बुधवार, नवंबर 18, 2015

मीरा, पिता जी और मासूम पेंटर..!!

जब आपकी एक माँ के मरने और दूसरी के पैदा होने के बीच, एक साल का भी अंतर न हो, तो आप शब्दों में व्यक्त न किया जा सकने वाला कोई एहसास भोग लेते हैं. और अपने माँ बाप की शादी में जिन-जिन लोगों को जाने का मौका मिलता है. उनके लिए मृत्यु अपनी सारी भयावहता खो देती है. और एक रुई के टुकड़े या बर्फ के गोले से ज्यादा कुछ नहीं बचती. मुझे कुछ ऐसी अजीब बातें पता चलने लगीं थी कि दुनिया मेरे लिए छोटी होती जा रही थी. और मैं जो कुछ भी आड़ी-तिरछी रेखाओं से गढ़ता था. वो सदी की सर्वोच्च पेंटिंग हो उठती थी. ऐसा मेरा मन कहता था और मैं उसे किसी को नहीं बताता था. दुनिया मेरी पेंटिंग देखती, मेरी उम्र पूछती फिर समय पर हंसती और मुझे किसी परग्रह से आया हुआ मान कर न जाने किस भाषा में बात करने लगती कि मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता. मेरे दिमाग में कुछ रेंगता रहता था और दिल में धंसता रहता था. मैं जब भी उसके बारे में लिखने की सोचता तो एक दुसरे को काटती हुई बेतरतीब रेखाएं खींचता. कभी चीखता हुआ पैर कटा घोड़ा बनता तो कभी उडती हुई मुर्दा मछली. और भी बहुत कुछ बनता था पर आप यकीन मानिए, मैं ऐसा कुछ भी नहीं बनाना चाहता था. मैं अपने दिमाग में रेंगने वाले और दिल में धंसने वाले उस जीव के बारे में लिखना चाहता था. जो मेरे साथ बड़ा हो रहा था.

मेरी एक माँ ने मुझे पैदा किया था और दूसरी को मैंने. पहली माँ को मुझे पैदा करने में जो कष्ट भोगने पड़े होंगे. मुझे उसका ठीक ठीक अंदाजा हो गया था. इस तरह मैं दुनिया का एक विशेष जीव था. जिसने अपनी माँ को पैदा करना अनुभव किया था. एक दिन मेरे पिता ने मुझसे कहा कि वो शादी करना चाहते हैं और जल्दी ही वो मुझे एक नई माँ ला कर देंगे. उनके ये शब्द उनके मुँह से निकल कर मेरे पेट में घुस गए और उस दिन के बाद मेरा पेट तबतक जलता रहा जबतक मैंने अपने पिता की बारात में बेहोश होने तक डांस नहीं किया. मुझे जब होश आया तबतक मेरी नई माँ मेरी जिन्दगी में आ चुकी थी और मेरे पेट की आग भी अब बूझ गयी थी. मेरी पहली माँ ने मुझे बताया था कि उसकी जिंदगी में जब मैं आ रहा था. तब वो भी बेहोश हो गयी थी और जबतक उसे होश आया. तबतक मैं उसकी जिंदगी में आ चुका था. उसके पेट में भी एक जलन रहती थी. जो मेरे आने के बाद ख़तम हो गयी थी. शायद किसी को अपनी जिंदगी में लाने के लिए बेहोश होना और पेट में दर्द महसूस करना जरूरी होता होगा. ऐसा मैंने अपने मन में सोचा पर किसी से कहा नहीं. 

मैं मेरी पहली माँ की तरह होता जा रहा था. जैसे वो शौकिया उदास रहती थी. वैसे ही मुझे भी उदास रहने का शौक हो गया था. उदास रहना मेरी जिंदगी का दूसरा नाम होता जा रहा था. उन दिनों मुझे आईने में मेरी शक्ल नहीं दिखती थी. मैं जब भी आइना देखता, मुझे मेरी पहली माँ दिखती. शायद इसीलिए मेरी दूसरी माँ मुझे अपनी सौत समझती थी. और शायद मैं भी उसे अपनी सौत समझने लगा था. पिता जी को नहीं मालूम था कि वो दो पत्नियों के साथ रह रहे हैं. वो मुझे अभी भी अपना बेटा ही मानते थे जबकि मैं उन्हें प्रेम में डूबी देहाती पत्नियों की तरह बेतहाशा चाहने लगा था. उनका किसी और औरत के साथ होना मुझे सौतिया जलन में झोंक देता था. मैं रात भर सुबकता रहता था और चाहता था कि पिता जी मेरे साथ सोयें. जबकि पिता जी को लगता था कि तेरह-चौदह साल के लड़के को अकेले ही सोना चाहिए. तेरह-चौदह साल की उम्र में सुहाग-सौत, पति-पत्नी, जिंदगी-मौत जैसे शब्द बेमतलब से होते हैं. पर इन शब्दों में मुझे सैकड़ों अर्थ दीखते थे और हजारों रंग भी. मैं इन शब्दों को सूंघता था और महसूस कर सकता था. जब ये शब्द मेरे दिमाग में रेंगते थे या दिल में धंसते थे. तब मैं पेंटिग बनता था. और जब पेंटिग नहीं बनता था तब जासूसी करता था और जब जासूसी नहीं करता था तो कुछ नहीं कर पाता था. इस तरह मैं इस जीवन में पेंटर और जासूस होने के अलावा कुछ और नहीं हो सकता था. मैं कहीं भी रहता था, मेरा आधा हिस्सा मेरे पिता के कमरे के बाहर ही कहीं छिपा होता था. मेरा आधा दिमाग, आधी आँख, आधा कान, और आधी आत्मा. मैं अपनी नई माँ की हर धड़कन और पुराने पिता की हर सांस की खबर रखना चाहता. ये मेरा शौक नहीं था. ये मेरी मजबूरी थी क्योंकि मैं इसके बिना जिन्दा नहीं रह सकता था.   

