शुक्रवार, सितंबर 28, 2012

मैं इंसान हूँ,......ग़ज़ल

ये आँखों का अश्क नहीं पागल,
ये मेरे दिल का दर्द बहता है,
बताते है ये अश्क, कि मैं इंसान हूँ,
वरना कहाँ कोई पत्थर कभी रोता है,
मशीन बना दिया आदमी की भूंख ने उसे,
वो देखो आदमी-आदमी का बोझ ढोता है,
क्यों बेघर है राजगीर, जुलाहा क्यों नंगा है,
आखिर क्यों किसान भूखा पेट सोता है,
हंसता है क्यों ये ऊंचा महल झोपड़ी पर,
आखिर झोपडी का भी अपना कोई वज़ूद होता है,
चल साथ मेरे साथी, हम मिल कर लड़ेंगे,
क्यों बेसबब अश्कों से, अपना दामन भिगोता है,

तुम्हारा- अनन्त 

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