शनिवार, अप्रैल 30, 2011

ढाई आखर की नदी


हम -हम नहीं रहे ,वो -वो नहीं रहे, कल रात हमारी मुलाकात थी ,
रातें तो कई देखीं थी हमने ,पर कल रात कुछ अलग रात थी 
ढाई आखर की एक खाई है ,
तुम्हारे और मेरे बीच,
जो गहरी है इतनी,
कि जितना गहरा प्यार होता है ,

मैं अपना प्यार भर चुका हूँ  इसमें ,
तुम भी अपना प्यार भर दो न , 

फिर ये ढाई आखर की खाई ,
ढाई आखर की नदी हो जाएगी ,
और हम बह जायेंगे कुछ पलों के लिए , 

ये पल सृजन के होंगे , 

तुम्हारा --अनंत 

शुक्रवार, अप्रैल 29, 2011

खाई है सूखी रोटी ,

सूखी रोटी भी नसीब नहीं, कहते हैं की कहूँ, खीर खाई है 
मैं रचना गूढ़ लिखूं ,गम्भीर लिखूं ,
मैं दिल की उभरी पीर लिखूं ,
खाई है ,सूखी रोटी ,
तो  फिर  कैसे पूरी-खीर लिखूं ,

मैं घावों की गहरी टीस लिखूं ,
डॉक्टर की महँगी फीस लिखूं ,
माँ-बाप की बिमारी लिखूं ,
तंग जेबों की लाचारी लिखूं ,
है जो कातिल मैं जान रहा ,
फिर कैसे उसे फ़कीर लिखूं ,
खाई है सूखी रोटी ,
तो फिर कैसे पूरी खीर लिखूं  
मैं रचना गूढ़ लिखूं गंभीर लिखूं ,
मैं दिल की उभरी पीर लिखूं ,

हैं हित टंगे हांसिये,पर सब के ,
जो दीन, दमित ,निधन तबके ,
मैं उनकी रोटी की तरसन लिख दूं ,
चीत्कार -रुदन- गर्जन- लिख दू
मैं अंधी और बहरी सरकार का हाल लिखूं ,
मैं अपने दिल का मलाल लिखूं ,
अब मन कहता है ,चीख -चीख ,
खुद के हाथों से खुद की तकदीर लिखूं ,
मैं रचना गूढ़ लिखूं ,गंभीर लिखूं ,
मैं दिल के उभरी पीर लिखूं ,
खाई है सूखी रोटी ,
तो फिर कैसे पूरी खीर लिखूं  ,

तुम्हारा --अनंत 

रविवार, अप्रैल 24, 2011

दर्शन का बम

आज का गाँधी ,आज की तैयारी ......(सभार - आशुतोष )
राजपथ पर एक बूढ़ा खड़ा था ,
पीठ लादे एक भारी पोटली ,
तन पर थे जो भी कपड़े ,
फटे-चिटे थे ,
काँपता आनन था ,
हिय डोलता था ,
रह-रह कर,
 हे राम ! हे राम ! बोलता था ,
सनसनाती कार ,मोटर , गाड़ियाँ थी ,
चमचमाती बिल्डिंगों की क्यारियाँ थी ,
ध्यान कौन देता उस भिखारी पर ,
हर आदमी आसीन था सवारी पर ,
मैं पास पहुंचा ,
पूछा की बाबा कौन हो ?
कुछ बोलते क्यों नहीं ?
क्यों मौन हो ?
क्यों हताश हो ?
 क्यों घबराए हुए हो ?
ये बताओ तुम कहाँ से आये हुए हो ?
उस बाबा ने चुप्पी तोड़ कर मुँह खोला ,
वेदना को स्वर दिए ,और हँस के बोला ,
मूर्तियों और नोटों में कैद तुमने कर दिया है ,
अभिशाप दे कर ,ये कैसा वर दिया है ,
जिनके खातिर मैं लड़ा था ,सूली चढ़ा  था,
वो आज भी वहीँ खड़ा है ,जहाँ कल खड़ा था ,
इस विकास  की अंधी दौड़ में हिन्दुस्तान पीछे छुट रहा है ,
चन्द अमीरों  के हांथों में हिंद का दम घुट रहा है ,
संसद में जा कर सब A.C. लगा कर सो गए हैं ,
अजब सन्नाटा है निजाम में ,बहरे सभी सब हो गए हैं ,
एक बिगडैल बेटे की मुझे जो याद आई ,
मैंने बम भरी पोटली काँधे पर उठाई ,
फोड़ा था जैसे बम  अस्सेम्ब्ली में उस  भगत सिंह ने ,
वैसे ही मैं संसद में फोड़ने जा रहा हूँ ,

