बुधवार, जुलाई 24, 2013

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ

एक प्यास का जंगल है
जो पानी के रेगिस्तान पर उग आया है 
फिदाइन मन गुजर रहा है 
ठहरे हुए समय की तरह 

एक रास्ता है 
जो माँ के दुलार से बम की आवाज़ तक फैला हुआ है 
एक और रास्ता है 
जो खुद शुरू हो कर खुद पर खतम हो जाता है  

मैं फलीस्तीन के किसी बच्चे की तरह 
सपनों की अलमारी में 
खिलौने और गुब्बारे रख कर आता हूँ 
पर न जाने वो कैसे 
बन्दूक, बारूद और धुआँ हो जाते हैं 

मुझे अफ़सोस होता है 
जब मुझे मालूम पड़ता है 
कि चेतना भिखारी की जूठन 
वैश्या की नींद 
मुर्दे के शरीर से उतरा हुआ कपड़ा हो चुकी है 
और अब लोगों को उसके नाम से उलटी आती है 

सब डरा हुआ चेहरा लिए हँस रहे है 
उड़ते हुए जहाज़ को देख कर 
भाप हुए जा रहे है

और मैं खून की नदी में 
अपने बाप की लाश पर तैर रहा हूँ 
माँ की चीखों के साज़ पर 
भाई बहनों के आंसूं के गीत गा रहा हूँ 
मुझे साफ़ दिखाई दे रही है 
लाशों के पहाड़ के उस पार 
मेरी वो ज़मीन 
जहाँ मैं बोऊंगा 
अपने बाप के सपने 
आपनी माँ की चीखें 
भाई बहनों के आंसूओं के बीज
और काटूँगा आज़ादी की फसल 

तब सारे प्यास के पेड़ गिरा दिए जायेंगे 
पानी के रेगिस्तानों को जला दिया जायेगा 
और बमों की आवाज़ के मुंह पर 
एक ढीठ बच्चे की हंसी लिख दी जायेगी 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब कैदी परिंदों के पंख तलवार हो जायेंगे 
और परवाज़ क़यामत 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब बच्चों के सपनों की अलमारी में 
बन्दूक, बारूद और धुएं की जगह 
खिलौने और गुबारे होंगे 
जब उनकी नींद में 
तेज़ाब नहीं बरसेगा 

मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ 
जब आजादी लिखने-पढ़ने की चीज़ नहीं 
बल्कि जीने और महसूस करने की चीज़ होगी 

तुम्हारा-अनंत
   

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