बुधवार, मई 17, 2017

पैसिव स्मोकिंग..!!

मैं सिगरेट नहीं था
और सिगरेट की राख भी नहीं था
मैं सिगरेट का फ़िल्टर भी नहीं था
और ना उससे उठने वाला धुवां ही था

मैं वो उंगलियां भी नहीं था
जिसमे फंसी रहती है सिगरेट
और ना वो होंठ ही
जिसमे धरी रहती है सिगरेट
मैं वो जिगर तो कतई नहीं था
जहाँ जाता है सिगरेट का धुंआ
और कुछ देर रहने के बाद
अपना एक हिस्सा छोड़ कर बाहर निकल आता है

मैं तुम्हारी वो सांस था
जो सिगरेट के धुएं को भीतर खींचती है
और कुछ देर धुएं के साथ जिगर में बैठती है
और बाहर आती है एक अजनबी चहरे के साथ

तुम वो हवा नहीं थे
जिसमे घुलता है धुंआ

तुम वो हाँथ थे
जो नाक के सामने वाइपर की तरह चलता है
पर साँसों का धुंधलका
वाइपर से कहाँ धुलता है

तुम्हारे लाख ना चाहने के  बाद भी
मैं तुम्हारी साँसों में घुल जाता था
तुम्हारे जिगर के किसी कोने में बैठकर
अँधेरे की ताल पर
उजाले के गीत गाता था

और जब तुम मेरा नाम पूछते थे
मैं अपना नाम "पैसिव स्मोकिंग" बताता था

मैं एक सांस से दूसरी सांस तक जाता था
और इसी रास्ते पर चलते हुए
कविता बनाता था

तुम्हारा-अनंत  

मेरे "मैं" की कविता..!!

मेरी नींद में जागता सपना
सपना नहीं है
वो मेरा "मैं" है

मैं उसी के लिए जीता हूँ
मैं उसी को लिए जीता हूँ

इसीलिए यथार्थ के आईने में भी
मैं जागते सपने सा दीखता हूँ

मैं तुम्हारी जागती आँखों से
नींद का काजल चुराता हूँ
और इसी से
मैं मेरे  "मैं" की कविता बनाता हूँ

तुम्हारा-अनंत 

मंगलवार, मई 16, 2017

कविता की सलीब...!!

तुमने नहीं महसूसा कभी 
नदी, नदी में कैसे बहती है 
ऊंचाई, ऊंचाई से कैसे गिरती है 
बारिश खुद की बूंदों से कैसे भीग जाती है 
तन्हाई कितनी तनहा होती है 
हँसी के खोखलेपन में 
कहीं कोई  फूट कर रोता है 
खालीपन में भी एक खालीपन होता है 
भाषा भी कहना चाहती है कुछ 
पर उसके पास भाषा ही नहीं है 
तुम्हारे क़दमों के निशान भी चलना चाहते हैं, तुम्हारे साथ 
और सांस भी सांस लेना चाहती है 
तुमने नहीं महसूसा कभी 

तुमने नहीं महसूसा कभी 
कद्दूकस पर घिसी जा रही सब्जियों का दर्द 
तुमने नहीं महसूसा कभी 
क़त्ल करने से पहले ख़ज़र का रोना 
तुमने नहीं महसूसा कभी 
होने और नहीं होने के बीच तड़प कर मरते हैं 
दुनिया के अधिकांश लोग 

अच्छा किया जो तुमने नहीं महसूसा कभी 
जो महसूसा होता ये सब 
कविता की सलीब पीठ पर ढो रहे होते, तुम !
दो शब्दों के बीच बैठे कहीं रो रहे होते, तुम !!

तुम्हारा-अनंत  

नींव से नींद तक...!!

तुम पूरे चाँद की तरह हो
मैं आधी रात की तरह हूँ
तुम पूरे उपन्यास की तरह हो
मैं अधूरी बात की तरह हूँ

आधी रात में उभरता है, पूरा चाँद
एक अधूरी बात पर टिका होता है
पूरा उपन्यास

क्या ये बात मेरे लिए  कम है
कि तुम मेरी नींव में हो
और मैं तुम्हारी नींदों में !!

तुम्हारा-अनंत  

सोमवार, मई 15, 2017

यही मेरी कविता है....!!

