालूम
कि भूखे आदमी के लिए रोटी बड़ी है और देश छोटा

इस बीच
उधर मुझसे और मेरी लाश से दूर खड़ा
मेरा प्यारा देश !
सपनो के जूते कसता है
कभी हँसता है, कभी रोता है
मरे हुए सूरज की लाश
अपने कंधों पर ढोता है
अधमरी रौशनी को जहर पिलाकर
बंजर जमीन पर बोता है
और मैं चीखता हूँ

क्या लोकतंत्र में यही होता है ?

भूख का इतिहास
और दर्द का भूगोल
बदलने पर विदूषक तुले हैं
और मैं सोच रहा हूँ
की हम किस माटी में ढले है ?
बसंत जिस गाँव में मारा गया था
शायद उसी गाँव में पले हैं

जिस रास्ते पर चलते चलते
गांधी एक भूल/ एक भ्रम
एक लचीला शब्द हो गए
अब तक शायद उसी पर चले हैं.

तुम्हारा-अनंत

रविवार, अक्टूबर 27, 2013

ए! इकीसवीं सदी की कविता गवाही दो!

ए! इकीसवीं सदी की कविता
गवाही दो!
कि सदी के सारे शब्द मार दिए गए हैं
और तुम एक शब्द विहीन कविता हो!
तुम एक मौन की कविता हो!

तुम्हारी रगों में जो खून बह रहा है
वो बेवजह मारे गए लोगों का लहू है
और धडकनें उन आवाजों की कराह हैं
जिन्होंने बोलने के लिए जान गंवाई है

इस दोमुंहे समय में
जब डसा जाना बिलकुल तय है
तुम लड़ते हुए बीच में खड़ी हो

हे! तप्त मौन की शापित कविता
तुम जीवित हो!
मृत शब्दों और घुटी हुई आवाजों के साथ तुम
जीवित हो!
ए! इकीसवीं सदी की कविता
गवाही दो!
कि सदी के सारे शब्द मार दिए गए हैं

पिटे हुए विदूषकों और लफ्फाजों का दल
संविधान की छाती पर चढ कर राष्ट्रगान गा रहे हैं
राष्ट्रगान कि जिसमें राष्ट्र कहीं नहीं है
महज़ गान है
प्रेमिका की नाभि पर खिले हुए कमाल पर लिखा गान

कंक्रीट के जंगल में सपनों के पांव खो गए है
और हाँफते हुए हौसलों ने भटकना अपनी नियति मान ली है
नसों में बहता हुआ बहुरंगी बाज़ार तेजाब है
पर मजबूरी है कि तेजाब पी कर मरते हुए जीना है

एक देश दूसरे देश पर चढ़ा है
और दबे हुए देश की पीठ पर कानून अशोक की  लाट सा खड़ा है
हर चौराहे पर एक अंधी बनिया औरत है
जो अदालत की उस देवी से मिलती है
जिसने लक्षमनपुर-बाथे के अपराधियों को
आँखों पर पट्टी बांध कर बेक़सूर देखा था

सुनों!
वो देश जो जंगल में रहता है
खेतों में उगता है
नदियों में बहता है
लोहों में ढलता है
बचपन में मचलता है
और रोटी के ख्याल में भटकता हुआ
खुले आसमान के नीचे सोता है
तुम्हे गा रहा है
संविधान के चार दीवारी के उस पार
संसद के पहुँच से बहुत दूर
पेट की लड़ाई लड़ता हुआ
तुम्हे गा रहा है
भूख की ताल पर तुम्हे गा रहा है

ए! इकीसवीं सदी की कविता
अकेले पड़ते इंसान के अकेलेपन की गवाही दो!
ए! इकीसवीं सदी की कविता
मारी जाती इंसानियत की मौत की गवाही दो

ए! इकीसवीं सदी की कविता
गवाही दो!
कि सदी के सारे शब्द मार दिए गए हैं

गवाही दो!
कि अब कहने के लिए कुछ नहीं है
और करने को बहुत कुछ

तुम्हारा-अनंत





गुरुवार, अगस्त 01, 2013

मैं नज़्म हो गया हूँ शायद !

आज शाम शीशे में देखा, तो दिखा
मुझमे मैं नहीं, कोई और ही रह रहा है अब
कि जिसका नाम मेरे माझी* के किसी पन्ने पे लिखा
अपनी ही रूह तलाशता रहा है न जाने कब से 

न जाने कितनी बार क़त्ल किया है उसे 
न जाने कितनी बार साँसों में जलाया है 
रूह में दफनाया है उसे 
पर हर बार वो आशना* चेहरा 
उभर आया है मेरे चेहरे पर 

मैं हूँ, पर मुझमें मैं नहीं हूँ अब 
वो है, कि अब बस, वही वो है मुझमें 
तलाशता हूँ खुद को तो उसको पाता हूँ  
उसको ढूढता हूँ तो खुद तक पहुँच जाता हूँ 

मैंने रूह में दफ़न की थी जो कई नज्में 
साँसों की गर्मी में जलाया था जिन्हें 
सबने मिलकर मुझपे चढाई की है 

मैं एक किला हो गया हूँ हारा हुआ 
जहाँ नज्में, महज़ नज्में ही रहतीं हैं अब 
मैंने नज्मों को जो कभी मारा था 
सभी नज्मों नें मुझे मार डाला है 

अब मैं, मैं नहीं, नज़्म हो गया हूँ शायद 
बस इंतज़ार है 
कि कोई नज़्म आये और मुझे पढ़े नज्मों की तरह

तुम्हारा-अनंत 

*  माझी- इतिहास 
* आशना-परिचित    

बुधवार, जुलाई 31, 2013

अनगिनत आवाजों के घेरे....

पैरों पर पर्वत बाँध कर, भाग रहा हूँ मैं
साँसों की सड़क पर
और धडकनें भूल गयी हैं रास्ता
सपनों की गली में भटकते भटकते

नींद लेटी है रात के बगल में
दोनों जाग रहे हैं चुपचाप
और चाँद सो गया है
भूखे पेट, पानी पी कर

तारे हाँफते रहते हैं आजकल
और जब उन्हें देखो
तो धमकी देते हैं कि
वो अपनीं नसें काट लेंगे

मैं अपनीं आँखें बंद कर लेता हूँ
और अँधेरे से मोमबत्ती जलाने को कहता हूँ
पर अँधेरा कहता है कि उसके पांव कटे हैं
वो उठ नहीं सकता, चल नहीं सकता
वो बस पसरा रहेगा

जिंदगी के सारे सचों को मैं झूट बताता हूँ
और इसीबीच जिंदगी के सारे झूठ सच होते जाते हैं
मेरे पीछे जो लोग आ रहे हैं
वो मेरे क़दमों के निशान धोते जाते हैं

इस तरह मैं हर बार
अपने दर्द के साथ अकेला बचता हूँ
जैसे बच जातीं हैं,
कुछ सासें, सांस लेने के बाद
कुछ आंसू, बहुत रोने के बाद
कुछ बातें, सबकुछ कहने के बाद
और कुछ जिंदगी, मौत के बाद

तुम्हारे गुम्बद और किले से
जिंदगी खूबसूरत दिखती है
क्योंकि वहाँ से,
जागती नीदें
घायल रातें
भूखा चाँद
आत्महत्या करते तारे
हांफती हुई साँसे
कीचड़ में धंसी धड़कने
और भटके हुए सपने नहीं दीखते

तुम्हे वहाँ से लोगों के पैरों में बंधे हुए पर्वत
और अदृश्य आवाजों में उलझे हुए हाँथ नहीं दीखते

जहाँ मोम्बतियों की लवें
पैदा होते ही फांसी लगा लेतीं हैं
मैं वहाँ से आया हूँ

जहाँ सूरज पैदा होने से पहले मर जाता है
मैं उस जमीन पर खड़ा हूँ
जमीन के नीचे दबीं हैं मेरी ही  हड्डियां
और आकाश में तैर रही हैं मेरी लाशें

यहाँ मुझे अनगिनत आवाजें घेरे हुए हैं
जो मुझसे कह रही हैं
जिंदगी को ज़िदगी बनाना है
परिंदों को पंख लगाना है
इसलिए माफ करना
मैं तुम्हारी सपनीली दिवार पर लिखे नारे नहीं पढ़ सकता
मैं तुम्हारी तरह गुम्बद या किले पर नहीं चढ सकता

जहाँ से जिंदगी बहुत खूबसूरत दिखती है

तुम्हारा-अनंत   

शुक्रवार, जुलाई 26, 2013

एक दिन न्यूटन का नियम सच होगा..

अंगडाई के आँगन में
जब तुमने नींद के कपड़े उतारे थे 
उसी वक्त सूरज ने चुराई थी 
तुमसे कुछ रौशनी 
और तुमने मुस्कुरा कर कहा था 
सुबह हो गयी!