गाँधी है नाम मेरा ,
मैं राजघाट से आ रहा हूँ ,

तुम्हारा --अनंत 

शनिवार, अप्रैल 23, 2011

प्यार में अक्सर भूल हो जाती है

एक नज़्म कह नहीं पाया 
सो चबा गया था 
पर हज़म नहीं हुई 
वो गहरी गुलाबी नज़्म 
चेहरा पूरा लाल पड़ा हुआ है 
कि जैसे खून पोता हो किसी ने 
या फिर होली खेली हो खून की
खैर, उस रात  
रात ओढ़े 
रात की तरह 
रात भर 
मैं खड़ा रहा .........
कि शायद इस रात मेरा सूरज मुझे दिखे 
और मैं कह दूं 
ऐ सूरज !!
ये रात तुझे प्यार करती है 

पर रात को क्या पता था
कि सूरज रंग बदलता है 

वो उसे अपनी तरह एकरंगा  समझती थी 

प्यार में अक्सर भूल हो जाती है 

तुम्हारा -- अनंत 


गुरुवार, अप्रैल 21, 2011

हमशक्ल पेड़

अज़ीब-अज़ीब काम करता है आदमी ,
जब वो किसी अज़ीब काम में फँस जाता है ,
याद है मुझे ,
 जब मेरी आँखे तेरी आँखों में फँसी थी ,
 कुछ ऐसे ही अज़ीब काम किये थे मैंने भी ,
किये थे दर्शन ,सुबह-दुपहर-शाम ,
उस मंदिर में ,
जहाँ  पुजारी के अलावा ,
कोई और नहीं जाता ,
टहलने जाता था ,
उस मैदान में ,
जो तेरे घर के सामने था ,
पर बंजर था ,
बन्दर ,कुत्ते ,गाय, चींटी,
सब को दाने खिलाये थे ,
तुझे रिजाने के लिए.............

अब जब मैं दूर चला आया हूँ ,
तो मुझे बताओ तो ,
उस मंदिर के ''राम '' ने ,
तुम्हें वो सब बताया था कि नहीं ,
जिसे मैं कह के आया था ,
तुहें बताने के लिए ............

उन बंदरों ,गायों ,चीटियों ने ,
कहीं मेरी रोने की नक़ल तो नहीं की तुम्हारे सामने ,
मैं जब तन्हाई में तेरी याद में रोता था ,
इनमे से कोई न कोई साथ होता था ,
और हाँ ...........
वो पेड़ बड़ा हो गया होगा ,
जिसे मैंने उस बंजर जमीन पर बोया था ,
जो तुम्हारे घर के सामने है ,
गौर से देखना उस पेड़ की शक्ल मुझसे मिलती होगी ,


जल्दी बताना मैं इंतज़ार में हूँ ,

तुम्हारा --अनंत  

रविवार, अप्रैल 17, 2011

वो सच था या झूठ

औंधे मुँह आ गिरा  दिन ,
रात के पैरों में ,
पड़ा-पड़ा सो रहा है ,
देख कर कोई सपना .......
जो भागना चाहा कभी ,
फजीलों ने रोक लिया , 
और बंद कर दिया .
अँधेरे कमरों में,
रात के आगोश में .............
धीरे-धीरे सुलगने के लिए ,
उस दिन ,दिन के चेहरे पर ,
एक मायूस सी मुस्कुराहट,
कि जिसे  खिंचा गया हो .
दोनों सिम्त से ,
अबाले पढ़े थे ,दोनों जुबाँ पर ,
एक जुबाँ वो कि जिससे सच कहता था दिन ,
एक वो जो झूठ कहती थी ,
पर आज दोनों जुबानें खामोश हैं ,
 शायद दिन अभी तक समझ नहीं पाया ,
उस रात जो रात ने कहा ,किया.............