बिना होठों से लगाए नहीं सुलगती है सिगरेट
बिना सीने से लगाए नहीं महकता है दुःख
बिना खुद को मिटाए, कवि नहीं लिखता है कविता
बिना खोये नहीं मिलता है खुद का पता

इसलिए मेरे होठों पर सिगरेट
सीने में दुःख
और दिमाग में खोया हुआ पता है
यही मेरी कविता है !!

तुम्हारा-अनंत 

कविता की तरह..!!

तुम अपने हर एक कदम में जितनी जमीन दबाती हो
मेरा कुल वजूद उतना ही है
इसलिए तुम चला मत करो
उड़ा करो
कविता की तरह

तुम्हारा-अनंत 

सपना, भूख और चुम्बन.....!!

मेरे शब्द भी झूठे हैं
और मेरा मौन भी झूठा है
सच मेरे मौन  और शब्द के बीच का हिस्सा है
जो तुम उसे पढ़ सको तो पढ़ो
जो तुम  सुन सको तो सुनों

मैं यहाँ खुद के साथ हूँ
मैं वहाँ तुम्हारे हूँ
ये दोनों बातें ग़लत हैं
मैं यहाँ-वहाँ के बीच कहीं हूँ
जो तुम मिल सको तो मिलो

मैं फंसा हुआ हूँ बीच में
ठीक वैसे, जैसे
आँख और पलक की बीच सपना
पेट और पीठ के बीच भूख
और, होंठ और होंठ के बीच
चुम्बन !!

तुम्हारा-अनंत

ये क्या है ?

वो गीत सबसे खूबसूरत है
जो तुमने तन्हाई में सिर्फ और सिर्फ अपने लिए गया था
वो भी उसकी याद में
जिसकी तन्हाइयों में भी एक भीड़ रहा करती है
और उस भीड़ में एक भी चेहरा तुमसे नहीं मिलता

वो मौन सबसे खूबसूरत होता है
जो तुम्हारे दो शब्दों के बीच होता है
और बुबुदाता है, उसका नाम
जिसके शोर में भी
तुम्हारी एक भी ध्वनि नहीं है

सबसे खूबसूरत वो इंसान है
जिसने तुम्हारे आत्मा के धब्बे देखे हों
और तुमसे पूछा हो
ये क्या है ?

तुम्हारा - अनंत

पुल..!!

मैं एक ऐसी कविता लिखना चाहता हूँ 
जो इस पार, उस पार का फर्क मिटा दे 
वो चौंक कर उसे कहे "पुल"
और मैं हँसते हुए कहूं 
"भक्क पागल"

तुम्हारा-अनंत

शनिवार, मई 13, 2017

इस अधूरे को बचाना खुद को बचाना है..!!

सबसे उलझाऊ याद ढाई याद है। एक तुमसे मिलने की, एक बिछड़ने की और आधी तुम्हारे साथ होने की। सबसे गहरा शब्द ढाई अक्षर का शब्द है। एक अक्षर तुम्हारा, एक अक्षर मेरा और आधा हम दोनों का। सबसे ख़तरनाक़ चाल ढाई घर जलाने वाली चाल है। एक जलता हुआ घर मेरा, एक तुम्हारा और आधा हमारे सपनों का। सबसे बड़ी ज़िन्दगी ढाई दिन की ज़िन्दगी है। एक दिन तुम्हारे प्यार में, एक दिन तुम्हारे इंतज़ार में और आधा इंतज़ार के प्यार में। सबसे बड़ी कविता ढाई पंक्ति की कविता है। एक पंक्ति, हमने जो जिया उसके लिए, एक पंक्ति में जो हम नहीं जी सके उसके लिए और आधी हम जो जीना चाहते थे उसके लिए। सबसे बड़ी बात ढाई बात है। एक जो मैंने तुमसे कही, एक जो तुमने मुझसे कही और आधी जो हम एक-दूसरे से नहीं कह सके।

ये जो आधा है। वही पूरा है। और जो पूरा है वही आधा है। इसलिए हम जो पूरे हो चुके, चुक चुके लोग है। हम अभी बाकी है। इसीलिए बाकी है जीवन भी। इस अधूरे को बचाना खुद को बचाना है। जीवन जीने की वजह को बचाना है।

तुम्हारा-अनंत

शनिवार, अप्रैल 08, 2017

यादख़ोर आदमी ..!!