एक दिन, जो सप्ताह का कोई भी दिन हो सकता है, शनिवार और इतवार को छोड़ कर. क्योंकि इतवार को मैं स्कूल नहीं जाता था और शनिवार को दो पीरियड क्लास के बाद एनसीसी की परेड होती थी, इसलिए मैं गुरविंदर के साथ नीम के पेड़ के नीचे नहीं बैठ पाता था. बाकी दिन हम वहीं बैठ कर स्कूल की लड़कियों को खेलते हुए देखते थे और अपने अपने लंच करते हुए उनके शरीर पर पाइथागोरस की प्रमेय हल किया करते थे. गुरविंदर मुझसे कहता, किसी आधार पर बने वर्ग और लम्ब पर बने वर्ग का योग उसके कर्ण पर बने वर्ग के योग के बराबर होता है. मैं इस सार्वभौमिक नियम को वहाँ खेलती हुई जिस किसी लड़की पर लगता, जवाब वही होता जो गुरविंदर बताता था. इस तरह गुरविंदर मेरे लिए संसार का सबसे ग्यानी आदमी था. और मुझे लगता था कि गुरविंदर न होता तो या तो मैं अँधा होता या अनपढ़. खैर उस दिन गुरविंदर ने जो बात कही थी. उसकी जगह शैलेश, मार्टिन या फैजल होते तो वो भी वही बात करते (गोया मैंने सब का खून चख रखा था और मुझे सब के खून का स्वाद एक सा ही मिला हो). गुरविंदर और मैं चौदह साला बच्चे या लड़के थे. बाकी दुनिया की तरह हमें भी नहीं मालूम था कि हम बच्चे हैं या लड़के. जब हमें कोई बच्चा समझता था तो हम लड़कों की तरह सोचते थे और जब कोई हमें लड़का समझता था तो हम बच्चे बन जाते थे. इस तरह हम बच्चे और लड़के होने के बीच, कहीं किसी चौराहे पर खड़े थे. इसलिए हमारी बातें तलवार की तरह धारदार और हवा की तरह पारदर्शी होतीं थी. जब हम बातें करते थे तो या तो लहुलुहान होते थे या पसीने से भीग उठते थे. कभी कभी हम भाप की तरह उड़ते हुए भी पाए जाते थे, पर ऐसा कम ही होता था. हम ज्यादातर खून या पसीने में से किसी एक हो ही चुनते थे. 

चूंकि हम 1947 के चौदह साला बच्चे या लड़के नहीं थे. इसलिए हम देश और देश के एकमात्र दुश्मन पाकिस्तान की बातें नहीं किया करते थे. और न ही हम 1975 में चौदह साल की दहलीज पर पहुंचे थे. जो हम आजादी और कैद की बातें करते. हम 1991 से 2000 के बीच भी कहीं नहीं थे. जो हम जय श्री राम और अल्ला-हू-अकबर के नारे लगाते, मंदिर और मस्जिद की बात करते. तोगड़िया और बुखारी का नाम लेते, शाहरुख खान का रोमांस और माधुरी दीक्षित के फिगर की बातें करते, कारगिल के शहीदों के लिए आंसू बहाते या मल्टीनेशनल कंपनी और भूख के बारे मे सोचते. हम 2012 के चौदह साला लड़के थे. इस समय तक इंटरनेट कामधेनु का दूसरा नाम हो चुका था और बाबा गूगल से जो भी मांगो वो तुरंत ही देने की क्षमता रखते थे. मानो बाबा ने करोड़ों वर्ष तपस्या करने के बाद ये शक्ति अर्जित की हो और सबको मनचाहा वरदान देने के लिए विश्व यात्रा में निकल पड़ें हो. वो हमारे देश भारत में भी आ पहुंचे थे. ये बात अलग है कि भारत में उनकी पहुँच (या उन तक पहुँच) सौ में से दस लोगों तक ही थी. इसमें गूगल बाबा का कोई दोष नहीं था. ये उन नब्बे लोगों का अपराध था. जो अबतक रोटी की कैद और आधारभूत जरूरत की ज़ंजीर में जकड़े हुए थे. ये वो लोग थे जो 1991 के बाद शुरू हुई अंधी दौड़ में पीछे छूट गए या योजनाबद्ध तरीके से छोड़ दिए गए थे. ये लोग गावों, कस्बों और छोटे शहरों में रहते थे. पर हम तो दिल्ली के रहने वाले थे. और हमारे बापों ने इतनी उड़ान भर ली थी कि हमें रोटी कपडा और मकान सुनने पर किसी फिल्म की याद आती थी और हम हँसने लगते थे. 

