मंगलवार, अप्रैल 05, 2011

बेकसी का सूत

जब सुबह से शाम तक ,
रात की तरह हर बात पर ,
बेकसी का सूत कात कर ,
घर लौटता हूँ ...........
गडा देता हूँ अपनी दोनों कील नुमा आँखें ,
सामने की तकिया नुमा  दिवार पर ,
सच  में ये आँखें भीतर तक घुस जाती हैं ,
और मुझमे मेरे होने को नकार देती है,
 फिर बड़ी  धीरे से चिड़ियों की तरह!
 कहती है ,
                न जाने तुम कौन हो ??.
    तुम कौन हो ??
              पता नहीं ..................
तुम्हारा --अनंत  

4 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरती से लिखे एहसास

kkk ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति ! अध्यातम की तरफ बढ़ते कदम . शुभ कामनाएं .

हरीश सिंह ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति,शुभ कामनाएं .

दीप ने कहा…

बहुत सुन्दर अनंत जी अच्छी कविता लिखा है आप ने
चित्रात्मक रचना
बहुत सुन्दर