मैं "उसे" एक लम्बे उपन्यास की तरह जीना चाहता था। पर वो मेरे भीतर एक लघु कथा की तरह रह गयी। ठीक वैसे ही जैसे कई और अलग अलग रंगों की अलग अलग नामों वाली लघु कथाएं मेरे दिल में यहाँ-वहाँ  बिखरी हुई हैं। सोचता हूँ, किसी दिन इन लघु कथाओं को करीने से लगा दूँ। सोचता हूँ, किसी दिन मैं अपने दिल के खंडहर को भी सजा लूँ। सोचता हूँ, किसी दिन यादों की ताल पर खुद को गा लूँ।  

रश्मि आ गयी और मैंने डायरी बंद करके, दराज़ में डाल कर ताला लगा दिया। मैं चाहता था कि मेरे मरने के बाद ही उसे जीवन बीमा, इस डायरी और "उसके" नाम के बारे में पता चले। उससे पहले मैं रोज़ डायरी लिखना चाहता था और रश्मि के आने से पहले उसे छुपा देना चाहता था। जैसे कोई अपराधी अपना अपराध छिपता है। जैसे कोई कपटी अपने मन का मैल। जैसे कोई डरा हुआ आदमी अपना डर। जैसे कोई यादख़ोर अपनी यादें।

तुम्हारा-अनंत    

शुक्रवार, अप्रैल 07, 2017

इसका नाम कन्हैया से बदल कर नरेंदर रख दो..!!

दयाशंकर जी बड़े देशभक्त किस्म के इंसान हैं। तन समर्पित, मन समर्पित, जीवन का क्षण-क्षण समर्पित टाइप देश भक्त। और जितने देशभक्त उतने सफाई प्रेमी भी। भारत माता की जय बोलते समय। सीना छपन हो जाता है। पहले छत्तीस होता था। इधर बीते कुछ सालों से छप्पन होने लगा है। कारण का पता लगाने के लिए मोहल्ले के वैज्ञानिक लोग रोज शाम को चार से छ : बजे तक शोध करते हैं। रिपोर्ट बन गयी है। जल्द ही सब्मिट करेंगे। 

खैर दयाशंकर जी इलाहबाद ऑर्डिनेंस डिपोट में हैं। इसलिए दफ्तर में ज्यादा काम होता नहीं है। कुर्सी  में बैठ जाते हैं और राम कथा बांचते रहते हैं। राम जी के वनवास का प्रकरण तो ऐसा सुनते हैं कि जान निकल जाए। लोग रोने लगते हैं। और बाद में दयाशंकर जी हँस-हँस के अपने इस हुनर का बखान करते हैं। कहते हैं, वक्ता ऐसा हो, जो रुला दे।  हंसा तो जोकर भी देता है। 

वो राम के अलावा राष्ट्र पर भी बेहद बढ़िया बोलते है। जब वो राष्ट्र  के बारे में बोलते हैं। तो लोगों की नसें तन जातीं हैं। लोग दौड़ कर बलिदान हो जाना चाहते हैं। अपने नाम के आगे शहीद ऐसे देखना चाहते हैं जैसे श्री लिखा हो। दो मिनट में कश्मीर से कन्या कुमारी तक का मामला सुलझा-सुलटा देते हैं दयाशंकर जी।  

तीसरा प्रेम उन्हें गाय से है। कई बार गाय के पैर छूने के चक्कर में दुलत्ती खा चुके हैं। गाय के बारे में  अपार ज्ञान है। उसकी उपयोगिता पर व्याख्यान के लिए लोग इन्हें दूर दूर से बुलाते हैं। और ये पैसे ले के जाते हैं। तो कुल मिला के, बेहद चकमदार व्यक्तित्व है दयाशंकर जी का। वक्ता, विद्वान्, देशभक्त और दार्शनिक सब साथ में। कम्प्लीट पैकेज हैं दयाशंकर जी।  

