बुधवार, मई 17, 2017

पैसिव स्मोकिंग..!!

मैं सिगरेट नहीं था
और सिगरेट की राख भी नहीं था
मैं सिगरेट का फ़िल्टर भी नहीं था
और ना उससे उठने वाला धुवां ही था

मैं वो उंगलियां भी नहीं था
जिसमे फंसी रहती है सिगरेट
और ना वो होंठ ही
जिसमे धरी रहती है सिगरेट
मैं वो जिगर तो कतई नहीं था
जहाँ जाता है सिगरेट का धुंआ
और कुछ देर रहने के बाद
अपना एक हिस्सा छोड़ कर बाहर निकल आता है

मैं तुम्हारी वो सांस था
जो सिगरेट के धुएं को भीतर खींचती है
और कुछ देर धुएं के साथ जिगर में बैठती है
और बाहर आती है एक अजनबी चहरे के साथ

तुम वो हवा नहीं थे
जिसमे घुलता है धुंआ

तुम वो हाँथ थे
जो नाक के सामने वाइपर की तरह चलता है
पर साँसों का धुंधलका
वाइपर से कहाँ धुलता है

तुम्हारे लाख ना चाहने के  बाद भी
मैं तुम्हारी साँसों में घुल जाता था
तुम्हारे जिगर के किसी कोने में बैठकर
अँधेरे की ताल पर
उजाले के गीत गाता था

और जब तुम मेरा नाम पूछते थे
मैं अपना नाम "पैसिव स्मोकिंग" बताता था

मैं एक सांस से दूसरी सांस तक जाता था
और इसी रास्ते पर चलते हुए
कविता बनाता था

तुम्हारा-अनंत  

मेरे "मैं" की कविता..!!

मेरी नींद में जागता सपना
सपना नहीं है
वो मेरा "मैं" है

मैं उसी के लिए जीता हूँ
मैं उसी को लिए जीता हूँ

इसीलिए यथार्थ के आईने में भी
मैं जागते सपने सा दीखता हूँ

मैं तुम्हारी जागती आँखों से
नींद का काजल चुराता हूँ
और इसी से
मैं मेरे  "मैं" की कविता बनाता हूँ

तुम्हारा-अनंत 

मंगलवार, मई 16, 2017

कविता की सलीब...!!

तुमने नहीं महसूसा कभी 
नदी, नदी में कैसे बहती है 
ऊंचाई, ऊंचाई से कैसे गिरती है 
बारिश खुद की बूंदों से कैसे भीग जाती है 
तन्हाई कितनी तनहा होती है 
हँसी के खोखलेपन में 
कहीं कोई  फूट कर रोता है 
खालीपन में भी एक खालीपन होता है 
भाषा भी कहना चाहती है कुछ 
पर उसके पास भाषा ही नहीं है 
तुम्हारे क़दमों के निशान भी चलना चाहते हैं, तुम्हारे साथ 
और सांस भी सांस लेना चाहती है 
तुमने नहीं महसूसा कभी 

तुमने नहीं महसूसा कभी 
कद्दूकस पर घिसी जा रही सब्जियों का दर्द 
तुमने नहीं महसूसा कभी 
क़त्ल करने से पहले ख़ज़र का रोना 
तुमने नहीं महसूसा कभी 
होने और नहीं होने के बीच तड़प कर मरते हैं 
दुनिया के अधिकांश लोग 

अच्छा किया जो तुमने नहीं महसूसा कभी 
जो महसूसा होता ये सब 
कविता की सलीब पीठ पर ढो रहे होते, तुम !
दो शब्दों के बीच बैठे कहीं रो रहे होते, तुम !!

तुम्हारा-अनंत  

नींव से नींद तक...!!

तुम पूरे चाँद की तरह हो
मैं आधी रात की तरह हूँ
तुम पूरे उपन्यास की तरह हो
मैं अधूरी बात की तरह हूँ

आधी रात में उभरता है, पूरा चाँद
एक अधूरी बात पर टिका होता है
पूरा उपन्यास

क्या ये बात मेरे लिए  कम है
कि तुम मेरी नींव में हो
और मैं तुम्हारी नींदों में !!

तुम्हारा-अनंत  

सोमवार, मई 15, 2017

यही मेरी कविता है....!!