 वो सच था या झूठ 
तुम्हारा --अनंत 

माँ की हाथों की रोटियाँ

जब से घर से आया हूँ,
 परदेश ,
भूँखा हूँ,
 खाना तो खाता हूँ,
 पर पेट नहीं भरता  ,
घर जाऊं ,
माँ के हाथों की रोटियाँ खाऊँ,
 तो भूँख मिटे ,

''कमबख्त ये भूख,
माँ बेटे को अलग कर देती हैं''
''तुम्हारा -अनंत ''


''माँ की याद में ''

शनिवार, अप्रैल 16, 2011

दो मुल्क हैं , एक मुल्क में ,


दो मुल्क हैं ,
एक मुल्क में ,
एक की गलियाँ गुलज़ार हैं ,
फिजाओं में बहार हैं ,
हँसते हुए लब ,चमकते हुए रुखसार हैं ,
बलंद इमारतें ,कंक्रीट के जंगल हैं ,
मोटर, कार -कारखाने, बंगले, होटल हैं, 
ये मुल्क जितना खाता  नहीं ,
उससे ज्यादा फेंक देता है , 
इसके पथरीले दस्त में है ज़ोर-ए-ज़र,
यहाँ हँसती हुई शब है ,खिलखिलाती है सहर ,

उधर एक जो  दूसरा मुल्क है ,
उसकी गलियाँ बेज़ार है ,
ज़ख़्म है मुफलिसी के ,
जिगर बेतहासा फ़िगार है ,
रुखसार पर अश्कों  के गहरे निशान है ,
छत नहीं है सर  के ऊपर ,बेफज़ीली माकन है,
पहला वाला मुल्क इंडिया है ,
दूसरा मुल्क हिंदुस्तान है ,

तुम्हारा -अनंत 

बुधवार, अप्रैल 13, 2011

खारा सा ख्याल

एक खारा-खारा ,
ख़ाकी-ख़ाकी ,
ख्याल सताता रहता है ,

जब भी तनहा,
 कभी अकेले ,
तन्हाई में,
 खुद से बातें करता हूँ ,

ये आ कर बैठ जाता है सामने ,
प्यासे कुत्ते की तरह ,

हाँक देता हूँ जब इसे ,
ये भौंरा बन जाता है ,
और भूम-घूम कर बस यही बडबडाता है,

''जैसा तुम कर रहे हो 
अपमे माँ-बाप के साथ 
तुम्हारे बच्चे भी 
वैसा ही करेंगे तुम्हारे साथ ,, 

तुम्हारा --अनंत 

फिर से स्कूल चलेंगे


कान पकड़ कर एक दूजे का,
हम आला-बाला खेला करते थे ,
लुका-छिपी ,गुड्डा-गुडिया ,
पकड़ा-पकड़ी और...........
न जाने क्या-क्या ?

माटी का घर था ,
कागज की कस्ती थी ,
नालियों में नदियाँ थी ,
नालों में समंदर था ,
और सावन भालू की तरह नाचा करता था,
आँगन में ,
फिर हँसी की सब्ज फसल उग आती थी ,
लबों की सुर्ख ज़मी पर ,

हम साथ गले-हाथ डाले ,
स्कूल से चले आते थे ........
कभी तुझे छूने से पहले,
ये  नहीं सोचा की तुझे छू रहा हूँ ,
हर बार तुझे यही सोच कर छूआ  ,
की जैसे खुद को छू रहा हूँ ,
पर मुन्नी !!!!!!!!!!!