तुम्हारी पायल ने कोयल को बोलना सिखाया था 
और होठों की लाली ने गुलाब को खिलना
तुम्हारी चाल से चलना सीखा था नदी ने 
तुम्हारी आँखों से देखा था आसमान ने धरती को 
पेड़ों पर तुम्हारी हंसी का नशा फल बन कर लदा था
और तुम इन सब से बेखबर 
कक्षा 9 की किताब में
"न्यूटन का तीसरा नियम'' पढ़ रही थी 

प्रत्येक क्रिया की सदैव बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है

दरवाज़ा खुला था उसी समय 
और हुई थी तुम पर एक क्रिया 
जिसमे तुम्हारे नींद के कपड़े फाड़े गए 
तुम्हारी रौशनी को अँधेरा पहनाया गया 
और मुस्कान पर एक लिजलिजा ला चुम्बन चिपका दिया गया 
तुम्हारे भीतर बसी प्रकृति महज़ शरीर भर हो कर रह गयी थी 
जिसे छील कर फेंक दिया गया था, एक कोने में
खून से लथपथ एक सच पड़ा था, अधमरा सा
शायद वो तुम थी!   

तुम उस क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं कर सकी 
और धुआँ हो गयी थी 
जबकि मैं तुम्हे आग लिखना चाहता था 

अखबारों के तीसरे पन्ने में 
छोटे से कोने में 
चंद पंक्तियों में छपा था तुम्हारा उपन्यास 
जिसे पढ़ा था तुम्हारे लाचार भाई और बाप ने
सरकारी अस्पताल में मुर्दाघर के बहार  
और भरी थी किसी को सुनाई न देने वाली एक मुर्दा आह! 

न्यूटन का नियम झूठा है 
तुमने आखरी बार यही सोचा होगा 
जब हथेलियों की रेखाओं पर झूली होगी तुम 

या फिर इस विश्वास के साथ 
आँखों के पानी में डूब मरी होगी तुम 
कि एक दिन न्यूटन का नियम सच होगा
और प्रत्येक क्रिया के बराबर विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होगी 


तुम्हारा-अनंत 


बुधवार, जुलाई 24, 2013

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ

एक प्यास का जंगल है
जो पानी के रेगिस्तान पर उग आया है 
फिदाइन मन गुजर रहा है 
ठहरे हुए समय की तरह 

एक रास्ता है 
जो माँ के दुलार से बम की आवाज़ तक फैला हुआ है 
एक और रास्ता है 
जो खुद शुरू हो कर खुद पर खतम हो जाता है  

मैं फलीस्तीन के किसी बच्चे की तरह 
सपनों की अलमारी में 
खिलौने और गुब्बारे रख कर आता हूँ 
पर न जाने वो कैसे 
बन्दूक, बारूद और धुआँ हो जाते हैं 

मुझे अफ़सोस होता है 
जब मुझे मालूम पड़ता है 
कि चेतना भिखारी की जूठन 
वैश्या की नींद 
मुर्दे के शरीर से उतरा हुआ कपड़ा हो चुकी है 
और अब लोगों को उसके नाम से उलटी आती है 

सब डरा हुआ चेहरा लिए हँस रहे है 
उड़ते हुए जहाज़ को देख कर 
भाप हुए जा रहे है

और मैं खून की नदी में 
अपने बाप की लाश पर तैर रहा हूँ 
माँ की चीखों के साज़ पर 
भाई बहनों के आंसूं के गीत गा रहा हूँ 
मुझे साफ़ दिखाई दे रही है 
लाशों के पहाड़ के उस पार 
मेरी वो ज़मीन 
जहाँ मैं बोऊंगा 
अपने बाप के सपने 
आपनी माँ की चीखें 
भाई बहनों के आंसूओं के बीज
और काटूँगा आज़ादी की फसल 

तब सारे प्यास के पेड़ गिरा दिए जायेंगे 
पानी के रेगिस्तानों को जला दिया जायेगा 
और बमों की आवाज़ के मुंह पर 
एक ढीठ बच्चे की हंसी लिख दी जायेगी 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब कैदी परिंदों के पंख तलवार हो जायेंगे 
और परवाज़ क़यामत 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब बच्चों के सपनों की अलमारी में 
बन्दूक, बारूद और धुएं की जगह 
खिलौने और गुबारे होंगे 
जब उनकी नींद में 
तेज़ाब नहीं बरसेगा 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब आजादी लिखने-पढ़ने की चीज़ नहीं 
बल्कि जीने और महसूस करने की चीज़ होगी 

तुम्हारा-अनंत
   

बुधवार, मार्च 20, 2013

एक नंगे आदमी की डायरी...

कागज पर कुछ लिख कर मिटा देना
नाजायज़ संतानें पैदा करके मार देने जैसा होता है
और लिखे हुए को काट देना
अपने बच्चों का गला घोंट देने जैसा कुछ

मैं ये बात  जानता हूँ
और इसे मैंने डायरी के आखरी पन्ने पर लिख दिया है
डायरी के बाकि पन्नों पर भी
मैंने यही लिखा है
कि मैं हत्यारा हूँ
और तुम भी
और वो भी जिसे हम तुम जानते है
या नहीं भी जानते
हर कोई एक हत्यारा है

हर कोई एक चलता-फिरता कब्रिस्तान है
जिसमे न जाने कितनी
नाजायज़ संताने दफ़न हैं

हर कोई एक जिन्दा मकतल है
जिसमे न जाने कितने
बच्चे मारे गए हैं
जिनके दिमाग में खिलौने
मुंह पर पहाड़ा
और हांथों में बिना नोक वाली पेन्सिल थी
(आँखों की बात मैं नहीं करूँगा. मुझे बच्चों की आँखों से डर लगता है)

जब हम नाजायज़ संताने पैदा कर रहे होतें हैं
बच्चों को मार रहे होते हैं
या डायरी लिख रहे होते है
तब हम बिलकुल नंगे होते है
बिलकुल!

कटी हुई पतंगों के पीछे
हवाएं रोते हुए भाग रहीं हैं
और अपने पीछे कदमो के निशान की जगह छोड़े जा रहीं हैं
टूटी हुई चूडियाँ
ढहे हुए घर
बिकी हुई दुकानें
खून के सूखे पपडे
गुर्राती हुई भूख
फटे हुए कपड़े
टकटकी बांधे हुई आँखें
सबकुछ पिघला देने वाली सर्दी
और सबकुछ जमा देने वाली गर्मी

हवाएं अपने ही क़दमों तले रौंदी जा रही हैं
वो रोते रोते मर रहीं हैं
और मरते-मरते रो रहीं हैं

बिन हवाओं के जीना कितना सुखद होगा न !
धडकनों और साँसों की जेल से बाहर
हरे मैदान में टहलने जैसा

बेहद कमज़ोर कविता के बेहद मज़बूत हिस्से में
मैं तुमसे बता रहा हूँ
कि तुम्हारे भीतर खून की जगह
गहरे काले राज़ बह रहे हैं
और मेरे भीतर एक ख़ामोशी है
जो लगातार बोल रही है
कोई उसे चुप क्यों नहीं करता!!

एक जंगल है जहाँ आवाजों के बड़े-बड़े पेड़ हैं
और सन्नाटों के लंबे-लंबे रास्ते
मैं अकेला हूँ तुम्हारे साथ
और तुम अकेले हो मेरे साथ

इसलिए सुनो!
तुम चले जाओ
मुझे खुद से बातें करनी है
मुझे हत्याएं करनी हैं
नंगा होना है
बिलकुल नंगा
मुझे डायरी लिखनी  है
नाजायज़ संतानें पैदा करनी हैं
और उन्हें मारना है

जाओ तुम चले जाओ
मुझे साँसों के फंदों पर लटकना है
एकांत का ज़हर पीना है
और कुछ लिखते-लिखते मर जाना है

तुम्हारा--अनंत  

मंगलवार, मार्च 19, 2013

खून में कांच बह रहा है.....

