रविवार, फ़रवरी 12, 2012

उभरा हुआ चेहरा...........मुक्तिबोध की याद में

उभरा हुआ चेहरा........
किसी लम्बी कविता की तरह
नंगे पाँव
अँधेरे में
भटकते और बडबडाते हुए
पहाड़ी के उस पार
झील के नीचे
दिवार पर
फूले हुए पलिस्तर पर
झरे हुए रंग से
उभरा हुआ चेहरा
कुछ कहता है
कहता है
पार्टनर तुम्हारी क्या पॉलटिक्स है?
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया?
अभिव्यक्ति के खतरे उठाने पड़ेंगे !
ये खूनी सफेदी के जंगल जलाने पड़ेंगे
(चुप्पी,दब्बूपन,और मौत का रंग  सफ़ेद होता है )  
ब्रम्ह राक्षस की तरह बावड़ी में कैद मत रहो !
बहार निकलो !
मुँह खोलो !
कुछ कहो !

एक बुझी हुई बीड़ी जलाता हूँ फिर से
 धुंए में उड़ जाता है
वो चेहरा
बच जाती है
 वो बुझी  हुई बीड़ी
बुझा हुआ मैं
और बुझी हुई राख

तीनो में से किसी को भी
पढ़ लो !
गढ़ लो !
मढ़ लो !
तीनों के  तीनों
कविता है  

तुम्हारा--अनंत 

  

2 टिप्‍पणियां:

vidya ने कहा…

अदभुद!!!!!!

कविता रावत ने कहा…

अभिव्यक्ति के खतरे उठाने पड़ेंगे !ये खूनी सफेदी के जंगल जलाने पड़ेंगे,
..,sach aaj Muktibodh jaise kahan milenge....
ek sachhe samarpit sipahi ki yaad taji karti sundar rachna ke liye aabhar!