जब से तू दुपट्टा लेने लगी है ,
तेरे गले में हाथ डालते नहीं बनता ,
तुझे उस तरह छूते नहीं बनता ,
जैसे पहले छूता था , 


तू कल दो चोटी कर के फ्रांक पहेनना ,
दोनों तैयार हो कर फिर से स्कूल चलेंगे,

तुम्हारा --अनंत  

मंगलवार, अप्रैल 12, 2011

साथी छूट गया

जब संगदिल के संग लगा ये दिल ,
इसे टूटना ही था , टूट गया ,
जो साथी कभी न साथ रहा ,
उसे छूटना ही था ,छूट गया ,

अब रह-रह कलम चलाता  हूँ ,
गम से ग़ज़ल बनाता हूँ ,
हर्फों के अश्क बहाता  हूँ ,
खुद से खुद को समझाता हूँ ,
अब प्यासा जीवन जीना है ,
तेरे  हाँथों का प्याला छूट गया ,

जब संगदिल के संग लगा ये दिल ,
इसे टूटना ही था टूट गया ,

जब कोई साँसों के जैसा हो जाये ,
धड़कन के संग घुल मिल जाये ,
उसे यूँ ही भूलाना मुश्किल है ,
जिस सपने में उसको पाया था ,
वो सपना शायद कच्चा था ,
उसे टूटना ही था ,टूट गया ,
जो साथी कभी न साथ रहा ,
उसे छूटना ही था , छूट गया ,

तुम्हारा -- अनंत 

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

याद सीने में अटकी हुई है ,

ये आंसू तन्हाई के हैं 
साँसों का क्या है ,
ये आती हैं ,जाती हैं ,
एक तेरी याद है ,
जो  सीने में अटकी हुई है ,

मुझे रह -रह कर पुकार रहा  है कोई,
छिप -छिप कर निहार रहा है कोई ,
मैं अब मैं नहीं रहा शायद ,
मेरे भीतर जिन्दगी गुज़ार रहा है कोई ,
लगता है ये तेरी यादों का जंगल है ,
जहाँ मेरी रूह भटकी  हुई है, 

एक तेरी याद है ,
जो सीने में अटकी हुई है ,

कल की ही तो बात है ,
तेरा नाम किसी नें लिया था ,
किसी और को बुलानें के लिए , 
बस ये काफी था ,
मेरे तिनके नुमा दिल को जलने के लिए,
मैं सोचता हूँ ,
कि आँखों में अश्क भर-भर कर उड़ेलूँ
इस आग पर ,
पर क्या करूँ,
मेरी आँखों की मटकी चटकी हुई है ,

एक तेरी याद है,
 जो सीने में अटकी हुई है ,

तुझे पता है !
जिन्दगी तेरे बिना ,
अंधरे में घिरता हुआ एक चराग़ बन गई है ,
जब बसाया था दिल में तो शबनम थी ,
अब तेरी तस्वीर आग बन गयी है ,
तेरी याद में कब का फ़ना हो गया हूँ मैं ,
ये जान तो बस यूँ ही लटकी हुई है ,