दराशंकर जी पांच बजे दफ्तर से घर आ जाते हैं। आधा घंटा चाय-वाय पी कर, साफ़ सफाई में लग जाते हैं। घर के चबूतरे और दुवारे झाड़ू लगाते हैं। घर के सामने की नाली खुद साफ़ करते हैं। और जो कूड़ा निकलता है उसे आँख बचा कर कभी शुक्ला जी के घर के सामने, कभी शर्मा जी के घर के सामने डाल देते हैं। मौका नहीं लगा तो तिवारी जी के प्लाट पर दो कदम बढ़ कर डाल दिया। सुबह जो उनके प्रवचन में अखंड भारत अफगानिस्तान तक हिलोरे मरता है वो पांच बजे के बाद अपने घर के दुआरे तक सीमित हो जाता है। उनके घर का दुवारा अखंड भारत होता है। और उसे स्वच्छ रखना उनका परम कर्त्तव्य।  पांच से आठ बजे के बीच अगर गाय दिख जाती है तो कोहनी से उसे मारते हैं। क्योंकि इस बीच गाय के  गोबर से भिन्नाए  रहते हैं। उनका चबूतरा रोज गन्दा कर देती है। 'आवारा गाय" कहींकी। लोग दूध दूह लेते हैं और हगने के लिए छोड़ देते हैं दयाशंकर दुबे के दुवारे। मरेंगे हग मारोगी ससुरी" जब भिन्नाते  हुए बोल के मारते हैं। गाय दुम उठा कर भागती है। 

रात आठ बजे तक सुपरमैन अवतार में रहते हैं दयाशंकर जी। आठ बजे नहाते हैं। गौग्रास लेकर फिर बाहर निकलते हैं। गाय माता को ढूंढ कर खिलाते  हैं। करीने से पैर छू कर आशीर्वाद लेते हैं और फिर कहीं खाना खाते हैं।  साढ़े आठ से नौ-साढ़े नौ तक कन्हैया को देशप्रेम और व्यक्तित्व विकास पर प्रवचन देते हैं। कन्हैया दस साल का उनका पोता है।  पिछले कुछ दिनों से वो उनके लिए परेशानी और दुःख का कारण बना हुआ है। वो टीवी पर हमें चाहिए आज़ादी वाले नारे उसे बहुत पसंद आ गए हैं। सुबह-शाम दौड़ दौड़ के वही रटता रहता है। दयाशंकर जी का दिल दरक जाता है। दिमाग दहक जाता है। पर क्या करें ? बच्चा है। पोता है। 

कल वो उसे राष्ट्र, भारत माता और गाय माता के बारे में बता रहे थे कि उसने दो तीन सवाल दनादन पूछ लिया। बाबा हमारा देश आदमी है या औरत ? बाबा गुस्सा गए,  क्या मतलब ? बच्चे  ने पूछा, हम इसे भारत माता कहते हैं। तो ये हमारा देश नहीं, हमारी देश होना चाहिए। वो डांटते हुए बोले, क्या ? बच्चे ने कहा, हाँ। बताइये। दयाशंकर जी चुप रहे। फिर बच्चे ने पूछा, बाबा आप गाय को माता कहते हैं  तो उन्हें मारते क्यों हैं ? गाली क्यों देते हैं ? ये सवाल सुन के दयाशंकर जी पूरी तरह भिन्ना गए।  बच्चे ने आगे एक दो सवाल और पूछे पर उन्हें कुछ सुनाई नहीं दिया। उनके कानों में बस हमें चाहिए आज़ादी, सच बोलन की आज़ादी, पढ़न-लिखन की आजादी, आज़ादी आज़ादी.......!! नारे गूंजते रहे। उन्होंने अपने बेटे अमित को आवाज़ लगाई।  अमित-अमित !! ये लौंडा बर्बाद हो रहा है। देशद्रोही हो  जायेगा ये। इसका नाम तुरंत बदलो। तुम इसका नाम कन्हैया से बदल कर नरेंदर रख दो। अबतो बस यही एक चारा है !! दयाशंकर जी बोले। और आँख बंद करके गुस्सा शांत करने लगे। 

तुम्हारा-अनंत   

वो थी रेखा..!!