दुनिया जब दिल की बात करती है
उस वक्त मुझे सिर्फ सन्नाटा सुनाई देता है
और मैं रोना चाहता हूँ
पर हँस पड़ता हूँ
चुप रहने की फ़िराक में कुछ कह पड़ता  हूँ
पर क्या ?
पता नहीं
शायद अपना आधा नाम
और तुम्हारा पूरा पता

हर शाम काँच से सारे शब्द टूट जाते है
और मैं उन्हें खून के घूँट के साथ पी जाता हूँ
दूर रेडियो पर कोई प्यार का गीत बज रहा होता है
और मैं कुछ याद करने की कोशिश में सब कुछ भूल जाता हूँ

एक बात तुम्हे बताता हूँ, तुम सबको बता देना
मेरी आत्मा तक सबकुछ छिल जाता है
जब प्यार जैसा कोई शब्द मेरे भीतर जाता है
मैं रोना चाहता हूँ
पर हँस पड़ता हूँ
जैसे मानो मेरे भीतर बहता हुआ लहू
किसी का किया कोई बेहद भद्दा मज़ाक हो

जो हवा मेरे आस-पास है
वो मुझसे धीरे से कहती है
कि मेरा दिल एक बंद बक्सा है
जिसमें कुछ नहीं है
सिवाय एक ज़ख़्मी सूरज
और बहुत सारे अँधेरे के

यादों की परछाइयाँ भी हैं वहाँ
पर उनका होना
न होने को ज्यादा प्रभावित नहीं करता

वहाँ कोई आदमी नहीं हैं
पर आदमियों के नामों की आहटें हैं
जो रह रह कर धड़कतीं हैं
मेरे सीने की धडकनों की लय पर

आईने में कुछ साफ़ नहीं दीखता
मैं हूँ या तुम
या फिर कोई तीसरा
जिसकी शक्ल हम दोनों से मिलती है

आईना मुझे तोड़ देता है
और मैं बिखर जाता हूँ
जैसे किसी ने बेर खा कर
गिठलियां बिखेर दीं हों फर्श पर
हर गिठली में मैं हूँ
और मेरा दर्द है
जिसके सिरहाने बैठ कर रात, रात भर रुदाली गाती है
और मैं उसे देखता रहता हूँ
जैसे कोई बच्चा इन्द्रधनुष देखता है

दिल की दिवार पर एक बरगद उग आया है
जिसकी जड़ें तुम्हारी आँखों में समाईं हैं
तुम जब आँखे बंद करती हो
बरगद की शाख पर टंगी
मेरी तस्वीर का दम घुटने लगता है

दुनिया और तुम
दो परस्पर दूर जाते हुए बिंदु हो
और मैं
दुनिया और तुम्हारे बीच खिचता हुआ बिजली का तार
मैं ठहरा खड़ा हूँ
और मेरे भीतर से बिजलियाँ दौड रहीं हैं
मेरे आँखों में अँधेरा भरा हुआ है
और खून में कांच के टुकड़े बह रहे हैं

मैं किसी ज़ख़्मी कविता की तरह हो गया हूँ
और प्यास में लिथड़ा हुआ
खुद से कहीं दूर पड़ा हूँ

तुम्हारा-अनंत

सोमवार, मार्च 11, 2013

मन की मौत का मातम....

मैं एक रुकी हुई घड़ी के नीचे
अधखुली खिडकी पर खड़ा हूँ
बाहर सिर्फ धुआं और सपने हैं

मेरे दिमाग में आग का दरिया बह रहा है
और मन आपरेशन थियेटर हो गया है
जहाँ तितलियाँ घुस आयीं है
सारे रोगी फूल बने बैठे हैं
और डाक्टर बच्चों की तरह खेल रहें हैं

मेरा आधा हिस्सा शायर हो गया है
और आधा हिस्सा कायर है
मेरे भीतर शायर और कायर जब खींचातानी करते हैं
उस वक्त मुझे
एक पुराना कमरा दिखाई पड़ता है
जहाँ एक फूटी ऐनक फर्स पर पड़ी है
और एक हांफती हुई औरत है
जो खूबसूरत है पर लगती नहीं

वो कुहरे से बनी एक लड़की को समझा रही है कि
दुनियां रुई का फाहा
कबूतर का पंख
और साबुन का बुलबुला नहीं है
उसे एक सेकेण्ड में एक हज़ार सपने नहीं देखने चाहिए
उसे खुद को राजकुमारी
और खूबसूरत लड़कों को राजकुमार नहीं मानना चाहिए

वो लड़की कुछ नहीं मानती
और अँधेरा सबकुछ डूबा ले जाता है
और मैं पसीने में भीग जाता हूँ

पसीने का दलदल बन जाता है
जिसमे एक लड़का फंसा हुआ है
और उसके पास बैठा एक अधेड़ गांजा पी रहा है
जब लड़का फूट कर रोता है
तो वो अधेड़ फूट कर हँसता है
ये फूट कर रोना और फूट कर हंसना
मुझे तोड़ देना चाहता है

मुझे ब्रहमांड से गलियां पड़तीं हैं
मेरे शरीर से दुनिया की सबसे खराब गंध आती है
और मैं चुल्लू भर आंसू में डूब कर मर जाना चाहता हूँ

मैं दौड कर दराज़ खोलता हूँ
जहाँ चाकू के ऊपर रामायण रखी है
मैं रामायण निकाल कर बिना माथे लगाए
न जाने कहाँ फेंक देता हूँ
और ग़ालिब के दीवान से दो शेर पढ़कर
उन्हें भाप बना देता हूँ

अब तक मैं पागल हो चुका होता हूँ
दुनिया का रंग काला पड़ चुका होता है
सारे रंगों को फांसी हो गयी होती है
लोहा साँसों में बहने लगता है
और धड़कने जंजीरों से जकड जातीं हैं

मैं पाश और धूमिल को बगल में दबाकर
गोदार्द का सिनेमा देखने लगता हूँ
मुझे जाने-पहचाने चेहरों वाले अजीब लोग घेर लेते हैं

मेरे भीतर का शायर
कविता लिखने लगता है
आग लगाने लगता है
फिल्मे बनाने लगता है
चीखने-चिल्लाने लगता है
दुनिया हाथों से पलटने लगता है
और सब कुछ बदलने न जाने कहाँ चला जाता है

मेरे भीतर का कायर सबकुछ चुपचाप देखता रहता है
और रुकी हुई घड़ी के नीचे वाली
अधखुली खिडकी से कूद कर जान दे देता है

मैं वहीँ पड़ा रह जाता हूँ
जैसे जान निकलने के बाद
एक लाश पड़ी रहती है


तुम्हारा--अनंत

सोमवार, फ़रवरी 11, 2013

समय की मौत पर मुर्दे राष्ट्रगान गा रहे हैं..

समय ने जिस समय मुझसे कहा कि
उसे किसी भी समय
गोली मारी जा सकती है
या फांसी पर चढ़ाया जा सकता है

उस समय मैं रो रहा था
नारे लगा रहा था
या मिठाइयाँ बाँट रहा था
मुझे ठीक से याद नहीं !
पर मेरे कदम जमीन पर जमे थे
और जमीन के भीतर
कदम ताल तेज हो गयी थी

कुछ लोग बाहर निकलने वाले थे
जिन्हें गोली मारी जानी थी
या फांसी पर चढ़ाया जाना था
इनका चेहरा किसी देश के नक़्शे की तरह था
और इनका नाम किसी देश के नाम की तरह
इन्हें न गिना गया था
और न गिना जा सकता था

दांतों पर भाषा के तार कस दिए गए थे
और आँखों में पैनी शर्म भोंप दी गयी थी
गिलास में खून था या तेज़ाब पता नहीं
पर उसे पीना, जीने के लिए शर्त हो गयी थी
हर सांस पर एक घूँट लगानी थी और कहना था
भारत माता की जय!!

पर जब सांस लेने का मन भी न कर रहा हो
तब कोई भारत माता की जय!
कैसे कह सकता है
और वो हैं कि कहते हैं
राष्ट्रगान गाओ
देश के दुश्मन मारे जा रहें हैं
नाचो गाओ
खुशी मनाओ

फिर खेत की बालियाँ
घाटियों की बर्फ
रेगिस्तान की धूल
और समुद्र का पानी
अपनी ख़ामोशी को मार कर पूछतें हैं कि
राष्ट्र क्या है ?

जिसके नाम पर तुम कहते हो कि
रोने की जगह हंसना है
और जाते हुए लोगों को देख कर हाँथ नहीं हिलाना है
सच कहने का दिल करे तो जीभ काट लेना है
या फिर जंगलों में चले जाना है
और तुम्हारी गोलियों और फांसियों इंतज़ार करना है

और इस तरह जब तुम गा रहे होगे
"मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा"
उस वक्त चुप रहने या कुछ न कहने पर
तुम राष्ट्रद्रोह समझोगे
मैं जानता हूँ!

और मैं ये भी जानता हूँ
कि दंतेवाडा से लेकर जंतर मंतर तक
समय की शक्ल में, मैं ही मारा जाऊंगा
और तुम गाओगे
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा..

उस वक्त मेरा मन कर रहा होगा कि
मैं शोक गीत सुनूं
मौन सुनूं
या फिर नारों की आवाज़ हो
भीड़ की कदम ताल हो
ज़मीन फोड कर निकले
लोगों की ललकार हो

पर उस वक्त गया जायेगा
राष्ट्रगान!!
और सबको बना दिया जायेगा बुत
हाँथ बंधे होंगे
आँखे बंद होंगी
और सांस इतनी धीमी होगी कि
वो महसूस भी न की जा सकेंगी

और उसी समय जब
सब मरे हुए लोगों की शक्ल समय से मिलने लगेगी
गोलियाँ बरसायीं जाएँगी
या सबको फांसी पर चढा दिया जायेगा
और कहा जायेगा कि
देश के दुश्मन मारे जा रहे हैं
खुशी मनाओ
नाचो गाओ

तुम्हारा अनंत

रविवार, जनवरी 27, 2013

मैं तुमसे मिलने नहीं आता...

