रविवार, अप्रैल 24, 2011

दर्शन का बम

आज का गाँधी ,आज की तैयारी ......(सभार - आशुतोष )
राजपथ पर एक बूढ़ा खड़ा था ,
पीठ लादे एक भारी पोटली ,
तन पर थे जो भी कपड़े ,
फटे-चिटे थे ,
काँपता आनन था ,
हिय डोलता था ,
रह-रह कर,
 हे राम ! हे राम ! बोलता था ,
सनसनाती कार ,मोटर , गाड़ियाँ थी ,
चमचमाती बिल्डिंगों की क्यारियाँ थी ,
ध्यान कौन देता उस भिखारी पर ,
हर आदमी आसीन था सवारी पर ,
मैं पास पहुंचा ,
पूछा की बाबा कौन हो ?
कुछ बोलते क्यों नहीं ?
क्यों मौन हो ?
क्यों हताश हो ?
 क्यों घबराए हुए हो ?
ये बताओ तुम कहाँ से आये हुए हो ?
उस बाबा ने चुप्पी तोड़ कर मुँह खोला ,
वेदना को स्वर दिए ,और हँस के बोला ,
मूर्तियों और नोटों में कैद तुमने कर दिया है ,
अभिशाप दे कर ,ये कैसा वर दिया है ,
जिनके खातिर मैं लड़ा था ,सूली चढ़ा  था,
वो आज भी वहीँ खड़ा है ,जहाँ कल खड़ा था ,
इस विकास  की अंधी दौड़ में हिन्दुस्तान पीछे छुट रहा है ,
चन्द अमीरों  के हांथों में हिंद का दम घुट रहा है ,
संसद में जा कर सब A.C. लगा कर सो गए हैं ,
अजब सन्नाटा है निजाम में ,बहरे सभी सब हो गए हैं ,
एक बिगडैल बेटे की मुझे जो याद आई ,
मैंने बम भरी पोटली काँधे पर उठाई ,
फोड़ा था जैसे बम  अस्सेम्ब्ली में उस  भगत सिंह ने ,
वैसे ही मैं संसद में फोड़ने जा रहा हूँ ,

गाँधी है नाम मेरा ,
मैं राजघाट से आ रहा हूँ ,

तुम्हारा --अनंत 

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