बिना होठों से लगाए नहीं सुलगती है सिगरेट
बिना सीने से लगाए नहीं महकता है दुःख
बिना खुद को मिटाए, कवि नहीं लिखता है कविता
बिना खोये नहीं मिलता है खुद का पता

इसलिए मेरे होठों पर सिगरेट
सीने में दुःख
और दिमाग में खोया हुआ पता है
यही मेरी कविता है !!

तुम्हारा-अनंत 

कविता की तरह..!!

तुम अपने हर एक कदम में जितनी जमीन दबाती हो
मेरा कुल वजूद उतना ही है
इसलिए तुम चला मत करो
उड़ा करो
कविता की तरह

तुम्हारा-अनंत 

सपना, भूख और चुम्बन.....!!

मेरे शब्द भी झूठे हैं
और मेरा मौन भी झूठा है
सच मेरे मौन  और शब्द के बीच का हिस्सा है
जो तुम उसे पढ़ सको तो पढ़ो
जो तुम  सुन सको तो सुनों

मैं यहाँ खुद के साथ हूँ
मैं वहाँ तुम्हारे हूँ
ये दोनों बातें ग़लत हैं
मैं यहाँ-वहाँ के बीच कहीं हूँ
जो तुम मिल सको तो मिलो

मैं फंसा हुआ हूँ बीच में
ठीक वैसे, जैसे
आँख और पलक की बीच सपना
पेट और पीठ के बीच भूख
और, होंठ और होंठ के बीच
चुम्बन !!

तुम्हारा-अनंत

ये क्या है ?

वो गीत सबसे खूबसूरत है
जो तुमने तन्हाई में सिर्फ और सिर्फ अपने लिए गया था
वो भी उसकी याद में
जिसकी तन्हाइयों में भी एक भीड़ रहा करती है
और उस भीड़ में एक भी चेहरा तुमसे नहीं मिलता

वो मौन सबसे खूबसूरत होता है
जो तुम्हारे दो शब्दों के बीच होता है
और बुबुदाता है, उसका नाम
जिसके शोर में भी
तुम्हारी एक भी ध्वनि नहीं है

सबसे खूबसूरत वो इंसान है
जिसने तुम्हारे आत्मा के धब्बे देखे हों
और तुमसे पूछा हो
ये क्या है ?

तुम्हारा - अनंत

पुल..!!

मैं एक ऐसी कविता लिखना चाहता हूँ 
जो इस पार, उस पार का फर्क मिटा दे 
वो चौंक कर उसे कहे "पुल"
और मैं हँसते हुए कहूं 
"भक्क पागल"

तुम्हारा-अनंत

शनिवार, मई 13, 2017

इस अधूरे को बचाना खुद को बचाना है..!!

सबसे उलझाऊ याद ढाई याद है। एक तुमसे मिलने की, एक बिछड़ने की और आधी तुम्हारे साथ होने की। सबसे गहरा शब्द ढाई अक्षर का शब्द है। एक अक्षर तुम्हारा, एक अक्षर मेरा और आधा हम दोनों का। सबसे ख़तरनाक़ चाल ढाई घर जलाने वाली चाल है। एक जलता हुआ घर मेरा, एक तुम्हारा और आधा हमारे सपनों का। सबसे बड़ी ज़िन्दगी ढाई दिन की ज़िन्दगी है। एक दिन तुम्हारे प्यार में, एक दिन तुम्हारे इंतज़ार में और आधा इंतज़ार के प्यार में। सबसे बड़ी कविता ढाई पंक्ति की कविता है। एक पंक्ति, हमने जो जिया उसके लिए, एक पंक्ति में जो हम नहीं जी सके उसके लिए और आधी हम जो जीना चाहते थे उसके लिए। सबसे बड़ी बात ढाई बात है। एक जो मैंने तुमसे कही, एक जो तुमने मुझसे कही और आधी जो हम एक-दूसरे से नहीं कह सके।

ये जो आधा है। वही पूरा है। और जो पूरा है वही आधा है। इसलिए हम जो पूरे हो चुके, चुक चुके लोग है। हम अभी बाकी है। इसीलिए बाकी है जीवन भी। इस अधूरे को बचाना खुद को बचाना है। जीवन जीने की वजह को बचाना है।

तुम्हारा-अनंत