आधी रात के उस पार
जहाँ शोर का झरना
चुप-चाप बहता है
और एकांत के वृक्ष
लगातार बोलते रहते हैं
वहीँ तुम रोज मेरा इंतज़ार करती हो
मैं जानता हूँ

पर मैं नहीं आऊंगा
क्योंकि तुम कहोगी कि
तुम्हारी हथेलियाँ रेत की बनी हैं
और आँखें ठहरा हुआ पानी हैं
इसलिए तुम मेरी चुकती हुई नब्ज़
और पिघलता हुआ वजूद
महसूस नहीं सकती

ये कहते हुए
जब तुम हँसोगी
सच कहता हूँ मेरा मन करेगा
कि  तुम्हारी हथेलियों की झरती रेत में दब कर मर जाऊं
या फिर तुम्हारी आँखों के ठहरे हुए पानी में डूब जाऊं

पर मैं जीना चाहता हूँ
अपने शब्दों को पक्षी
कविता को आकाश
दर्द को धरती
और खुद को तुम बनाना चाहता हूँ

इसीलिए आधी रात के उस पार
जहाँ शोर का झरना
चुपचाप बहता है
और एकांत के वृक्ष
लगातार बोलते रहते है
मैं तुमसे मिलने नहीं आता

तुम्हारा--अनंत

मंगलवार, जनवरी 01, 2013

मैं कपास नहीं बनना चाहता !!!!!

मेरी माँ लोरी सुनाते वक्त 
रोटी खिलाते वक्त 
मेरे कपड़े पछीटते वक्त 
और मुझे पीटते वक्त 
चाहती है कि मैं कपास बन जाऊं 
मुझे दीपक की बाती बनना है 
और कुल को उजाला करना है 

कुल एक अँधेरा कमरा है 
जहाँ कितने भी दीपक जला दो 
अँधेरा बना ही रहता है
और बनी रहती है
इस कमरे को रोशन करने की फ़िकर
जो मुसलसल रेंगती चली जाती है
एक पीढ़ी से अंतिम पीढ़ी तक

मैं कैसे समझाऊं कि ये वक्त
माचिस की तीलियों का वक्त है
लोहे का वक्त है
दलदल और चौराहों का वक्त है
कपास जीते जी मार दिया जायेगा
या मारते-मारते जिलाया जायेगा
इसलिए मेरे भीतर का कपास
माचिस की तीली या लोहा बन जाना चाहिए
ये उतना ही जरूरी है
जितना कोई भी गैरजरूरी काम जरूरी होता है

वो मुझमें दिल्ली देखना चाहती है
पर मुझमे दंतेवाडा, झारखण्ड और देश भर के जंगल उग आये है
वो चाहती है कि मैं सागर बन जाऊं
और सारी नदियों की नियति हो जाऊं
पर मैं नदियों को विद्रोह सिखाने में लगा हुआ हूँ
वो चाहती है कि मैं जो चाहूँ वो मुझे मिल जाये
मैं चाहता हूँ जो चाह कर भी कुछ नहीं चाह पाता
उसका चाहा उसे मिल जाये

वो किसी राम भगवान से मनाती है
कि मुझे सद्बुद्धि दे
मैं एक लिजलिजे डर से भर जाता हूँ
और सपने में एक गर्भवती महिला को जंगलों में छोड़ने चला जाता हूँ
जब नीद तोड़ कर उठता हूँ
तो पाता हूँ कि मैं भगवान बन चुका हूँ
और मेरे कुल का कमरा उजाले से भर गया है
दीवारों पर मेरे नाम के नारे हैं
और लोगों के दिल में मेरे नाम का भ्रम

मैं माँ की आँखों में एक सुकून देखता हूँ
उसकी इच्छाओं, कुंठाओं, प्रेमों और पूर्वाग्रहों में लिथड़ा हुआ कपास मुस्कुराता है
जिसकी सकल मुझसे हूबहू मिलती है

यकीन मानिये मैं चीख उठता हूँ
मैं कपास नहीं बनना चाहता !!!!! 


तुम्हारा--अनंत 

शुक्रवार, दिसंबर 28, 2012

तुम मर नहीं सकती ....

दिल्ली में बलात्कार नाम की एक घिनौनी कायरता की शिकार हुई और सम्पूर्ण पित्रसतात्मक मानसिकता में कैद समाज को झझकोर देने वाली, मेरी जुझारू दोस्त के संघर्ष के पक्ष में खड़ी ये कविता.

सब कहते हैं कि तुम मर गयी 
दम तोड़ दिया तुमने 
तुम बच भी जाती तो एक जिन्दा लाश बन कर जीती 
संसद में “महिला “स्वराज” की एक प्रतिनिधि ने कहा था.
और तुमने पाया था कि एक महिला भी पुरुष हो सकती है.

जब तुम लड़ रही थी उस सरहद पर 
जहाँ मर्द और औरत के बीच दिवार खड़ी है.
और औरत की आज़ादी उसकी नींव में गड़ी है
तब देश की सब औरतों ने पसारे थे पंख 
निकाले थे पाँव, चीख कर चिल्लाईं थी.
कि हमें ये दिवार ढहानी है
और दीवारों की ओर दौड कर टकरा गईं थी
उलझ गईं थी उस दिल्ली से जो पुरुष है

जब तुम लड़ रही थी,
किसी दुर्गा, काली, चंडी की तरह नहीं,
बल्कि खुद की तरह
तब घर से ले कर बाहर तक लहराई थी
वो कलाईयाँ, मुट्ठियाँ बन कर
जो 
तब से पहले महज़ चूडियाँ खनकाती थी

सारे फांसी के फंदे चटक कर गिरने वाले थे
सारे पिंजरे टूटने वाले थे
और वो परछाइयाँ जल कर भष्म होने वाली थीं
जिनमे आधी आबादी कैद है
कि तुमने शरीर का चोला उतर दिया
आवाज़ बन गयी,
शरीर की बेड़ियाँ काट कर रूह हो गयी तुम
नदी की तरह
हवा की तरह
आग की तरह
अब लड़ोगी तुम, शरीर की बंदिशों से आजाद हो कर
मैं जानता हूँ

मैं जानता हूँ कि वो मर नहीं सकती
जो आधी आबादी के पंख में धार कर सकती हो
पाँव की बेड़ियों पर हथौड़े से वार कर सकती हो
हर पल सांस की तरह मौत देने वाले
फांसी के फंदे को तोड़ कर गिरा सकती हो
वो मर नहीं सकती

मैं जानता हूँ
तुम एक शरीर छोड़ कर आधी आबादी हो गयी हो
तुम इस लड़ाई के अंतिम क्षण तक लड़ोगी
मैं जानता हूँ
तुम कहीं नहीं गयी हो
मैं जानता हूँ
तुम उन सब में जिन्दा हो
जो जिंदगी को बराबरी का मतलब देना चाहते है
मैं जानता हूँ
तुम मर नहीं सकती

तुम्हारे संघर्ष से प्रेरणा लेता और तुम्हे सलाम करता तुम्हारा दोस्त-अनुराग अनंत


http://www.jagran.com/news/national-timeline-of-delhi-gangrape-9989114.html

रविवार, दिसंबर 23, 2012

"वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें.....

सागर की अतल गहराई से
आती है स्कूल की प्रार्थना की आवाज़
छुट्टी की घंटी की टन-टन-टन....
किसी कटी पतंग के पीछे भागते बच्चों का शोर
कच्चे घरौंदों की खुशबु
और बहुत कुछ
जिनका नाम लेना साइनाइड चाट लेने जैसा है

मैं सागर हूँ
और अतल गहराई, वो यादें
जिनमे याद करने लायक कुछ भी नहीं
सिवाय उस पंक्ति के....
"वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें.....

सागर और गहराई के बीच
खड़ी है माँ
और उसकी आँखें
इन सब के ऊपर छाई है मेरी बेकारी
और वो पंक्ति
"वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें.....