ये समय इंदिरा गांधियों और मोरारजी देसाइयों का नहीं था बल्कि सोनिया गांधियों और मोदियों का था. ये समय टाटाओं और बिरलाओं का नहीं या बल्कि अदानियों और अम्बानियो का था और न ही ये समय रामायणों, महाभारतों और शक्तिमानों का था बल्कि ये समय बिग बॉसों, रोड़ीजों और इमोशनल अत्याचारों का समय था. इसलिए गुरविंदर ने मुझसे पूछा- मेरी नई माँ की उम्र क्या है ? मैंने कहा यही कोई 23-24 साल होगी. गुरविंदर का चेहरा ब्लैकबोर्ड की तरह हो गया और उसने अपने होंठों से अपने चेहरे पर लिखा. तेरी माँ का फिगर क्या होगा ? मैंने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया. इसकी दो वजहें थीं. एक तो ये कि अगर मैं उसके इस सवाल का जवाब दे देता तो कहानी रेलवे स्टेशनों पर बिकने वाली पत्रिकाओं में छपती और कुंठित लोगों के दिमाग में बहुरंगी चित्र बनाने के काम में आती और दूसरी वजह ये थी कि मैंने मीरा को कभी इस तरह नहीं देखा था. इसलिए मुझे वाकई नहीं मालूम था की उसका फीगर क्या है ? मेरी नई माँ का नाम मीरा था. अब जब मैंने उसका नाम आपको बता ही दिया है तो मैं आगे से इस कहानी में उसे मीरा ही कहूँगा. क्योंकि गुरविंदर की बात सुनने के बाद मैं उसे माँ नहीं कह सकता. 

तो क्योंकि मैंने मीरा को गुरविंदर की नज़र से कभी नहीं देखा था इसलिए मैंने गूगल बाबा से कहा “मीरा एमएमएस स्कैंडल” और एक ही पल में विश्व भर की लाखों मीराओं का उनके प्रेमियों या होटलों द्वारा छले जाने का दस्तावेज मेरे सामने था. मैंने जितने भी वीडियो देखे सब में लड़कियों का चेहरा मीरा के जैसे था. इस तरह मैंने एक ही वीडियो को कई बार देखा और जब मुझे महसूस हुआ कि मेरे दिमाग और दिल में पलता हुआ जीव तेज तेज कदम ताल करने लगा है. तो मैंने कंप्यूटर बंद कर दिया और पेन्सिल से कागज पर एक वार किया. कागज पर एक रेखा बनी गोया किसी ने किसी का चेहरा काट दिया हो. फिर दूसरी, फिर तीसरी, चौथी..आपस में काटती हुई रेखाएं बनाता चला गया. और जब कागज पूरी तरह लहुलुहान हो गया तो मैंने देखा कि कागज पर एक निवस्त्र औरत है. जिसका कोई चेहरा नहीं है. चेहरे की जगह एक सन्नाटा है. और वो बर्फ के खेत में आग बो रही है. दूर एक चौदह साल का लड़का है. जो उसी आग में जल रहा है. चित्र में पानी भी है पर उसे एक तीसरे आदमी ने जंजीरों में जकड़ रखा है. पानी लड़के को खा जाना चाहता है और लड़का पानी को पी जाना चाहता है. पर न पानी लड़के तक पहुँच पाता है और न लड़का पानी तक. लड़का चीखता है और चीखता ही जाता है. उसकी हर चीख पर आसमान में उड़ता हुआ एक पक्षी गिर कर मर जाते है या मर कर गिर जाता है. लड़का भूखा है इसलिए वो उसे खुद के शरीर से उठती हुई लपटों में भूझ कर खाता है. इस बीच पिता जी आ जाते हैं और पूछते हैं, क्या हुआ ? मैं कहता हूँ, दर्द. वो मेरा माथा छूते हुए पूछते हैं, कहाँ ? मैं उनको दर्द की जगह नहीं बता पाता. क्योंकि मुझे भी नहीं मालूम था कि दर्द कहाँ हो रहा है. उनकी नजर कागज पर बने चित्र पर पड़ती है. उनका अगला सवाल होता है. ये क्या है ? मुझे जो दीखता है. उन्हें वो कागज पर नहीं दीखता. न वो निवस्त्र लड़की, न आग, न पानी को कैद किये हुए आदमी, न जलता हुआ लड़का और न ही मरते हुए पक्षी. मैं जवाब देता हूँ. ये मैं हूँ. तो वो इतना डर जाते हैं मानो 1984 की किसी शाम दिल्ली की सड़कों पर पगड़ी बाँध कर निकलें हो या 2002 के किसी दिन अहमदाबाद की सड़कों पर सफ़ेद जालीदार टोपी पहन कर. मैं उनसे कहता हूँ, मैं सच कह रहा हूँ गौर से देखिये, ये मैं ही हूँ. पिता जी के चेहरे पर एक अनजाना रंग उभरता है और वो कहते हैं कि मैं रहस्यमय होता जा रहा हूँ. ये सुन कर सूरज डूब जाता है और शाम रात में बदल जाती है.   

