शनिवार, अप्रैल 08, 2017

यादख़ोर आदमी ..!!

मैं "उसे" एक लम्बे उपन्यास की तरह जीना चाहता था। पर वो मेरे भीतर एक लघु कथा की तरह रह गयी। ठीक वैसे ही जैसे कई और अलग अलग रंगों की अलग अलग नामों वाली लघु कथाएं मेरे दिल में यहाँ-वहाँ  बिखरी हुई हैं। सोचता हूँ, किसी दिन इन लघु कथाओं को करीने से लगा दूँ। सोचता हूँ, किसी दिन मैं अपने दिल के खंडहर को भी सजा लूँ। सोचता हूँ, किसी दिन यादों की ताल पर खुद को गा लूँ।  

रश्मि आ गयी और मैंने डायरी बंद करके, दराज़ में डाल कर ताला लगा दिया। मैं चाहता था कि मेरे मरने के बाद ही उसे जीवन बीमा, इस डायरी और "उसके" नाम के बारे में पता चले। उससे पहले मैं रोज़ डायरी लिखना चाहता था और रश्मि के आने से पहले उसे छुपा देना चाहता था। जैसे कोई अपराधी अपना अपराध छिपता है। जैसे कोई कपटी अपने मन का मैल। जैसे कोई डरा हुआ आदमी अपना डर। जैसे कोई यादख़ोर अपनी यादें।

तुम्हारा-अनंत    
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