वो बहुत दिन बाद मिली थी।  शादी के बाद पहली बार, ढाई साल हो गए थे, उसकी शादी को। नहीं-नहीं, तीन साल हुए थे। चौक में रहीम चाचा वाले मोड़ पर मिली थी।  मैं और रेखा बचपन के दोस्त थे। लोग रेखा-रुकसाना बहन-बहन हैं, कहते थे। और हमें लगता भी ऐसा ही था। पर जैसे जैसे हम बड़े होने लगे।  हमें लगने लगा कि जो हमें लगता था, गलत था । मेरे घर वाले मुझे डाँटते थे कि "रेखा के घर मत जाया कर" और रेखा के घर वाले रेखा को। उन्हें डर था कि मैं हिन्दू और वो मुस्लमान लड़के से इश्क़ न कर बैठें। वो इसे अपनी ज़बान में फंसना, टांगना, पटना जैसा कुछ कहते थे। सो हमारे घर वालों को डर था कि हम कहीं गैर मजहब के लड़कों से न फंस जाएँ, टंग जाएँ, पट जाएँ। इसलिए हमारा मिलना जुलना बेहद कम हो गया था। पर दिलों में हम एक दूसरे से मिले हुए थे। हमने अपना दीन, अपना नाम, अपने माँ बाप, रिश्ते-नाते खुद नहीं चुने थे पर हमने एक दूसरे को अपना दोस्त खुद चुना था। इसलिए हमें अपने रिश्ते से मोहब्बत थी।

रेखा को सीधी रेखा पर चलना पसंद नहीं था। इसलिए वो कुछ न कुछ अड़ा-तिरछा कर ही देती थी। हमें जिस तरह हिन्दू मुस्लमान लड़कों से दूर रहने को कहा गया था। हमारे मन में उनको जानने की एक अनकही सी आरजू रहा करती थी। पर हम डरते थे। इसलिए जैसा घर वाले कहते थे, वैसा ही करते थे। पर रेखा को सीधी रेखा पर चलना पसंद नहीं था, इसलिए वो वसीम भाई से प्यार करने लगी थी। ये बात उसने मुझे कभी नहीं बताई जैसे मैंने उसे कभी नहीं बताया कि मैं राहुल को चाहने लगी थी। राहुल कालेज की क्रिकेट टीम का कैप्टन था और वसीम भाई कालेज के महबूब शायर, पूरे कालेज की लड़कियां उनपर मरतीं थीं पर वो रेखा पर मरते थे. रेखा का हुस्न उनकी ग़ज़लों से बढ़ता जा रहा था और उनकी गज़लें रेखा के हुस्न से हसीन होतीं जा रहीं थीं । ये बात पहले कालेज की दीवारों के कानों में गयीं फिर रेखा के घर वालों के और फिर रेखा का कालेज आना अचानक बंद। बंद मेरा भी हो गया।  दंगों के बाद से।

दंगों में सूअर और गाय के मांस की हवा उडी। लोग रुई की तरह उड़ने लगे और जब गिरे तो लाश बन चुके थे। भीड़ लोगों की घरों  में घुसी  और घर को मकतल बना कर निकल आयी। दंगों में न हिन्दू मरे, न मुसलमान, मरे तो बस इंसान।  जो हिन्दू, मुस्लमान थे। वो चुनाव लड़े। जीते और एक मंच पर नैतिकता और शिष्टाचार के नाम पर गले मिले, मालाएं पहनी।  वसीम भाई भी उसी दंगों में मारे गए, उन्हें लगता था। वो शायर हैं तो दंगे रोक लेंगे। अपने कुछ दोस्तों के साथ चौराहे  पर कौमी  एकता पर तक़रीर कर रहे थे। और लव जिहाद के नाम पर उनसे आपसी रंजिस निकाल ली गयीं । वसीम भाई, गांधी के देश में गांधी की तरह मार दिए गए।  

उसके बाद मेरा निकाह  हुआ और रेखा की शादी हुई। और लगभग तीन साल बाद चौक में रहीम चाचा वाले मोड़ पर हमारी मुलाकात। मैंने पूछा, कैसी हो रेखा ? अच्छी हूँ, जवाब आया। ये क्या हाल बना रखा है ? तुम हो बुढ़िया लगने लगी हो! वो मुस्कुराई। और कहने लगी "किसी ने मुझे बताया था मैं बेहदहसीन हूँ, मैंने मान लिया था।  आज तुम कह रही हो, मैं बदसूरत हो गयी हूँ, बुढ़िया की तरह लगती हूँ, मैं ये भी मान लेतीं  हूँ" मैं क्या बोलूं, ये सोच ही रही थी कि रिक्शा वाला आया और वो उसमे बैठ कर हाँथ हिलाते हुए निकल गयी।  उस समय मुझे लगा, उस दिन दंगे में वसीम भाई के साथ कोई और भी मारा था।  वो थी रेखा। 

तुम्हारा-अनंत              . 