उस दिन के बाद कहानी में वो दिन आता है जब मैं स्कूल से पैदल वापस आ रहा हूँ. बस मैंने इसलिए छोड़ दी क्योंकि मैं उसे छोड़ना चाहता था. धूप थी पर उसमे काँटों की चुभन नहीं थी. और न रेशम की छुअन. सूरज न जल ही रहा था और न बुझा ही था. वैसे कहानी में ये दिन आने से पहले मेरी जिंदगी में और भी बहुत से दिन आए थे. पर उनका कहानी से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था. मैंने वो सारे दिन जासूस, पेंटर और गुरविंदर का दोस्त बन कर काटे थे. स्कूल में लंच टाइम में हमने नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर लड़कियों को पहेलियों की तरह देखा था और ज्यामिति की कई सारी प्रमेय हमने कल्पना के सूने कमरे में बैठ कर लड़कियों के कोरे देह पर हल की थी. उन सारे दिनों में गुरविंदर ने मुझे कई सारे रंगों से रंगा था. मुझें कई आँखें दी थी. मेरे शरीर के कई रहस्य मुझे बताये थे और मेरी आत्मा को अलग-अलग परिभाषाएं दी थी. मैं जिस राह से गुजर रहा हूँ वो एक सूनसान रास्ता है. रास्ते के दोनों तरफ बंगले हैं और बंगलों के आगे अशोक, नीम और पीपल के पेड़ों की कतारें हैं. मेरे मन में एक ख्याल आता है “अगर गुरविंदर न होता तो मुझे ‘मैं’ कौन बनता ?” मुझे गुरविंदर पर प्यार आता है और मैं अपने बालों में हाँथ फेर लेता हूँ. मेरे दिल में दूसरा ख्याल आता है कि “जीना एक भ्रम है और हम सभी भ्रम में हैं इसीलिए जी रहे हैं” ये ख्याल वहाँ की हवा में घुल जाता है और हवा का चेहरा उतर जाता है. रास्ते में खड़े पेड़ और राह पर पड़े कंकड़ मुझे यूं देखते हैं गोया मैं कोई दार्शनिक हूँ. और मैंने जो बात कही है या सोची है उसे जानने के बाद इन्हें मोक्ष मिल जायेगा. सभी पेड़ और कंकड़ आत्माओं की तरह आकाश में उड़ जायेंगे. और मैं बिलकुल अकेला बचूंगा. बंगले और उसमे रहने वालों को मैं अपने साथ नहीं मानता था. वो सभी मेरे लिए पारदर्शी थे और मैं उनके लिए. घर पहुँचने से पहले जो आखरी बात मैं सोचता हूँ उसमे गुरविंदर मुझसे कहता है (जब वो कह रहा होता है तब उसके चेहरे पर इन्द्रधनुष बना है) कि मीरा एक नागिन है और मेरे पिता एक अजगर. एक नागिन एक अजगर के साथ कभी खुश नहीं रह सकती. इसलिए वो अपने नाग को पागलों की तरह तलाशती होगी. वो मुझसे कहता है कि मैं भी एक नाग हूँ ये बात मुझे मीरा को बता देनी चाहिए. मैं बुझते हुए दीपक की तरह फडफडाने लगता हूँ और मेरी फडफडाहट की वजह गुरविंदर समझ जाता है. वो मुझे खुलकर बताता है कि मुझे क्या करना चाहिए. अब मैं देखता हूँ कि गुरविंदर का चेहरा आईने की तरह हो गया है और मेरा चेहरा उसके चेहरे में उतर आया है. वो मुझसे कहता है कि वो “मैं” बनना चाहता है पर उसकी किस्मत मेरी तरह नहीं है इसलिए वो मैं नहीं बन सकता. और चूंकि मैं, ‘मैं’ हूँ इसलिए मुझे ‘मैं’ होने का पूरा फायदा उठाना चाहिए. मैं अब घर पहुँच चुका हूँ. पिता जी आफिस से जल्दी आ गए हैं. वैसे उनका आफिस उनके फोन पर ही रहता है. वो प्रापर्टी डीलर हैं और कहीं भी, कभी भी करोड़ों की डील कर सकते हैं. पर पिता जी रोज सुबह 10 बजे आफिस निकल जाते हैं और शाम सात बजे से पहले कभी नहीं आते. और जिस दिन सात बजे नहीं आते उस दिन वो अगली सुबह ही घर आते हैं. तो मेरे एक कुंटल के गोल चेहरे वाले पिता जी ने मुझे देख कर एक गहरी मुस्कान अपने चेहरे पर चढ़ा ली. और पूछने लगे, कैसा रहा दिन ? और आज मैं बस से क्यों नहीं आया ? मैं उन्हें सब कुछ साफ़ साफ़ बता देना चाहता था. और पूछ भी लेना चाहता था कि क्या वो अजगर हैं ? और मीरा नागिन ? और ये भी कि क्या अजगर के साथ नागिन नहीं रह सकती. पर मैंने कहा, इंडिया मैच जीत जाएगी. पिता जी ने टीवी की ओर देखा और खुश हो गए. शायद धोनी ने छक्का मारा था. पिता जी धोनी को आशीर्वाद देने लगे तो मैं सीधे अपने कमरे में चला गया. मैंने कमरे में लाईट जलाई और अपने सारे कपडे उतार दिए. मैंने पागलों की तरह अपने भीतर रह रहे नाग को तलाशा और जब वो मिल गया जी भर के उसे प्यार किया. मैंने उससे कहा कि मैंने उसे पहचान लिया है. और जब भी मौका मिलेगा मैं उसके साथ न्याय करूँगा. बाहर टीवी पर इस वक़्त प्राईम टाइम डीबेट चल रही थी और कोई टकला आदमी कह रहा था कि अगर इस बार पाकिस्तान और भारत का युद्ध हुआ तो पाकिस्तान भारत को आधे दिन में मिटा कर रख देगा. और पहला परमाणु हमला दिल्ली पर ही किया जायेगा. डीबेट पैनल में बैठे सभी लोग हंसने लगे और मेरे पिता जी को सबसे ज्यादा हंसी आई थी मानो उन्हें लगा हो कि अगर वो इस बात पर नहीं हँसेंगे तो मर जायेंगे. मैंने दराज से एक डायरी निकली और उस टकले की बात डायरी में समय, तारीख और दिन के साथ नोट कर ली. उस दिन मैंने खाना नहीं खाया और सोने का बहाना करके अपने बिस्तर पर सो गया.

