शनिवार, अप्रैल 16, 2011

दो मुल्क हैं , एक मुल्क में ,


दो मुल्क हैं ,
एक मुल्क में ,
एक की गलियाँ गुलज़ार हैं ,
फिजाओं में बहार हैं ,
हँसते हुए लब ,चमकते हुए रुखसार हैं ,
बलंद इमारतें ,कंक्रीट के जंगल हैं ,
मोटर, कार -कारखाने, बंगले, होटल हैं, 
ये मुल्क जितना खाता  नहीं ,
उससे ज्यादा फेंक देता है , 
इसके पथरीले दस्त में है ज़ोर-ए-ज़र,
यहाँ हँसती हुई शब है ,खिलखिलाती है सहर ,

उधर एक जो  दूसरा मुल्क है ,
उसकी गलियाँ बेज़ार है ,
ज़ख़्म है मुफलिसी के ,
जिगर बेतहासा फ़िगार है ,
रुखसार पर अश्कों  के गहरे निशान है ,
छत नहीं है सर  के ऊपर ,बेफज़ीली माकन है,
पहला वाला मुल्क इंडिया है ,
दूसरा मुल्क हिंदुस्तान है ,

तुम्हारा -अनंत 
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