शनिवार, अप्रैल 30, 2011

ढाई आखर की नदी


हम -हम नहीं रहे ,वो -वो नहीं रहे, कल रात हमारी मुलाकात थी ,
रातें तो कई देखीं थी हमने ,पर कल रात कुछ अलग रात थी 
ढाई आखर की एक खाई है ,
तुम्हारे और मेरे बीच,
जो गहरी है इतनी,
कि जितना गहरा प्यार होता है ,

मैं अपना प्यार भर चुका हूँ  इसमें ,
तुम भी अपना प्यार भर दो न , 

फिर ये ढाई आखर की खाई ,
ढाई आखर की नदी हो जाएगी ,
और हम बह जायेंगे कुछ पलों के लिए , 

ये पल सृजन के होंगे , 

तुम्हारा --अनंत 
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