कौन बेवफा था ? क्या मजबूरियां थीं ?

उसने कहा,"मैं उसे भूल जाऊं"
मैं अपना नाम भूलने लगा और अपना पता भी। उसके जाने के बाद, मैं इधर उधर पागलों की तरह भटकता और लोग कहते, "अभी तक तो सही था नजाने क्या हो गया ?" मैं उन्हें देखता, कभी तेजी से हँसता, कभी रोता, कभी मुस्कुरा देता" मैंने एक पल में ही भविष्य में झाँक कर ये सब देख लिया। और लगभग पत्थर की तरह खड़ा रहा।

वो मेरे हांथो को अपने हांथो में लिए आसमान के उस पार देख रही थी। वो आसमान के उस पार भी देख सकती थी और मेरी आँखों के उस पार भी। इसलिए मुझे उसकी आँखों से प्यार हुआ था।

मैंने कहा, क्या तुम मुझे भूल गयी हो ?
उसने कहा, हाँ।
ये कैसे हो सकता है? तुमने कहा था मैं तुम्हारी धड़कनो में धड़कता हूँ,'लगभग चीखते हुए मैंने कहा'
मुझे सब याद है, ,'लगभग रोते उसने कहा'
कुछ देर हम दोनों चुप रहे। जैसे कोई बच्चा सहम कर शांत हो जाता है।
फिर मैंने बुबुदते हुए कहा, कह दो तुम झूठ बोल रही हो।
उसने कहा, कुछ झूठ इसलिए बोले जाते हैं कि सच पता चल जाए।
मैंने कहा, सच क्या है?
उसने कहा, हम कभी एक नहीं हो सकते।
तो झूठ क्या है? मैंने कहा।
मैं तुमको भूल गयी हूँ, उसने कहा।

उसके बाद हम उठे और वहां से अपने घरों की तरफ फिर कभी न मिलने के लिए चल दिए। बाग़ के पेड़ पौधे अगर सोच सकते होंगे तो यही सोच रहें होंगे। कौन बेवफा था ? क्या मजबूरियां थीं ?

तुम्हारा-अनंत

मंगलवार, अप्रैल 04, 2017

बोलो, मुंह तो थोड़ा खोलो..!!

बोलो, मुंह तो थोड़ा खोलो
बन के काल के जैसे डोलो
हवा बानी थीं तुम तो बहुत दिन
थोड़ा सा तूफ़ान भी होलो
देखें बदलाव को, वो कैसे रोकते हैं-2

सिर के पल्लू को परचम कर लो
अपने ज़ख्मों को मरहम कर लो
खुद को उनके बरहम कर लो
कफ़स तोड़ के अब तुम दम लो
देखें जलती आग में वो क्या झोंकते हैं-2

उठ मेरी जाँ साथ है चलना
तुम सूरज सा अब न ढालना
दर्द के पर्वत को है गलना
दहलीज़ों के पार निकलना
देखें बढ़ते कारवां को कैसे रोकते हैं-2

चूड़ियां, कंगन, बिछिया, नथिया
छेनी, खुरपी, हथौड़ा, हंसिया
बोले ज़ोर लगा के हैय्या
चलना साथ में बहिनी- भइया
मिलके सारी जंज़ीरों को अब तोड़ते हैं-2

अब न आप, न बाप से डरना
न पुण्य, न पाप से डरना
न आशीष, न शाप से डरना
न शुचिता के जाप से डरना
देखें नया फ़तवा वो क्या ठोकते हैं-2

तुम्हारा-अनंत

कफ़स-पिंजरा
नोट-"आप" को समाज के प्रतीक और "बाप"को पितृसत्ता के प्रतीक के लिए लिया गया है

सोमवार, अप्रैल 03, 2017

बाबू जी नहीं रहे..!!

