गुरुवार, नवंबर 11, 2010

मै बिलकुल ही टूट गया था

मै बिलकुल ही टूट गया था
शब्द विफल थे,भाव निशब्द थे ,
स्वप्न मेरे सब स्तब्ध थे ,
मै किससे कहता बात ह्रदय की ,जब साथी मेरा रूठ गया था ,
मैं बिलकुल ही टूट गया था ,
कुछ पा कर मैंने खोया था ,
मैं उस दिन सारी रात रोया था ,
वक़्त के एक धक्के से उसका हाँथ, मेरे हांथों से छूट गया था ,
मैं बिलकुल ही टूट गया था
मैं प्रेम गली में ठगा खड़ा था,
मेरा टूटा दिल यंहा- वहाँ पड़ा था ,
कोई आपना था जो मुझको, बहला फुसला कर लूट गया था,
मैं बिलकुल ही टूट गया था ,
''तुम्हारा --अनंत''
एक टिप्पणी भेजें