शुक्रवार, सितंबर 12, 2014

तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ?

मौसमों का नाम भी तुमने रखा था
और चाँद को चाँद भी तुमने ही कहा था
सूरज को कोई नाम नहीं दिया तुमने
इसलिए वो आजतक मुँह फुलाए बैठा है

फूलों के कानों में
तुमने न जाने क्या कहा था
कि पगडंडीयां हँसने लगीं थीं

तुमने बारिश की ओर देखा था ऐसे
कि सारी बूँदें सज़दे में आ गयीं थीं

तुमने हवाओं को छुआ था
कि आयतें महकने लगीं थीं चारो तरफ
और मेरा हाँथ ऐसे पकड़ा था
कि मैं किसी सूफ़ी की मज़ार हो गया था

उस दिन तुम खुदा थीं
और एक दुनिया बना रहीं थी मेरे चारो तरफ

पर अब जबसे तुम गई हो
मुसलसल चलते रहने का मन करता है
यूं लगता है कि ठहरूंगा तो मर जाऊंगा
पर सवाल ये भी है
कि न ठहरूंगा तो कहाँ जाऊंगा ?

तुमने रास्ते गुम किए
मंजिलें साथ ले गयी
फ़कत सफ़र दे गयी मुझको
और एक दुनिया
कि जिसमे मैं गिरफ्तार हूँ
यहाँ अनजान मौसम है
एक अज़नबी चाँद है
और एक खफ़ा सूरज
तंज कसती हुईं पगडंडीयां हैं
और बेहया मुस्कुराते फूल
बारिश है कि मुझपर बरसती ही नहीं
बूँदें सज़दे में हैं और मैं प्यासा हूँ

मैं तुम्हारी इस दुनिया में
इस कैद में
एक दिन तड़प कर मर जाऊंगा
और फिर जब कभी तुम, मेरी मज़ार पर आयोगी
मैं तुमसे पूछुंगा कि
तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ?


तुम्हारा-अनंत 
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