शनिवार, अप्रैल 21, 2012

सवालों के साथ मुठभेड़

रोटी की फिकर,
किसी टूटे हुए नल से,
टपकते हुए पानी की तरह होती है,
जो टप..टप...टप...की जगह,
रोटी...रोटी....रोटी करती है,

रोटी की फिकर वो सवाल है,
जो अध्यापक प्रश्नपत्र में दे तो देता है,
पर उत्तर स्वयं नहीं जानता,
सारी कक्षा के फेल हो जाने के बाद,
अध्यापक  खुद फेल हो जाता है,
और वो सवाल जिंदगी के जलते हुए तावे पर,
सेंक दिए जाते है,
उन्हें भुने हुए गोस्त की तरह पैर-पर-पैर चढ़ा कर,
बड़े किले के पीछे कुर्सी वाले खाते है,

सवाल की रीढ़ की हड्डी का एक सिरा ,
खिखिया कर हँसता है  
एक सिरा रोटिया  कर रोता है,

और एक नहीं कई लाश अपने पीठ पर ढोता है,
उन इंसानों की लाश,
जो आँखों को चौंधिया देने वाली चमक में,
अँधेरी गली के अंधे मोड़ पर,
मारे गए थे,
सवालों के साथ मुठभेड़ में,

जो सवाल बच गए हैं ,
किसी जिन्दा लाश के बगल में,
सर पर हाँथ रखे,
बैठे हुए, डूबे  हैं ,
रोटी की फिकर में,

तुम्हारा--अनंत 

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