माँ के हाथों की बनाई रोटी
एक कुत्ता छीन ले गया है
वही कुत्ता जिसने मुझे
"वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें.....
गाते सुना और काट लिया था

घर अब घर नहीं लगता
वो फंसी का तख्ता लगता है
जहाँ भगत सिंह नाम के किसी आदमी को फांसी हुई थी
या फिर हरे खेत का वो कोना लगता है
जहाँ पाश को गोली मारी गयी थी
मैं खूब चाहता हूँ कि
वो मेरे बचपन के खेल का मैंदान लगे
जहाँ मैंने सीखा था कि कैसे सीखना चाहिए
वो कोचिंग की बोरिंग क्लास लगे
जहाँ मैंने अनुभव किया था कि लड़कियों की आँखों में जादू होता है
और न्यूटन और पाईथागोरस पागल थे
पर बहुत चाहने के बाद भी घर मुझे वो जंगल लगता है
जहाँ एक सागर
अतल गहराई में समा जाना चाहता है
खो जाना चाहता है
किसी रंग में जिसका नाम अभी खोजा जाना बाकी है

मेरी माँ का बेटा
कहीं खो गया है
दीवारों के नारों ने
अखबारी कतरनों ने
और जंगल से आने वाली
नदियों, पहाड़ों और आदमियों की आवाज़ों ने
न जाने उसे कहाँ ले जा कर छोड़ा है
मेरी माँ उसकी आवाज़ नहीं सुन पाती
सुन पाती है तो बस वो पक्तियां

"वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डंट जावें..... की सतत अनुगूंज

वो मेरी ओर देखती है
अब मैं क्या बोलूं
वो जाने और उसका बेटा जाने
मैं तो सागर हूँ
जो अपनी अतल गहराई में खोया हुआ है
साइनाइड चाट के सोया हुआ है

तुम्हारा- अनंत

मंगलवार, दिसंबर 18, 2012

मेरे भीतर का मर्द मार दिया जाए..............

आज बहुत शर्मिंदगी हो रही है हर उस चीज से, जो मुझसे और सबसे बिना कुछ कहे ही कह देती हैं कि मैं मर्द हूँ. मैं आज हर उस चीज को खुद से अलग कर देना चाहता हूँ जो मुझे मर्द बनाती है. क्योंकि मर्द होना जानवर होना होता है. कुछ ऐसा ही लगने लगा है मुझे, जब से दिल्ली की सड़कों पर चलती बस में उस लड़की का  बलात्कार हुआ है जिसका नाम मैं नहीं जानता हूँ.पर मैं इतना जनता हूँ कि वो एक लड़की थी, एक इंसान थी, मैं ये नहीं कहूँगा कि वो एक बहन थी, एक बेटी थी, एक ये थी, एक वो थी, गंगा की तरह पवित्र थी, धरती की तरह गरिमामयी थी, और ऐसे ही अनाप-सनाप के उपमाएं मैं नहीं गढूंगा, क्योंकि मैं जान गया हूँ कि ये मर्दों की और उनकी व्यवस्था की साजिश है. एक ऐसा जाल जिसमे एक लड़की फंस कर अपना वजूद खो देती है. 

मेरे लिए वो एक लड़की थी, एक लड़की, जिसका अपना वजूद था जो हमारे आपके और किसी और के बताये हुए परिभाषिक सांचों से बहार अपना रूप-रंग, आकार, गढ़ने को अमादा थी और पूरी ताकत से लैस भी. पर एक कायरता का शिकार हो गयी. जिसे हमारा सभ्य-समाज सामूहिक बलात्कार, गैंगरेप जैसे मर्यादित नामों से जानता है. मर्यादित इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि  ऐसे ही कई प्रतापी काम करके हमारे नेता संसद के मंदिर में पहुंचे है और संविधान, क़ानून और व्यवस्था का घंटा बजा रहे  है.  

सच में आज मैं दिल से चाहता हूँ कि मुझे और इस पूरी पित्रसतात्मक व्यवस्ता को थोडा-थोडा ज़हर पिलाया जाये, थोड़ी-थोड़ी फाँसी दी जाये. थोडा-थोडा जलाया जाये, मैं चाहता हूँ कि हम सब का थोडा थोडा बलात्कार किया जाए. इस बार हमें बच कर कतई निकलने न दिया जाये. 

मैं चाहता हूँ कि वो लड़की जो पीलीभीत की रहने वाली है, जो रविवार 9:30 बजे रात से पहले ये सोचती थी कि दुनिया सुन्दर है, जिसने पढ़ रखा था कि जब किसी अबला की इज्ज़त  पर बन आती है तो भगवान कृष्ण उसकी इज्ज़त बचने के लिए आ जाते है. जो आकाश छू लेना चाहती थी. जो दिन में कम से कम 24 बार शादी के सलोने सपने देखा करती थी. जिसने G.K.  की किताब  से बचपन में ही, दिल्ली देश की राजधानी है और यहाँ पर कानून बनाये जाते है यहाँ पर संसद है, देश भर के चुने हुए अच्छे लोग (नेता) यहाँ पहुँचते है, ऐसे ही कई लघु उत्तरीय प्रश्न  रट लिए थे.

मैं चाहता हूँ कि  वो लड़की जो अभी दिल्ली के शफदरगंज  अस्पताल में वेंटिलेटर पर लेती है और किसी भी पल कोमा में जा सकती है. वो लड़की जिसने जिंदगी का असली चेहरा देख लिया है और अब कतई नहीं कह पायेगी कि दुनिया सुन्दर है. वो लड़की जिसका विश्वास और इज्ज़त लूटी गयी और कृष्ण नहीं आये और उसने कृष्ण को गीता में जितने श्लोक है उतनी गलियां और उलहने दिए होंगे  

मैं चाहता हूँ कि वो लड़की जिसके जहन में अब कोई सपना नहीं पनपेगा. जो अपने साथ घटी हकीकत से कभी बहार नहीं निकल पायेगी. वो लड़की जिसने बचपन में G.K. की किताब  से रटे सारे लघु उत्तरीय प्रश्न भुला दिए होंगे और दिमाग में लिख लिया होगा कि दिल्ली में सिर्फ दरिंदे बसते है. 

मैं चाहता हूँ वो लड़की दुर्गा, चंडी, काली, फूलनदेवी, या ऐसा ही कुछ बन कर सारे देश की औरतों की  सेना ले कर आये और  मेरे भीतर के और इस समाज के भीतर के मर्द को मार दे. 

सच कहता हूँ मैं आज उस लड़की के हांथो मर जाना चाहता हूँ. क्योंकि उसे अधिकार है कि वो हमें एक लाइन से खड़ा  करके गोली मार दे या फिर लाल किले के बुर्ज पर हमारे शीष  काट कर टांग दे. क्योंकि हम इस समाज के हिस्से है और चुप्पे भी. चुप्पी की सजा मौत होती है.  


मेरे भीतर का मर्द मार दिया जाए..............

तुम दिल्ली के किसी अस्पताल में
वेंटिलेटर पर पड़ी हो
किसी भी पल कोमा में चली जाओगी

ऐसा कहा है अखबार ने,
टीवी पर तुम जैसी एक लड़की ने
रेडियो भी कह रहा था, यही बात

सुनो! मुझे तुमसे शिकायत है
हाँ! सीता
द्रोपदी 
अहिल्या
मलाला यूसुफजई
सोनी सोरी
मनोरमा मणिपुरी 
जो भी तुम्हारा नाम हो 
मुझे तुमसे शिकायत है !

तुम वापस क्यों नहीं आती
दुर्गा, चंडी, काली
उदा पासी
फूलन देवी
या ऐसी ही कुछ बन कर

मैं चाहता हूँ 
कि मेरे भीतर के मर्द को तुम मार दो ! 
वो भी था
दिल्ली की उस चलती हुई बस में 
जहाँ तुम्हारे एहसासों के परिंदों के पर काट दिए गए 
और उनके  मरे हुए चेहरों पर लिख दिया गया 

दुनिया दरिंदों की है! 

मैं तुम्हें बुला रहा हूँ 
तुम आना जरूर आना 
और मेरे भीतर के मर्द को 
ज़हर देना 
जला देना 
फाँसी देना 
बलात्कार कर देना 
या फिर ऐसा ही कुछ जो तुम्हारे मन में आए

पर तुम आना जरूर 
क्योंकि मैं चाहता हूँ 
कि मेरे भीतर के मर्द को मार दिया जाए

वेंटिलेटर पर पड़ी मेरी दोस्त---तुम्हारा अनंत 

खबर की  लिंक


शुक्रवार, दिसंबर 14, 2012

उसकी आँखों के मकतब मे......


उसकी आँखों के मकतब मे  मोहब्बत पढ़ के आया हूँ,
मैं कतरा हूँ दरिया का, सहरा से लड़ के आया हूँ,
काटा था पर सैयाद ने कि उड़ न सकूँगा ,
जो उसने बुलया तो मैं उड़ के आया हूँ,
एक डायरी मे रख कर, उसने मुझे गुलाब कर दिया,
खोला जो किसी ने तो फूल से झड़ के आया हूँ,
मैं एक सूखी  हुई पंखुरी हूँ, तो क्या हुआ, मुझे होंठों से लगा लो,
कसम खुदा की मैं खुद को मोहब्बत से मढ़ के आया हूँ
एक हरा -भरा दरख्त था मैं किसी जमाने मे,
किसी ने मेरी छाँव यूं खींची कि  उखाड़ के आया हूँ,
यूं तो कोई गरज न थी मुझे तुम्हारी महफिल मे आने की,
पर क्या करू मैं तुम्हारी मोहब्बत मे पड़ के आया हूँ ,

तुमहरा--अनंत 

एक उजड़ा शहर .....