चूंकि मैं बहाना करके सोया था इसलिए रात में जब मेरे 44 साल के पिता और मेरी 24 साल की मीरा कमरे में गए. तो मैं अपनी कॉपी और पेंसिल लेकर दरवाजे के बाहर, दरवाजे पर हुए एक इंच के छेद पर अपनी आँख रख कर बैठ गया. मैं जान लेना चाहता था कि क्या वाकई मेरे पिता जी अजगर हैं. मीरा के बारे में मुझे पता चल गया था कि वो नागिन ही है. पिता जी ने कमरे में घुसते ही लाईट बुझा दी और मुझे सबकुछ साफ़ साफ़ दिखने लगा. क्योंकि मैं आजकल आवाज़ों को देखने लगा था और दृश्यों को सुनने लगा था. 

पिता जी ने कहा- मीरा, तुम्हारे बाल अँधेरे के जंगल हैं और इसमें सैकड़ों घोड़े अपना रास्ता भूल कर बेतहाशा दौड़ रहे हैं. मीरा ने एक मरी हुई सांस ली और मैंने देखा एक खट्टी से उदासी चारो तरफ फैल गयी पिता जी की आँखों ने कहा “मीरा तुम्हारा बदन चाँदी का है” और उनका हाँथ बोला “संगमरमर की सारी चिकनाई तुम्हारे बदन ने चुरा ली है मीरा”.

मीरा ने न पिता जी की आँखों की बात सुनी और न हांथों का कहा माना. पिता जी जैसे जैसे मीरा को उसके शरीर की विशेषता और परिभाषा बताते गए. मीरा पत्थर होती गयी. पिता जी को इसबात से कोई फर्क नहीं पड़ा. और वो अजगर की तरह मीरा के बदन को जकड़ते चले गए. मीरा अपनी आँखें कभी अलमारी पर टिकाती, कभी रोशनदान पर रख देती. कभी कमरे की छत पर चिपका देती. उसकी आँखें जबतक अलमारी, छत और रोशनदान से होती हुई दरवाजे के छेद से बाहर आई तबतक मैंने कमरे की सारी आवाज़ों को पेन्सिल से कागज पर कैद कर लिया था. मीरा ने पिता जी के कानों में कुछ कहा और पिता जी का ढाई किलो का चेहरा तेजी से दरवाजे की ओर मुड़ा. कोई आवाज़ नहीं हुई इसलिए मुझे कुछ दिखा भी नहीं. अगले क्षण पिता जी दरवाजा खोले मेरे सामने खड़े थे. और जो दृश्य था उसने मुझसे कहा कि मुझे मर जाना चाहिए पर मैंने कागज पर पेन्सिल से अंतिम वार किया और चित्र बन गया.

यहाँ क्या कर रहे हो ? पिता जी ने कहा, मैंने कागज पिता जी के हांथों में दे दिया. उन्होंने दो सेकेण्ड कागज हांथों में पकड़ कर महसूस किया उन्हें न जाने क्या महसूस हुआ कि वो पसीने से भीग गए. उनका शरीर थर थर काँप रहा था. मीरा अन्दर उन्नींदी सी पड़ी थी जैसे कोई नागिन केचुल उतारते हुए पड़ी रहती है. मीरा के भीतर की नागिन ने मेरे भीतर के नाग को पहचान लिया और पिता जी ने भी जान लिया कि अब मैं बच्चा नहीं रहा. 
पिता जी ने फिर सवाल किया:- तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? इस बार उनकी आवाज़ इतनी जोर से चुभी कि मैं रोने लगा. उन्होंने अपने हांथों में अटके हुए कागज को देखा. जिस पर एक औरत जिसका आधा शरीर नागिन का है. एक बड़ी सी चट्टान पर पड़ी है. उसके शरीर पर एक अजगर लिपटा हुआ है और चट्टान के नीचे एक 14-15 साल का लड़का दबा पड़ा हुआ है. पिता जी का मन हुआ कि वो कागज फाड़ कर फेंक दें. पर उन्होंने उसे अपनी जेब में रख लिया और बोले “हे राम”.  उन्होंने हे राम ऐसे बोला जैसे किसी ने उन्हें गोली मार दी हो. उन्होंने मेरे बाल पकडे और दो तमाचे लगाये. मेरे मन ने कहा कि मैं बीमार हूँ और मुझे बेहोश हो जाना चाहिए. मुझे तुरंत बुखार आया और मैं बेहोश हो गया. उस समय पिता जी की घडी ने रात के 2 बजाये थे और सुबह 5 बजे जब मुझे होश आया तो मैं अपोलो हास्पिटल के कमरा नंबर 12 में पड़ा था. मैं इस प्राइवेट कमरे में प्राइवेट नर्स के साथ था. पिता जी मुझे भर्ती करा कर चले गए थे. ऐसा मुझे उस सांवली मगर खूबसूरत नर्स ने बताया. जिसका नाम मैंने तबतक नहीं पूछा जबतक मैं हास्पिटल से घर नहीं चला आया. मैं हास्पिटल में तीन दिन रहा और चूंकि मैं मंगलवार की सुबह 3 बजे भर्ती हुआ था इसलिए मुझे शुक्रवार को शाम 3 बजे डिस्चार्ज किया गया. मैंने सोचा कि पिता जी से डाक्टर ने जाते वक़्त कहा होगा कि उन्हें मुझसे ख़ूब बातें करनी चाहिए. मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ और अकेलापन मेरी बीमारी की वजह है. पर डाक्टर ने पिता जी से कहा था कि अब सब कुछ ठीक है और उन्हें फिकर करने की कोई जरूरत नहीं है. पिता जी रोज हास्पिटल में तीन दिन तक शाम 3-4 बजे के बीच मुझसे मिलने आते थे. और बस एक ही बात कहते थे “बेटा मीरा तुम्हारी माँ है” मैं उनसे न जाने क्या कहना चाहता था कि मेरी भाषा मुझे बहुत छोटी जान पड़ती थी और मैं चुप रह जाता था. एक दो बार रोया भी था. रोने पर पिता जी को एक अजीब सी ऊब होती थी और वो कहते थे कि ये रोने की नहीं सोचने की बात है. मैं उन्हे अब कैसे बताता कि मैं बस वही करता रहता हूँ. रातो-दिन सोचना. पर क्या सोचता हूँ मुझे खुद भी नहीं मालूम. 

