सोमवार, अक्तूबर 31, 2011

मैंने माँ को देखा है ,

माँ 
मैंने माँ को देखा है ,
तन और मन के बीच ,
बहती हुई किसी नदी की तरह ,
मन के किनारे पर निपट अकेले,
और तन के किनारे पर ,
किसी गाय की तरह बंधे हुए ,
मैंने माँ को देखा है ,
किसी मछली की तरह तड़पते हुए  बिना पानी के,
पर पानी को कभी नहीं देखा तड़पते  हुए बिना मछली के ,
मैंने माँ को देखा है ,
जाड़ा,गर्मी, बरसात ,
सतत खड़े किसी पेढ़  की तरह ,
मैंने माँ को देखा है ,
हल्दी,तेल, नमक, दूध, दही, मसाले में सनी हुई ,
किसी घर की गृहस्थी की तरह ,
मैंने माँ को देखा है ,
किसी खेत की तरह जुतते हुए,
किसी आकृति की तरह नपते हुए,
घडी  की तरह चलते हुए,
दिए की तरह जलते हुए ,
फूलों की तरह महकते हुए ,
रात की तरह जगते हुए ,
नींव में अंतिम ईंट की तरह दबते हुए ,
मैंने माँ को देखा है ,
पर..... माँ को नहीं देखा है,
कभी किसी चिड़िया  की तरह उड़ते हुए ,
खुद के लिए लड़ते हुए , 
बेफिक्री से हँसते हुए ,
अपने लिए जीते हुए, 
अपनी बात करते हुए ,
मैंने माँ को कभी नहीं देखा ,

मैंने बस माँ को माँ होते देखा है ,

तुम्हारा --अनंत 
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