-तुम आज तक कोई गिफ्ट नहीं दिए हमें !!
वो चुप था
-कोई ऐसे भी बॉयफ्रेंड बनता है क्या ?
वो फिर भी चुप रहा
- रोमांस कैसे किया जाता है, मालूम ही नहीं तुम्हे
वो फिर चुप रहा
-अब चुप ही रहोगे कि कुछ बोलेगे भी ?
वो फिर चुप रहा
-मेरी सहेलियां सही कहतीं थीं।
क्या कहतीं थीं? उसने पूछा ।
- यही कि तुमसे न हो पायेगा। अब मैं चलती हूँ। तुम बहुत बोर करते हो।
वो वहां से चली गयी और वो वहीँ बैठे-बैठे घर से आयी छोटे भाई की चिट्ठी पढता रहा। जिसमे लिखा था।

बाबू जी नहीं रहे। पिछले बरसात में उनके पैर में फरुहा लग गया था। जिसका इलाज नहीं करा सके और कैंसर बन गया। बाबू जब मरें तो आपका परीक्षा चल रहा था इसलिए हम नहीं बताये आपको। बाबू जी ही कहे थे आपको परेशान ना करें। पढ़ाई ख़राब होगा। हम यहाँ संभाले हुए हैं। चार बीघा और अधिया ले लिए हैं। इस बार कलेक्टर हो जाइएगा न भैया ? पैसा का कौनो दिक्कत हो तो बताइयेगा।
आपका
छोटुवा

वो वहां से उठा और मुनिरका अपने कमरे के लिए निकल गया।
रास्ते भर सोचता रहा पर क्या, पता नहीं !!
तुम्हारा- अनंत

गुरुवार, मार्च 30, 2017

ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है..!!

मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

एक मुट्ठी है, गहरी भारी, जिसमे कैद आज़ादी है
एक ज़ंज़ीर है, जिसमे जकड़ी भारत की आधी आबादी है
बिस्तर के भूगोल के बाहर भी दर्द का एक इतिहास मचलता है
वो देखो चुप्पी वाला सूरज धीरे धीरे ढलता है
वो दिन भी आ जायेगा जब रातो-दिन एक बराबर हों
जो अबतक राही बनीं रहीं, वो भी कभी तो रहबर हों
जो अक्सर उनके ही हिस्से में आयी
ये कैसी फूटी-फाटी किस्मत है
मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

वो हयात मांग रही है और तुम हया थामते फिरते हो
बात असल ये है कि तुम उसकी आवाज़ से बेहद डरते हो
कभी सुरक्षा, कभी प्यार, कभी दुलार दिखाते हो
नाम बदल-बदल कर तुम कितनी शाजिश करते हो
जिसने तुमको जना है प्यारे
वो तुमको मना भी कर सकती है
जिन आँखों में प्यार है प्यारे
उनमे अंगार भी भर सकती है
लोक-लाज के इस अज़ाब आडम्बर को
उसमे उलटा-पुलटा करने की भी जुर्रत है
मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

वो सर के पल्लू को अपने हांथो का परचम कर सकती है
वो अपनी आवाज़ को अपने दर्द का मरहम कर सकती है
तुम लाख करो उसको पीछे, वो खुद को तुम्हारे बरहम कर सकती है
ज़ख्म से झरते लहू को गंगा, आँख से गिरते अश्कों को ज़मज़म कर सकती है
पर उसने तुमको मोहलत दी है, कुछ टूटे न सबकुछ बच जाए
ख्वाबो और ख्यालों की दुनिया आँखों में रच जाए
ये जो प्यार से हो पाए तो बेहतर
वार्ना उसमे लड़ने और झगड़ने की भी हिम्मत है
मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

हांथो की महेंदी, आँखों का अंगार बने, इससे पहले तुम जागो
चूड़ियां, कंगन, बिंदिया, नथिया, हथियार बने इससे पहले तुम जागो
जो हथेली हाँथ मिलाने को है खुली हुई, वो मुट्ठी बन जाए, इससे पहले तुम जागो
इस दुनिया में एक लड़ाई आज़ादी वाली ठन जाए इससे पहले तुम जागो
तुम जागो क्योंकि नींद से जागना ही सबसे बेहतर है
हम सभी बराबर है प्यारे, न कोई किसी से कमतर है
बेखबरी की नींद हम सो लिए बहुत
अब नींद से जागना ही सबसे बेहतर है
मर्द बड़ा है, छोटी औरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है
चुप्पी से प्यार, बोल से नफरत, ये कैसी फितरत है, कैसी फितरत है

तुम्हारा- अनंत