एक तेरी याद है ,
जो  सीने  अटकी हुई है ,

तुम्हारा --अनंत

रविवार, अप्रैल 10, 2011

मैं कविता तब ही लिखता हूँ ,

महा प्राण निराला 
मैं कविता तब ही लिखता हूँ ,
जब कोई भाव दिल में दफ़न हो जाता है ,
जब कोई भीतर -भीतर अश्क बहाता है ,
जब महेनत बेच मजूरा घर पर,
 भूंखे पेट सो जाता है ,
जब बच्चे जैसा कोई सपना ,
आँखों की गोदी से खो जाता है ,
जब नन्हें हाथ औज़ार उठाते हैं,
 जब बच्चे बूढ़े हो जाते हैं,
 तब मैं कविता से आग लगाता  हूँ ,
मैं कविता तब ही लिखता हूँ ,
जब मुफलिस माँ तन बेच के घर को आती है ,
बच्चों की भूख मिटाती है ,
जब पति घर में दारू पी कर आता है ,
पत्नी पर हाथ उठता है ,
जब दमितों का रक्त उबलता है ,
जब क्रोध ह्रदय को दलता है,
जब कोई  बेबस छाती मलता है ,
जब उगने वाला सूरज ,
उगने से पहले ढल जाता है,
तब मैं संघर्ष का दीपक बनकर जलता हूँ ,
मैं कविता तब ही लिखता हूँ ,
जब कोई रिक्सा वाला ,
चौराहे पर गश खा कर गिर जाता है ,
जब उसके निर्बल देह को ,
कोई हाथ तक नहीं लगाता  है ,
जब किसी की बेटी को,
 कोई पैसे की खातिर आग लगाता  है ,
जब कोई शिक्षित बेरोजगार , 
डीग्री के बोझ तले मर जाता है  ,
तब  अपनी कविता के बम,
 मैं दिल्ली की ओर चलाता  हूँ ,
मैं कविता तब ही लिखता हूँ ,
 तुम्हारा --अनंत   
''महाकवि निराला के दमित प्रेम को समर्पित ,,
''निराला की याद  में ''

शुक्रवार, अप्रैल 08, 2011

पुकार


आओ अन्ना के साथ चलें , भारत माँ पुकार रही हैं

फिर कुछ हलचल सी है शायाद,
 कोई सागर मंथन करता है ,
हिमगिरी का रक्त तिलक कर के,,
 कोई पूजन वंदन करता है ,
हील रही है संसद ये ,
लाल किला मुस्काता है ,
वृद्ध तिरंगा देखो कैसे ,
तरुणों सा लहराता है ,
राज घाट से तूफ़ान उठा है ,
जंतर -मंतर में घूम रहा है,
पहन चोला हजारे का ,
गाँधी बाबा झूम रहा है, 
भगत सिंह ल,क्ष्मी बाई,
आजाद बोस सब जागेगें,
गोरी चमड़ी के अंग्रेज गए ,
अब काली चमड़ी वाले भागेंगे ,
ये धर्म युद्ध की बारी है ,
हमें अर्जुन बन कर लड़ना है, 
है सम्मुख उतुंग शिखर तो क्या ,
हमे जय हिंद पुकार के चड़ना है ,
जब अन्ना की बूढी छाती में ,
देश भक्ति की धारा बह सकती है ,
तो फिर कैसे मेरे हिन्द की ,
 युवा पीढ़ी सो सकती है ,
अब हमे  कसम है भारत माँ की ,
हम उसके खातिर युद्ध करेंगे ,
जो पग आगे चल निकले है ,
अब पीछे नहीं  धरेंगे ,
तुम्हारा --अनंत

अन्ना हजारे के इस प्रयास  में, मैं और मेरी रचनात्मकता दोनों साथ हैं ,और एक सुन्दर और स्वस्थ भारत बनाने के लिए कटिबद्ध हैं ,आप इस कविता पर टिप्पड़ी  कर के अपनी राय  से अवगत कराएँ ,साथ ही साथ इसे कम से कम १० लोगों को मेल करें तथा फसबूक से शेयर भी करे ...................
भ्रष्ट्राचार के खिलाफ माहोल बनाना है ,भ्रष्ट्राचार मिटाना है .............
 --अनंत  
फेसबुक पर सेयर  करने के लिए कविता के अंत  में f  पर क्लिक करे और अपनी ईमेल और passward   लिखें और  शेयर कर दें  ,......................
मेल करने के लिए एक टैब  पर g mail खोलें और फिर जहाँ f लिखा था वहीँ M पर क्लीक करे और खुलने वाले बॉक्स पर choose email id पर क्लिक कर सेंड कर दें .धन्यवाद अनंत

