गुरुवार, जून 01, 2017

तल्खियां तेरी आँखों की...!!

तल्खियां तेरी आँखों की बहुत चुभती है
आग ज़िगर में जलती है, आह उठती है

फिर सोचता हूँ, मुझ पर इतना तो करम है
मेरे वास्ते तल्खियां हैं, तो ये भी कहाँ कम हैं

ख़्वाब तेरे सजाए हैं, हमने दिल पत्थर करके
अब टूट भी जाए ये पत्थर तो कहाँ गम है

तेरी आरजू करके काम दिल से ले लिया हमने
अब इस नाकाम दिल का और कोई काम नहीं

तेरी ज़ुस्तज़ू में भटकती धड़कनों को सुकूं है अब
जो दो घडी आराम से बैठ जाएँ तो आराम नहीं

तर्के-ए-मुहब्बत तूने कर लिया पर हमसे न हुआ
हम अब भी तेरे एहसासों के साए में जिया करते हैं

अजब नशा सा है तेरी उल्फत के आंसुओं में सनम
हम मय में घोल के अब खुद के अश्क पिया करते हैं

सब रास्ते जो बंद हो गए हैं तो अब एक ही रास्ता है
कोई नया रास्ता बनाएंगे एक नए रास्ते के लिए

जो सब वास्ते मिट गए तो अब एक ही वास्ता है
कोई नया वास्ता बनाएंगे एक नए वास्ते के लिए

मैं लाख कह दूँ तुझसे पर वो बात कह न पाऊंगा
जो बात मेरी जान में जान की तरह अटकी है

तू वो उलझी हुई गली है जो मंज़िल तक जाती है
तू वही गली है कि जिसमे जिंदगी मेरी भटकी है

मेरी कहानी जो कहानी कहती है तो यही कहती है
कुछ तल्खियां हैं जो मुझमे साँसों की तरह बहती है

तल्खियां तेरी आँखों की बहुत चुभती है
आग ज़िगर में जलती है, आह उठती है

तुम्हारा-अनंत

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