उसका असर कुछ इस कदर हो गया है,
कि असर का असर भी बेअसर हो गया है,
इस लुटे हुए दिल को कोई दिल क्यों कहेगा,
ये दिल तो एक उजड़ा शहर हो गया है,
राहें और मंजिल जिसकी दोनों ही गुम हैं,
वो मदमस्त राही बेफ़िकर हो गया है,
जो समंदर की सोहबत में रह करके लौटा,
वो थोड़ा सा साहिल, थोड़ा लहर हो गया है,
ये बद्हवास ख्वाबों की दौड़ थमती नहीं क्यों,
आज आदमी खुद एक सफ़र हो गया है,
तुमने लालच से उसे ऐसा मैला किया है ,
कि जो पानी था अमृत, वो जहर हो गया है,
तुम्हारा--अनंत

इंसानियत का नशा.......


मैं रात-ओ-दिन एक अजब ज़ंग लड़ता हूँ,
मैं अपने लहू से अपनी गजल गढ़ता हूँ,
वो बेवफा हो गया तो क्या हुआ ''अनंत''
मैं उसके खातिर अब तलक दिल मे वफा रखता हूँ,
वो मिलता है तो मुँह पर दुआ और दिल मे मैल होती है,
मैं जब भी मिलता है ,दिल आईने सा सफा रखता हूँ,
शायद यही वजह है जो इस घाटे के दौर मे भी,
मैं यारों की दौलत और मोहब्बत का नफ़ा रखता हूँ,
जला है जब से नशेमान मेरा मैं नशे मे हूँ ,
अब हर वक़्त बस मैं इंसानियत का नशा रखता हूँ
तुम्हारा---अनंत

शनिवार, सितंबर 29, 2012

झोंको से झुक जाते हैं.....गज़ल

इस भीड़ में चल चल कर लोग थक जाते है,
उन्हें पता भी नहीं चलता और वो बिक जाते हैं,
झुकने का चलन कुछ इस कदर से चल निकला है यार,
कि जो तूफानों में नहीं झुकते थे, अब झोंको में झुक जाते हैं,
कोई मजलूम कुछ बोले, तो उन्हें बदतमीज़ी  लगती है,
वो दौलत के नशे में, जो मुंह में आए बक जाते हैं,
संभल कर चलते हैं, लोग राह-ए-खार पर ''अनंत''
पर जब पैरों तले गुल पड़ते है तो बहक जाते हैं,
डर लगता हैं हमें अय्यारों की इस बस्ती में,
यहाँ खुली बाहों के चमन, कफ़स में बदल जाते हैं,
कुर्सी के आशिकों ने तुर्फ़ा  तरीके तलाशे खूब,
कभी हिन्दू के घर जलते है, कभी मुस्लिम के घर जल जाते हैं,
कोई मिले यहाँ जो  समझदार-ओ-वफादार मुझको,
मैं पूछूं, जो बरसते हैं समन्दरों पर, कैसे रेगिस्तान पर चुक जाते हैं,

तुम्हारा--अनंत 

शुक्रवार, सितंबर 28, 2012

मैं इंसान हूँ,......ग़ज़ल

ये आँखों का अश्क नहीं पागल,
ये मेरे दिल का दर्द बहता है,
बताते है ये अश्क, कि मैं इंसान हूँ,
वरना कहाँ कोई पत्थर कभी रोता है,
मशीन बना दिया आदमी की भूंख ने उसे,
वो देखो आदमी-आदमी का बोझ ढोता है,
क्यों बेघर है राजगीर, जुलाहा क्यों नंगा है,
आखिर क्यों किसान भूखा पेट सोता है,
हंसता है क्यों ये ऊंचा महल झोपड़ी पर,
आखिर झोपडी का भी अपना कोई वज़ूद होता है,
चल साथ मेरे साथी, हम मिल कर लड़ेंगे,
क्यों बेसबब अश्कों से, अपना दामन भिगोता है,

तुम्हारा- अनन्त 

गुरुवार, सितंबर 20, 2012

भरम का चराग ................

बहते हुए पानी में भरम का चराग था. 
बेदाग़ समझ बैठा जिसे, उसके दामन में दाग था,
ज़िन्दगी अपनी सौंपी थी, जिसे मोहब्बत के नाम पर,
जालिम था, वो जुल्मी था, बड़ा ज़ल्लाद था,
हम जिसे इश्क समझ कर फ़साना बुनते रहे, 
वो तो उसके  लिए बस एक अदना  मजाक था,
मेरा दिल कुछ भी नहीं था उसके  लिए,
राह पर पड़ा बस  इक ढेर-ए-ख़ाक था,
आँखों से बह कर सूख गया जो गालों की रेत पर,
वो कोई कतरा-ए- अश्क नहीं था, मेरा ख्वाब था,
मिल कर उससे वो लज्जत न मिली, मिलने की,
ये दिल बेवजह उससे  मिलने को बेताब था,
जला दिया जिसने मुझे और मेरे अरमानों को,
वो हुस्न का एक बहता हुआ दरिया-ए-तेज़ाब था,

तुम्हारा--अनंत 


बुधवार, सितंबर 19, 2012

खुद को लूट जाता हूँ......गज़ल

मैं गहरे से गहरे समंदर की गहराई नाप लेता हूँ,
पर न जाने क्यों तेरी आँखों में अक्सर डूब जाता हूँ,
तेरे संग  मुझे हर सांस रंगीन लगती है,
तेरे बिना मैं सांस लेने में भी ऊब जाता हूँ,
मिलता हूँ जब तुझसे जिंदा हो जाता हूँ,
तेरे बिछड़ते ही लावारिश लाश सा छूट जाता हूँ,
मुझे आहिस्ते से छू, यूं धक्का न मार यार, 
जरा से धक्के से मैं कांच सा टूट जाता हूँ,
दर्द बढ़ जाता है, जब-जब रोने को दिल करता है,
बन कर ग़ज़ल कागज़ पर फूट जाता हूँ,
निकलता हूँ मैं तनहा रातों में वारदात करने को,
डालता हूँ खुद के घर डाका, खुद को लूट जाता हूँ,
मिलती नहीं है छांव किसी ठांव अब ''अनंत''
छांव के घर भी जाता हूँ, तो धुप  पाता हूँ,

तुम्हारा--अनन्त 

बुधवार, अगस्त 08, 2012

तुम बहो झरने की तरह

एक भंवर है या धुआं या जाल,
न जाने क्या है ये,
जहाँ मैं हूँ और बस तुम्हारी याद है,

ख्वाईसें ज़मीदोज़,
हसरतें  लापता,
चाहतों की दरगाह सूनी,
और मैं तन्हा,
तुम्हारी यादों के साथ हूँ,

मुझे तन्हा रहने दो,
कम से कम  तबतक,
जबतक तुम खुद न तोड़ दो,
इस तन्हाई का भंवर,
धुँआ या जाल,
जो कुछ भी है ये,

तुम बहो झरने की तरह मेरी नसों में,
और मैं नदी बन जा मिलूं  सुकून के सागर में,

तुम्हारा--अनंत


गुरुवार, मई 10, 2012

परछाई..........

लाल  कैनवास  पर  ,
सबसे  ऊपर  एक छड़,
नापने के लिए लगी हुई है,
उसके नीचे औंधे मुंह लेटी औरत,
कुल जमा कद 5 फुट 2 इंच,

महज एक जिस्म,
जिस्म का तिलस्म,

हाँथ में एक काँच का गिलास,
गिलास में समुद्र और आकाश,
बेतरतीब बिखरी हुई प्यास,

परछाईं  के एक डंडे  से भी फोड़ा जा सकता है गिलास ,
और बह सकती  है एक छाया,
एक अदद प्यास,
उसी औरत की,
जो औंधे मुंह लेटी है,
नापने वाली छड़ के नीचे,
नपते  हुए,

शांत, सिसकती, पिघलती,
प्यास में लिथड़ी हुई परछाई में,
मैंने तड़पती हुई मछलियाँ देखीं है

तुम्हारा-- अनंत

सोमवार, अप्रैल 23, 2012

लड़की!