पिता जी ने जब पहले दिन मंगलवार को दोपहर 3.30 बजे मेरे माथे पर हाँथ रखकर कहा था कि “बेटा मीरा तुम्हारी माँ है” तो मैंने उनके जाने के बाद मीरा और माँ दोनों को काफी देर तक याद किया. बीच बीच में मुझे अपनी और पिता जी की भी खूब याद आई थी. खुद को याद करना सैनाईट चाटने जैसा कुछ होता है. उसदिन मुझे ये बात पता चली थी. मैं पिता जी के जाने के बाद कागज पर पेन्सिल से अपनी बात उतारता रहा और जब मैं कार पर पिछली सीट पर पिता जी के साथ बैठा था और घर अभी एक किलो मीटर ही दूर था पिता जी ने फिर एक बार दोहराया “बेटा मीरा तुम्हारी माँ है” मुझे एक गहरी कोफ़्त हुई और मैंने ये जानते हुए भी कि पिता जी को कुछ समझ नहीं आता. मैंने जेब से वो कागज का टुकड़ा निकाल पर पिता जी के हांथों में दे दिया. जिसमे तीन निवस्त्र औरतें इस तरह आपस में जुड़ीं हुईं थीं कि धनुष बन गयीं थीं. ये धनुष एक निवस्त्र आदमी के हांथ में है. जो अँधेरे के एक पहाड़ पर खड़ा है और आकाश की तरफ देख रहा है. बारिश की बूंदों का अपहरण करके उन्हें जमीन के भीतर आग की छोटी कोठरियों में कैद कर दिया गया है. पहली औरत का चेहरा मेरी माँ से मिलता है और दूसरी औरत का चेहरा मीरा की तरह है और तीसरी औरत मेरी तरह लगती है. निवस्त्र आदमी की शक्ल पिता जी से मिलती है. 

मैं कागज पिता जी को दे कर गाडी से बाहर  देखने लगा और पिता जी को भी कागज हाँथ में लेते हुए जाने क्या हुआ कि उनकी आत्मा गाडी से बाहर कूद गयी और वो मरे-मरे से लगने लगे. हमने तबतक बात नहीं की जबतक ड्राईवर ने कार का दरवाजा खोलकर नहीं कहा “साहब ” घर आ गया है. मैं कार से बाहर निकला और अपने कमरे में जाने से पहले मैंने पिता जी से पूछा:- “हॉस्पिटल वाली लड़की का क्या नाम था ?” पिता जी ने एक शब्द में जवाब दिया माधुरी. मैं “अच्छा नाम है” कहते हुए, अपने कमरे में चला गया.

उस दिन के बाद मैं मीरा को माँ कहता रह और मीरा मुझे बेटा. जब मैं मीरा को माँ कहता था. तो मीरा को हंसी आती थी और मुझे कोफ़्त. और जब मीरा मुझे बेटा कहती थी तो मुझे हंसी आती थी और मीरा को कोफ़्त. पर हमारी हंसी और कोफ़्त के बीच पिता जी हमेशा हँसते हुए पाए जाते थे. मैंने चार महीने तक न कोई चित्र बनाया और न ही जासूसी ही की. इस बीच मैंने गुरविंदर से भी बात नहीं की. इसलिए उन चार महीनों में मैं जिन्दा था इस बात का मैं कोई सुबूत नहीं दे सकता. मुझे मीरा को माँ मानने के लिए रोज एक कुंटल सोचना पड़ता था. और जिस दिन भी मैं एक कुंतल से एक ग्राम भी कम सोचता मुझे बहुत रोना आता था और मैं रात भर सो नहीं पाता था. 

जब आप अकेले रोते हैं तो आपके आंसूं आँखों से निकल कर गलों पर जम जाते हैं. और आपका चेहरा काला पड़ने लगता है. पिता जी मुझसे पूछते थे कि मैं आजकल इतना काला क्यों होता जा रहा हूँ? मैं कहता था “मैं आजकल बहुत सोचता हूँ और अकेले रोता हूँ न इसलिए” पिता जी को ये बात हंसने वाली लगती थी और वो जी भर के हँसते थे और उनके जाने के बाद मैं जी भर के रोता था. 

