गुरुवार, अगस्त 21, 2014

भाषा के अँधेरे कमरे में...!!

कांटो की कोख से पत्तियां चुरा कर खाने की कला
सिर्फ और सिर्फ बकरियों के पास ही है
इसीलिए काँटों के इस जंगल में वो जिन्दा हैं
तबतक, जबतक किसी को भूख न लगे

जब वो काटीं जाती हैं
तो हिंदी सिनेमा के गाने, देशप्रेम से पाट दिए जाते हैं
और हज़ार चेहरे वाले लोग
गोल गुम्बद के ऊपर मेला सजाते हैं
उनकी आँखों में आंसू
और होंठो पर मुस्कान एक साथ रह सकती है
वो किसी भी समय राष्ट्रगान गा सकते हैं

वो इतने माहिर हैं कि
संविधान उनके सामने
भीड़ में खोये हुए बच्चों की तरह रोता है
और वो भाषा के अँधेरे कमरे में
संविधान का चेहरा चूम कर नीला कर देते हैं

स्कूल जाने वाले बच्चों को
नागरिक शास्त्र की मशीन में झोका जा रहा है
और जब वो बाहर निकलते हैं
तो उनके पाँवों में पहिए जड़े होते हैं
उनके दिमाग में कुछ रंगीन सा हमेशा रेंगता रहता है
वो तेज़ाब को पानी कहते हैं
और आंसूं के चेहरे पर थूक देते हैं
गैर इरादतन ही मारते हैं सैकड़ों तितलियाँ
पक्षियों का पंख उखाड कर हँसते हैं
और जब वो देश का नाम लेते हैं
तो शर्म आती है भूखे लोगों को

उनकी जमीन और सपनों की परिभाषा में
सम्भोग महकता है
जब वो खेलते हैं कोई खेल
तो अश्लीलता हँसती है
और उनकी हथेली पर नाचने लगते हैं, सातों दिन, नंगे ही

चौराहों पर बात करते हुए लोग
अफवाहों को सांस समझ बैठे हैं
अगर अफवाह न हो तो वो खुद को मरा
और देश को उजड़ा हुआ मान बैठेंगे
इसलिए अफवाहों की फैक्ट्री
हर दिमाग में लगाने की परियोजना पर काम तेजी से चल रहा है
हर पढ़ा-लिखा आदमी खुद अफवाह में बदल रहा है

मैं जब उनसे कहता हूँ, भूख
तो वो फसल सुनते है
मैं जब दर्द कहता हूँ
तो वो मुझे देख ही नहीं पाते
मेरे शरीर में भाप और कांच घुलकर बहते हैं
और मैं न चाहते हुए भी पारदर्शी हो जाता हूँ
सब साफ़ दीखता है आरपार
मेरे भीतर का किसी को कुछ नहीं दीखता
जहाँ एक कैंसर दिनरात शतरंज खेलता रहता है

यहाँ जिन लोगों के हांथों में  देश है
उन्होंने इसे आड़ा, तिरछा, सीधा, उल्टा
हर तरह से गाया है
गाँधी उनके लिए गाय हैं
और भगत सिंह भात
उन्हें जब भी मौका मिला
या भूख लगी है
उन्होंने गाय का मांस और भात
खूब चाव से खाया है

थप्पड़ खाए हुए किसी आदमी की सूरत से
टपकते चावल के माढ पर
भिनभिनाती हुई मख्खियों की बोली में
मैंने प्रेम गीत सुना है
पर जब जब दुहराना चाह है उसे
लोगों ने कहा कि
मैं पलायन गीत गा रहा हूँ

मैं उस वक्त खुद को
किसी एक्सप्रेस रेल के जनरल डिब्बे में
टॉयलेट के पास गठरी सा पड़ा पाता हूँ
मेरे हांथों में एक पॉलिथीन होती है
जिसमे बाप की चिंताओं की पूरी
और माँ के आंसुओं का आचार होता है
मैं उसे खाता हूँ
और भिनभिनाती हुई मख्खियों की तरह गाता हूँ

छोटे कस्बों और गांवों का प्यार
चेहरों पर आंसुओं का दाग बन कर रह जाता है
महानगरों और शहरों का प्यार
किसी रात बेडशीट पर बहता है
और फिर लॉन्ड्री में धुल कर
फिर से बिछ जाता है

मैं इन सब के बीच
खुद की और अपनी कविता की पहचान तलाशता रहता हूँ
कभी लगता है, मैं और मेरी कविता
किसी महंगी दवा का अजीब ट्रेडमार हैं
और कभी लगता है
नंगे पैर बहुत दूर से आ रहे किसी आदमी के पैरों की बवाई

तुम्हारा -अनंत

एक टिप्पणी भेजें