लड़की! 
उडती हुई चिड़िया के पर गिन रही है,
उसे यकीन है,
कि एक दिन,
वो भी उड़ सकेगी,

लड़की!
बहती हुई धार की चाल देख रही है,
उसे यकीन है,
कि  एक दिन,
वो भी बह सकेगी, 

लड़की!
धधकते हुए अल्फाज चुन रही है,
उसे यकीन है,
कि एक दिन,
इन्हें वो भी कह सकेगी,

लड़की!
बंद कमरे में कुछ लिख रही है,
उसे यकीन है,
कि एक दिन,
इन्हें सब के सामने  पढ़ सकेगी,

लड़की!
खुली आँखों से सपने देख रही है,
उसे यकीन है
कि एक दिन,
इन्हें वो भी जी सकेगी,  

तुम्हारा--अनंत  


रविवार, अप्रैल 22, 2012

एक मेमना कल मार दिया गया है,

एक मेमना कल मार दिया गया है,
डूबते सूरज को साक्षी करके,
शहर के आखरी छोर पर,
उसके कान में कहा गया,
कि तुम झूठ के जाल में,
फंसे हुए एक कीड़े हो,
इसलिए तुम्हे मर  जाना चाहिए,

बिना आंगन वाले घर के छत पर,
चढ़ कर चाँद ने सीढियों से नीचे झाँका,
दो जिस्म, एक मेमना और एक मोबाइल,
बरामद हुए थे,
रात के उस प्रहार,
जब सब सो रहे थे,
प्रेमपत्र पर लिखे गए,
बेमानी जज्बात की  तरह,

प्रेम के अचार को;
चाटा गया, चूसा गया,
और फिर फेंक दिया गया,
सीढियों  के नीचे,

मेमना एक जिस्म के साथ चला गया,
मोबाइल एक जिस्म के साथ,
चूसा और चटा हुआ;
प्रेम का अचार पड़ा रह गया,
सीढियों के नीचे,

गुलाबी एहसासों वाले प्रेम को;
नीली फिल्म बनते देर नहीं लगती,

देखा था जिसे कल चाँद ने,
आज सारी दुनिया देख रही है,
विस्वास की जलती चिता में,
आँखें सेंक रही है,

छोटे शहर के,
एक बड़े अस्पताल में,
एक छोटा सा, बड़ा काम कर दिया गया है,
एक मेमना कल मार दिया गया है,

तुम्हारा--अनंत 

गिरफ्त

चाय से चाय छान कर अलग कर दें,
तो काली चाय बचती है,
ठीक उसी तरह जैसे ;

भूख से भूख छान कर अलग कर देने पर,
काली भूख बचती है,

काली चाय में जितना दूध मिलाया जाता है,
काली चाय उतनी ही सफ़ेद हो जाती है,

काली भूख में जितनी रोटी  मिलाई  जाती है,
काली भूख उतनी ही सफ़ेद हो जाती है,

दूध का रंग सफ़ेद है,
रोटी का रंग सफ़ेद है,
अफ़सोस दोनों सफ़ेदी की गिरफ्त में है,

तुम्हारा--अनंत 

शनिवार, अप्रैल 21, 2012

सवालों के साथ मुठभेड़

रोटी की फिकर,
किसी टूटे हुए नल से,
टपकते हुए पानी की तरह होती है,
जो टप..टप...टप...की जगह,
रोटी...रोटी....रोटी करती है,

रोटी की फिकर वो सवाल है,
जो अध्यापक प्रश्नपत्र में दे तो देता है,
पर उत्तर स्वयं नहीं जानता,
सारी कक्षा के फेल हो जाने के बाद,
अध्यापक  खुद फेल हो जाता है,
और वो सवाल जिंदगी के जलते हुए तावे पर,
सेंक दिए जाते है,
उन्हें भुने हुए गोस्त की तरह पैर-पर-पैर चढ़ा कर,
बड़े किले के पीछे कुर्सी वाले खाते है,

सवाल की रीढ़ की हड्डी का एक सिरा ,
खिखिया कर हँसता है  
एक सिरा रोटिया  कर रोता है,

और एक नहीं कई लाश अपने पीठ पर ढोता है,
उन इंसानों की लाश,
जो आँखों को चौंधिया देने वाली चमक में,
अँधेरी गली के अंधे मोड़ पर,
मारे गए थे,
सवालों के साथ मुठभेड़ में,

जो सवाल बच गए हैं ,
किसी जिन्दा लाश के बगल में,
सर पर हाँथ रखे,
बैठे हुए, डूबे  हैं ,
रोटी की फिकर में,

तुम्हारा--अनंत 

सबसे लम्बी दूरी...

सबसे लम्बी दूरी तय करना  है,
एक लम्बी सुरंग,
जिसके एक सिरे पर दर्द है,
और दुसरे सिरे पर,
दर्द का हमशक्ल,

डर, गुस्सा, घृणा, आंसू, उम्मीद, आशा, झल्लाहट,
और बहुत सारे बेनाम-अनाम लोग,
उस लम्बी दूरी के बीच भटक रहे हैं,

समोसा की तरह तिकोना मुंह,
तीर की तरह शरीर,
नाव की तरह पाँव,
रोटी की तरह पेट,
ताड़  की ताड़ी सा पसीना,
बहाते  हुए चले जा रहे हैं,

सबसे लम्बी दूरी तय करना है,
पीठ से पेट के बीच की दूरी,
ख़ामोशी से शब्द के बीच की दूरी,
कल से आज के बीच की दूरी,
इंसान से इंसान के बीच की दूरी तय करना है,
सबसे लम्बी दूरी तय करना है..

तुम्हारा --अनंत 


दो बूँद रौशनी की....

कुत्ते ने नहीं गाया है बहुत दिनों से राग भैरवी
और गाय भी भूल गयी है
कैसे कटी थी, पिछली बार.

नई धुन में प्यार पोंका जायेगा,
सब तैयार हैं सिवाय उस बैल के,
और उस शेर के,
जो माटी और ईंट-सीमेंट के बने हैं,

अँधेरे की बोलत में मिनिरल वाटर नहीं है,
न ही है; कोल्डड्रिंक,
शराब भी नहीं है,
रौशनी है चाशनी में घुली हुई,
दो बूँद टपकाता है,
दो-दो बूँद,
सारा देश पोलियो ग्रस्त हो गया है,
दो बूँद रौशनी के पी कर, 

तुम्हारा--अनंत 

कफ़न.....

आशुतोष से साभार ......
लौंग के फूल की तरह, 
तोड़ कर अलग कर दिया जाता है कवि, 
और कविता चबा ली जाती है,
 मुंह महकाने  के लिए,

अलमारियों के जिन खांचो में किताबों के कंकाल पड़े हैं,
 उनमे नमक की अदृश्य बोतलें बहाई गयी है,

ख़ामोशी की ख़ाकी चादर उढ़ा कर ढांक दिया गया है, 
उस कातिल खंजर को;  कि जिससे कल बेवक्त, वक़्त का क़त्ल किया गया था,
और रोते हुए संगीत को ढोते हुए,
साज की जान निकल गयी थी प्यास से, 

कफ़न की जगह पहनाया गया था तिरंगा,
जिससे भाग कर छिप गया था बलिदान और संघर्ष का केसरिया रंग जंगलों में,

हरियाली को लकवा मर गया था 
वो किसी बड़े अस्पताल में भर्ती है,
अब उससे मिलने के लिए कार से जाना पड़ता है,
जिसके पास कार नहीं है वो हरियाली  से नहीं मिल सकता,

स्वाभिमान कल दो रुपये किलो बिक रहा था,
किसी ने नहीं ख़रीदा उसे,
अशोक के चक्र नीचे आ कर उसने जान दे दी,
अशोक के  चक्र को ताज़े-राते-हिंद-तउम्र-कैदे-बमशक्कत हुई है 
अब  तो  तिरंगे में महज उदास सफ़ेद रंग बचा है,
जो कफ़न है, 
जन-गण-के मन पर पड़ा हुआ,
कफ़न !

तुम्हारा--अनंत 

सोमवार, अप्रैल 02, 2012

मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,..........

कलाकार बड़ा ही अजीब होता है, उसे दर्द होता भी है और नहीं भी होता, उसे  ख़ुशी होती  भी है और नहीं  भी होती,  खुद के गम को गम नहीं समझ जाता उससे और दूसरों के गम से मूंह भी नहीं मोड़ा जाता, जिन लोगों को भी भगवान पर विश्वास है वो अक्सर ये कहते हुए पाए जाते है ''कलाकार को भगवान ने जाने कौन सी मिट्टी से बनाया है'' उन लोगों में एक मैं भी हूँ क्योंकि मैं भी कहीं न कहीं इश्वर जैसी किसी चीज पर विस्वास करता हूँ .......पर उसका रूप, और परिभाषा वैसी नहीं है जैसा ठग विद्वानों ने बताया है. खैर आज एक पन्ना मिला, पुरानी किताबों के बीच से बहुत पहले लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ शायद उस वक़्त जब मन ये निश्चय कर रहा था कि अब कलाकार ही बनना है, चाहे जो कीमत चुकानी पड़े,,,,,,,,,,,, तो मिलिए उन पंक्तियों से........