उन चार महीनों के बाद एक दिन जिसका नाम 10 जुलाई था बिना ये बताये आ गया कि उस दिन मेरा जन्मदिन है. दिन ने नहीं बताया इसलिए न मुझे याद रहा और न पिता जी को. मीरा से 10 जुलाई का कोई परिचय नहीं था. इसलिए वो आपस में अनजान थे. तो खैर 10 जुलाई को सूरज डूब रहा था और मेरे दिमाग में बीतने वाले रविवार की नहीं आने वाले सोमवार की फिकर थी. मैंने छत पर बैठे हुए अपनी उदासी की पीठ पर सूरज की बची हुई रौशनी से अपनी माँ का चेहरा बनाया. माँ मुझे देख कर मुस्काई और मैं उसे देखता ही रहा. मेरे इस देखने में एक आवाज़ ने खलल डाली और चूंकि मैं आवाजें देख सकता था इसलिए मैंने देखा कि मीरा अविनाश की बाँहों में बर्फ की तरह पिघल रही है. वो कह रही है कि उसके बाल अँधेरे के जंगल हैं और इस जंगल में सैकड़ों घोड़े अपना रास्ता भूल कर बेतहाशा दौड़ रहे हैं. “बाल खोल दो” अविनाश कहता है और मीरा घोड़ों को आज़ाद कर देती है. मीरा फिर कहती है “उसका बदन चांदी का है और उसने संगमरमर की सारी चिकनाई चुरा ली है”. अविनाश कहता है “दिखाओ”. मीरा को अपने कपडे बेकार की चीज़ लगते है और वो खुद को और अविनाश को महज ज़िस्म बना देती है. 

अविनाश इस क्षण से पहले मेरे लिए भारत के सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों में से एक हिन्दुस्तानी था. मेरे बड़े से घर के छोटे से कमरे में रहने वाला एक पारदर्शी किराएदार. पर उस क्षण वो मेरी जिंदगी में बिन बुलाए इतनी जोर से दाखिल हुआ जैसे मौत दाख़िल होती है जिंदगी में. चूंकि मौत के आने के बाद आपके लिए और किसी चीज़ का कोई ख़ास मतलब नहीं रह जाता इसलिए अविनाश के आने के बाद मेरे लिए पिता जी की कही हुई बातों का कोई खास मतलब नहीं रह गया. और मैं दरवाजे पर बिजली की तरह टूट पड़ा. दरवाजा खुलने में पांच मिनट लगे. और उन पांच मिनट में मैंने पांच सौ गलियां दी. पर किसको, मुझे नहीं मालूम. जब दरवाज़ा खुला तब मीरा कुर्सी पर बैठी थी और अविनाश दरवाजे पर खड़ा था. मेरे मुंह से निकला “कि अच्छा तो तुम हो मीरा के नाग”. मैंने ये बात ना जाने किस अंदाज़ में कही थी कि मीरा खिलखिला के हंसने लगी और अविनाश की आँखों में एक डर तैर गया. मीरा की सर के ऊपर दिवार पर टंगी घड़ी ने मुझसे कहा “6 बजे हैं”. मेरे मन ने घडी से कहा जल्दी से सात बजा दे. 

मैं अपने कमरे में बैठे बैठे सात बजने का इंतज़ार कर रहा था और वो तीन लड़के जिनके नाम का कोई ख़ास मतलब नहीं था. हरियाणा के किसी गाँव के किसी कमरे में नीली फिल्म देख कर आँखों की रौशनी बढ़ा रहे थे. वो अपनी जन्दगी से इस तरह निराश थे की मौत का धंधा करने लगे थे. उनमे से एक का बाप मजदूर था, दुसरे का किसान और तीसरे का न मजदूर, न किसान, शराबी था. एक की प्रेमिका की शादी हो गयी थी. दुसरे की प्रेमिका ने प्रेमी बदल लिया था और तीसरे के जीवन में लड़कियां महज नीली फिल्मों से होकर आतीं थीं. उन तीनों को एक फोन आता है और तीनों एक कार में बैठ कर कहीं चले जाते हैं. एक ही समय में कितनी अलग अलग घटनाएं घटती है जो अगली एक घटना को तय करतीं है. तो उस पल एक साथ कई घटनाएँ घटीं और एक घटना तय की गयी. 

