शुक्रवार, अप्रैल 29, 2011

खाई है सूखी रोटी ,

सूखी रोटी भी नसीब नहीं, कहते हैं की कहूँ, खीर खाई है 
मैं रचना गूढ़ लिखूं ,गम्भीर लिखूं ,
मैं दिल की उभरी पीर लिखूं ,
खाई है ,सूखी रोटी ,
तो  फिर  कैसे पूरी-खीर लिखूं ,

मैं घावों की गहरी टीस लिखूं ,
डॉक्टर की महँगी फीस लिखूं ,
माँ-बाप की बिमारी लिखूं ,
तंग जेबों की लाचारी लिखूं ,
है जो कातिल मैं जान रहा ,
फिर कैसे उसे फ़कीर लिखूं ,
खाई है सूखी रोटी ,
तो फिर कैसे पूरी खीर लिखूं  
मैं रचना गूढ़ लिखूं गंभीर लिखूं ,
मैं दिल की उभरी पीर लिखूं ,

हैं हित टंगे हांसिये,पर सब के ,
जो दीन, दमित ,निधन तबके ,
मैं उनकी रोटी की तरसन लिख दूं ,
चीत्कार -रुदन- गर्जन- लिख दू
मैं अंधी और बहरी सरकार का हाल लिखूं ,
मैं अपने दिल का मलाल लिखूं ,
अब मन कहता है ,चीख -चीख ,
खुद के हाथों से खुद की तकदीर लिखूं ,
मैं रचना गूढ़ लिखूं ,गंभीर लिखूं ,
मैं दिल के उभरी पीर लिखूं ,
खाई है सूखी रोटी ,
तो फिर कैसे पूरी खीर लिखूं  ,

तुम्हारा --अनंत 
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