मंगलवार, अप्रैल 16, 2019

नींद: नौ कविता, ग्यारह क़िस्त-2

जब उंगलियों पर गिनते हुए मैं आठवें पोर पर पहुँचा
रात के रोंवों में आग भभक उठी

तुम्हारे बिखरे और ढीले वाक्यों से झरे अक्षरों ने एक शब्द रचा
जिसका अर्थ ईशा मसीह के सिर पर ठोंकी गई कील सा था

मैंने सलीके से अपनी सलीब उठाई
और नींद ने आख़री सांस ली
सजा सुनने के बाद अपराधी ने अपने खाली जेब में हाँथ डाल कर
ख़ुद को अपने खालीपन में भर लिया
जो काम सृष्टि के पहले दिन से टालता रहा मैं
उस रात आख़िर कर लिया

आखरी बार जब पूछी गयी मेरी इच्छा
तो मेरे साथ उस स्त्री ने भी कहा
हमें रेखाओं को अनदेखा करने दिया जाए
कोई ना बचाए हमें
हमें जीवन की तलाश में मरने दिया जाए

ये बात जो कविता में दर्ज़ हुई है
मेरे किसी जागृत स्वप्न से छिटक कर गिर गई है

अनुराग अनंत

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