मेरे कमरे का दरवाजा खुला और अविनाश मेरे सामने खड़ा था. अविनाश ने कहा “मुझे तुमसे बात करनी है” मैंने कुछ नहीं कहा पर मेरी आँखें बोल उठीं “मेरे पिता जी तुमसे बातें करेंगे” तुम बाहर चलो मैं तुम्हे कुछ समझाना चाहता हूँ, अविनाश ने कहा. मेरे दिमाग ने मेरे पैरों से कहा “कहीं नहीं जाना” पर मेरे पैरों ने कहा नहीं माना और मैं अविनाश के साथ बाहर पार्क में बात करने चला गया. उसके बाद 6 गज़लें और साठ के दशक वाले दर्द में डूबे 8 गाने बजे और शाम रात में बदल गयी. चूंकि पापा 7-8 के बीच नहीं आए इसलिए वो अगली सुबह आयेंगे. मैं अब दिल्ली हरियाणा के बॉर्डर के पास खेत में बने एक कमरे में था. वो लोग इसे इंजन वाला कमरा कह रहे थे. ग़ज़लों में जो शब्द कठिन आता अविनाश बिना पूछे ही उसका मतलब सब को बताने लगता और तीनों में कोई न कोई उसे गाली दे देता. मुखर्जी नगर से हरियाणा बॉर्डर तक मुझे 15-16 उर्दू के शब्द पता चल गए थे. मैं सोच रहा था कि मैं जब कभी भी शायरी लिखने लगूंगा इन शब्दों का प्रयोग जरूर करूँगा. कमरे में एक पुराना रेडियों पड़ा था. जिसमे ‘तेरे बिना भी क्या जीना ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना’ गाना बज रहा था. उन तीनों में से एक ने कमरे की लाईट जलाई और जोर जोर से रेडियो पर बजता गाना गाने लगा. बाहर खड़े तीसरे आदमी ने अविनाश को जाने के लिए कहा और जब अविनाश जाने लगा तो मैंने अविनाश से कहा “तुम क्या कहना चाहते थे”  तो उन तीनों में से जो सबसे छोटा और मोटा था. वो इंसान और जानवर के बीच का कोई जीव था. जिसके जीवन में लड़कियां नीली फिल्मों की खिडकियों से कूद कर आतीं थीं. उसने मुझसे कहा, अब वो मुझे बताएगा कि अविनाश क्या कहना चाहता था. मुझे लगा कि मुझे चुप रहना चाहिए और मैं चुप रहा. 

रेडियो पर गाने बदल रहे थे और शराब इन तीनों को बदल रही थी. मेरे पास जेब में एक कागज था. जिसपर मैं कुछ बनाना चाहता था या लिखना चाहता था ठीक से नहीं कह सकता. पर मुझे पेन या पेन्सिल की बेहद जरूरत थी. तीनों में से नीली फिल्मों वाले आदमी ने मुझसे कहा कि “नाच के दिखा”. मैं उसके कहने का कुछ मतलब समझता उससे पहले ही उसने मेरी टांगें और हाँथ खोल दिए और एक तमाचा जड़ दिया. उसके मारते ही मैं नाचने लगा. बाकी दो लड़कों ने तीसरे को मना किया और जब वो नहीं माना तो वो कुछ खाने के लिए लेने बाहर चले गए. मैं नाचते नाचते उस बड़ी नोटबुक के पास जाना चाहता था जिसके भीतर एक पेन रखी थी. शायद ये नोटबुक पानी लगाने के समय को लिखने के लिए रखी गयी होगी. मैं नाचते नाचते उस नोट बुक तक पहुंचा और पेन अपने हांथो में ले लिया. नीली फिल्मों वाले उस आदमीं की आँखों में अब नीली फ़िल्में चलने लगीं थी. उसने मुझसे कहा कि मैं कपडे उतार दूं. मैं रोने लगा और वो खूब कस के हंसने लगा. उसके बाद उस आदमी ने मुझे बताया कि जिंदगी कितनी बदसूरत हो सकती है. मेरे शरीर में उठते दर्द और बहते खून ने मुझसे कहा कि मुझे मर जाना चाहिए. मैं अब “मैं” नहीं बचा था. मैं उस आदमी की भूख का सामान भर रह गया था. उसकी कुंठा मेरी नसों में बहने लगी थी और मैं कागज पर कुछ बनाता चला जा रहा था. पहले मैं रोया बाद में मुझे लाश की तरह महसूस करने लगा.  

अगली सुबह जब पिता जी आये तब मीरा रो रही थी. उसने उनसे कहा कि मैं कल रात से कहीं निकला हुआ हूँ. पिता जी ने सवाल किया “कितने बजे से ?” मीरा फिर रोने लगी. पिता जी बदहवासी में बाहर भागे और उनके कदम सीधे पुलिस स्टेशन पर रुके. वो मेरी गुमसुदगी की रिपोर्ट लिखवाना चाहते थे. पर पुलिस ने कहा एक दो दिन पहले ढूँढ लो फिर आना. पिता जी निराश होकर पूरा दिन शहर भर में मुझे ढूंढते रहे और मैं दिल्ली हरियाणा के बॉर्डर पर एक नाले में मरा पड़ा था. अगली सुबह मैं पिता जी को मिला अखबार के तीसरे पन्ने पर एक कलम में सिमटा हुआ. अखबार ने उन्हें बताया कि दुराचार के बाद मुझे मार कर फेंक दिया गया है. और मेरी लाश पुलिस के पास है. पिता जी पुलिस के पास मेरी लाश लेने पहुंचे. पुलिस ने उन्हें लाश के साथ एक कागज दिया. जिसमे मैंने वैसे ही एक उलझा हुआ चित्र बनाया था. जैसे पहले बना कर पिता जी को दिखा चुका था. मेरे पास संवाद का एक यही तरीका बचा था. पहली बार पिता जी ने उस चित्र को समझने की कोशिश की और फूट फूट कर रोने लगे. अब उन्होंने क्या समझा. मैं जीवित होता तो उनसे पूछता. शायद उन्हें मेरे उस चित्र में मेरा आखरी वाक्य “मीरा तुमने तो मार ही डाला” सुनाई या दिखाई दे गया हो.      

अनुराग अनंत 

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