                                                                            ( 1 )

काँपती  हवाओं की शाखाओं पर,
हमने आशियाना बना रखा है,
जोड़ कर तिनका-तिनका,
एक शहर सजा रखा है,
पर गर वक़त की सुनामी में,
 बह जाए सब कुछ,तो भी गम नहीं,
हम कलाकार हैं हमने दिल फौलाद बना रखा है,

                                                                          ( 2 )
अँधेरे में भी जो चमक जाते हैं,
गर्दिशों में हँसते हैं, मुस्कुराते हैं,
लाख गम हो सीने में उनके,
 पर कहाँ वो उस गम को दिखाते है,
बनाया है फौलादी मिट्टी से खुदा ने उनको,
वो कलाकार हैं बमुश्किल आंसू बहते है,


                                                                         ( 3 )
दिल की दिवार पर पड़ी एक दरार हूँ,
जिंदगी के साथ हुआ एक टूटा  करार हूँ,
ज़माने ने बनाई जो कालकोठरी जिम्मेदारियों की,
मैं उन कालकोठरियों से, मुजरिम फरार हूँ,
मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,

भीगा है  दिल आंसूओं से,
मैं उनकी चुभती बातों का शिकार हूँ,
डसती है जहरीली निगाहें अपनों की,
मैं उनकी नज़रों में, एक इंसान बेकार हूँ,
मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,

भूखे बच्चों के चेहरों पर,प्रश्न चिन्ह तैरते हैं.
बीबी के शाब्दिक नाखून मेरे ज़ख़्म उकेरते हैं,
माँ बिमारी में तड़प कर एडियाँ रगडती है,
बाप की बूढी आँखें अब मुझसे झगडती हैं,
हक़दार हूँ मैं तुम्हारी तालियों का,
पर उनका गुनाहगार हूँ,
मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,

मैं छोटे भाई बहनों को प्यार न दे सका,
उनकी बिखरती जिंदगी को संवार न सका,
लुट गया बचपन उनका बचपन में ही,
और मैं फस हुआ था गीत-ओ-गुंजन में ही,
कभी-कभी सोचता हूँ तो लगता है,
 मैं एक मजबूत घर की  कमज़ोर दीवार हूँ,
 मैं कलाकार हूँ, हां मैं कलाकार हूँ,

तुम्हारा---अनंत 

 
    

गुरुवार, मार्च 29, 2012

लापता हिंदुस्तान..............

लापता हिंदुस्तान का,
पता मिला चाय स्टॉल पर,
जहाँ छोटू के गाल पर पड़ा था तमाचा,
और मालिक की डांट की शक्ल,
हू-ब-हू मिलती पाई गयी थी,
राष्ट्रगान से,

एक भटकती हुई हवा,
चीखती हुई,
निकल गयी थी,

टूटा हुआ गिलास= फूटी हुई किस्मत.....

मन करा था,
नाचूँ पाइथागोरस की तरह,
और गाऊं,

लम्ब पर बना वर्ग,
और आधार पर बने वर्ग का योग,
कर्ण पर बने वर्ग के बराबर के बराबर होता है,

पर मैंने कहा था, एक गिलास चाय दो भाई !

सडे हुए पानी पर,
तैरता हुआ मच्छर,
चला आया कान तक,
गरीब इंसान और मच्छर की आवाज़,
एक सी लगती है,
तभी कान में पड़ते ही,
दोनों को मरने का मन करता है,

मरे हुए मच्छर के,
जिन्दा लहू ने, मुझसे बताया !
कि वो  मच्छर का लहू नहीं है,
वो छोटू की माँ का खून है,
जिसे मच्छर ने तब चूसा था,
जब वो दबी हुई थी,
एक पहाड़ के नीचे,
और पहाड़ मदमस्त खेल रहा है,
उसके ऊपर......

इस खेल के लिए तय हुए थे 150 रु०
मिले थे 100 रु०,
50 रु० के बदले,
मिली थी डांट,
खेलने के बाद
पहाड़ अक्सर डांट दिया करता है,
छोटू की माँ को !


मन किया था चूम लूं उसके खून  को,
या भर लूं मांग,
हो जाऊं सुहागन,

पर मैंने पोछ दिया उसे बेंच पर,
तब तक सूखने के लिए,
जब तक छोटू उसे साफ न करे !


एक मखमली गंध,
अपना पथरीला लिबास पहने,
बेख़ौफ़  नाक में गुस गयी थी,
पकड़ कर गिरेबान,
निकला उसे बीच नाक से,
सहमी हुई आवाज़ में उसने कहा था !
भाग आई हूँ, उस कूड़े के ढेर से,
जिसके पार एक मासूम बकरी को,
काट रहे थे कसाई  बारी-बारी से,
बिना कपड़ों के कूड़े में लिथड़ी हुई बकरी छोटू की बहन है,

आप चाहें तो इसे,
किसी आम आदमी की तरह,
कूड़े के जंगल में मंगल कह सकते हैं,
या खबरिया चैनल की तरह,
गैंग रेप भी कह सकते हैं,

पर मैंने तो इसे संविधान की प्रस्तावना कहा था!

एक गगन चुम्बी इमारत में,
ईंट जोड़ती हुई पतंग,
कट कर गिरी थी नीचे,
सभी लोगों की साथ,
दौड़ा मैं भी,
कि सब से पहले लूटूंगा मजा उस पतंग का,

किसी ने उस पतंग को, बेचारा मजदूर कहा था,
किसी ने बेचारा गरीब,
किसी ने कहा था,  लापरवाह आदमी!
एक चाय वाले ने कहा था;-  ये छोटू का बाप है,

पर मैंने कहा था :-
ये अशोक की लाट का सिंह है,
जो अभी- अभी गिर कर मर गया,

मेरे कहने का कोई मतलब नहीं है,
क्योंकि मैं संसद का रास्ता नहीं जनता,

आप चाहें छोटू को छोटू समझ सकते हैं,
मैं तो उसे हिन्दुस्तान समझता हूँ,

तुम्हारा --अनंत

सोमवार, मार्च 26, 2012

भगत सिंह तुम बड़े बेहया हो.....

भगत सिंह तुम बड़े बेहया हो,
ठीक निराला के कुकुरमुत्ता की तरह,
तुम उग आते हो वहां भी,
जहाँ संभावनाओं की संभावनाएं भी दम तोड़ देती है,
जहाँ आशाओं का हलक सूखने लगता है,
उम्मीद के जन्नांगों में पत्थर डाल दिए जाते है,
उत्साह के कोख में,
निराशा की नाजायज औलाद ठूंस दी जाती है,
जहाँ चरित्र का सूरज पिघल कर,
विस्की, रम और बियर हो जाता है,
जहाँ राष्ट्र का हीरो,
बन जाता है सेल्समैन,
और बेचता है कोंडोम से ले कर विस्वास तक,
सबकुछ.........
तुम वहां भी उग आते है,


किसी हारे हुए की आखरी हार से पहले,
किसी भूखे आदमी की आखरी आह! से पहले,
किसी ख़ामोशी के एकदम खामोश हो जाने से पहले,
तुम उग आते हो,
भगत सिंह तुम  बड़े बेहया हो,

कितनी बार चढ़ाया है तुम्हे फांसी पर,
बरसाई हैं लाठियाँ,
सुनाई है सज़ा,
जलाई है बस्तियां,
तुम्हारे अपनों की....
कितनी बार भड़काए गए  हैं,
दंगे,
तुम्हारे गाँव में,
कस्बों में,
शहरों में,
कितनी बार काटा गया है तुहारा अंगूठा,
चुना है तुमने ही,
शोषण के लिए,
कितनी बार अवसाद की अँधेरी कोठरी में,
की है तुमने आत्महत्या,

भगत सिंह न जाने कितनी बार,
न जाने कितने तरीकों से,
तोड़ा मरोड़ा गया है तुम्हे,
पर तुम उग आते हो,

किसी मजदूर के हांथों के ज़ख्म भरने से पहले,
किसी निर्दोष के  आंसू सूखने से पहले,
किसी जलती हुई झोपडी की राख़ बुझने से पहले,
किसी बेदम इंसान का लोकतंत्र पर से विस्वास उठने से पहले,
तुम उग आते हो,
भगत सिंह तुम बड़े बेहया हो,

बेहया लोग ख़तरनाक़ होते हैं,
हया इंसान हो डरपोक और दोगला बना देती है,
तुम्हारे सपने मरे नहीं है,
इसलिए तुम बेहया हो,
औए शायद इसीलिए ख़तरनाक़ भी,

सीलन वाली अलमारी पर,
सबसे किनारे रखी,
सबसे कम कीमत की,
सबसे रद्दी कॉपी पर,
तुम उग आये हो,

मजदूरों के कंकाल,
किसानों की लाश,
और जवानों के गुस्से पर,
लिखी गयी कविता,
में तुम उग आये हो,
भगत सिंह तुम बड़े बेहया हो,

भगत सिंह--तुम्हारा--अनंत