बुधवार, अप्रैल 06, 2011

चिमनी

कारखाने की चिमनियों से ,
निकलते हुए धुंए को देख कर ,
उसकी आँखें चमक उठी ,
और मेरी आँखें भीग गयी ,
चूँकि मेरे पेट का खाना इसी धुयें से हो कर ,
उसके पेट में गया है ,

ये धुयाँ है या फिर नली,
वो नली जिससे खून चूसा  जाता है,
तुम्हारा --अनंत 

मंगलवार, अप्रैल 05, 2011

बेकसी का सूत

जब सुबह से शाम तक ,
रात की तरह हर बात पर ,
बेकसी का सूत कात कर ,
घर लौटता हूँ ...........
गडा देता हूँ अपनी दोनों कील नुमा आँखें ,
सामने की तकिया नुमा  दिवार पर ,
सच  में ये आँखें भीतर तक घुस जाती हैं ,
और मुझमे मेरे होने को नकार देती है,
 फिर बड़ी  धीरे से चिड़ियों की तरह!
 कहती है ,
                न जाने तुम कौन हो ??.
    तुम कौन हो ??
              पता नहीं ..................
तुम्हारा --अनंत  

मैं गीत प्रणय के गाता हूँ ,

मैं गीत प्रणय के गाता हूँ ,
एक साथी था प्यारा -प्यारा ,
जिस पर तन- मन था वारा,
उस प्रियतम की प्रतिमा, अपने दिल में रोज बनता हूँ ,
मैं गीत प्रणय के गाता हूँ ,
ये मन रोता है उसके बिन ,
दिन बीत रहे है अब गिन-गिन 
मैं अपने व्याकुल मन को धीरे  से धीरज बंधवाता हूँ ,
मैं गीत प्रणय के गाता हूँ ,
एक अजाब अँधेरा दिखता है ,
दिल मेरा उससे डरता है ,
इस अन्धकार से लड़ने को, मैं उसकी यादें सुलगाता हूँ ,
मैं गीत प्रणय के गाता हूँ ,
तुम्हारा --अनंत  

रविवार, अप्रैल 03, 2011

मनुष्यता का प्रमाण

मानवता का महान पुजारी 
मनुष्य हो तो मनुष्य  होने का  का प्रमाण दो ,
मनुष्यता के पक्ष में, हे! मनुज तुम प्राण दो ,
हो विजय मनुष्यता की, पाशविकता का विनाश हो ,
मुक्त हो ये अखिल अवनि ,मुक्त ये आकाश हो ,
घोर- रोर- शोर-घनघोर -बरजोर हो ,
शोषण के विरुद्ध विरोध पुरजोर हो ,
तम के सकल बंध टूटे ,ऐसी ज्योति की हिलोर हो ,
प्राण की आहूतियों से मनुष्यता की भोर हो ,
जो रुदन लिप्त नयन हैं ,उदार विकल रिक्त हैं ,
ऐसे अंतिम व्यक्तियों के, अधर पर मुश्कान दो ,
मनुष्य हो तो मनुष्य होने का प्रमाण दो ,
मनुष्यता के पक्ष में हे! मनुज तुम प्राण दो , 
हवन कुंड क्रांति का, तू त्याग हवी डाल दे ,
पंक फसी मानवता निज श्रम से तू निकल दे ,
व्याकुल कंठ, विकल उर उसके ,हे! तरुण उसे  अनुराग दे ,
क्यों हो रहा  तू खंड- खंड निज स्वार्थ के प्रहार से ,
मुक्त कैसे हो गया तू मात्र भूमि  प्यार से,
जिस बलि वेदी पर चढ़ कर ,वीर शहीदों ने प्राण लुटाए थे ,
तुम भी उस पर चढ़ कर अपना जीवन दान दो ,
मनुष्य हो तो मनुष्य होने का प्रमाण दो ,
मनुष्यता के पक्ष में हे मनुज तुम प्राण दो ,
तुम्हारा --अनंत