शनिवार, अप्रैल 30, 2011

ढाई आखर की नदी


हम -हम नहीं रहे ,वो -वो नहीं रहे, कल रात हमारी मुलाकात थी ,
रातें तो कई देखीं थी हमने ,पर कल रात कुछ अलग रात थी 
ढाई आखर की एक खाई है ,
तुम्हारे और मेरे बीच,
जो गहरी है इतनी,
कि जितना गहरा प्यार होता है ,

मैं अपना प्यार भर चुका हूँ  इसमें ,
तुम भी अपना प्यार भर दो न , 

फिर ये ढाई आखर की खाई ,
ढाई आखर की नदी हो जाएगी ,
और हम बह जायेंगे कुछ पलों के लिए , 

ये पल सृजन के होंगे , 

तुम्हारा --अनंत 

4 टिप्‍पणियां:

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

गहरी खाई को प्रवाहमय नदी बनाने वाली मनोरम प्रस्तुति...

टोपी पहनाने की कला...

गर भला किसी का कर ना सको तो...

बेनामी ने कहा…

bahut achche anant ji bahut achcha likh rahe hain aap

बेनामी ने कहा…

man khus kar diya aapne sach me aise rupk aur aisa prayog anutha hai

sandip!!singh ने कहा…

good dud keep it on