बुधवार, अक्तूबर 12, 2011

लोकतंत्र के सारे तंत्र ढीले हो गए ,


                      लोकतंत्र में लोक कि इज्जत लूट-लाट कर ,ये सब नेता अब छैल-छबीले हो गए 
लोकतंत्र के सारे  तंत्र ढीले हो गए ,
राजनितिक दल नटों के कबीले हो गए ,
टेकते थे जो कल तक अंगूठा सरे आम ,
जीत कर संसद गए, कि रंग-रंगीले हो गए ,
लोक तंत्र के सारे तंत्र ढीले हो गए .........
क्या करें ऑप्शन कोई रीमेन नहीं हैं ,
चुनाव में अबकी कोई क्लीन नेम नहीं हैं ,
हर नेम पर दो चार मुकदमा चढ़ा है ,
कोई चोर,कोई डकैत, कोई आतंकवादी खड़ा है,
कल राजनीति की धरती पर जो वृक्ष लगे थे ,
आज वो सारे वृक्ष जहरीले हो गए ,
लोक तंत्र के सारे तंत्र ढीले हो गए .............
नेता गर ये हैं तो गाँधी और सुभाष क्या थे ,
संघर्षशील और जूझारू गर ये हैं तो भगत और आजाद क्या थे ,
ये A.C में रहने वाले गरीबों का खून पीते हैं ,
लोकतंत्र कि लाश चूस कर ये परजीवी जीते हैं ,
शर्म नहीं आती इनको ये बेशर्मो कि औलादें हैं ,
इनके हिस्से कि शर्म ओढ़ कर वोटर खुद शर्मीले हो गए ,
लोकतंत्र के सारे तंत्र ढीले हो गए ...........
संसद कि हद तोड़- ताड़ कर बन सियार चिल्लाते हैं ,
छीन-छान कर हक जनता का ,ये स्विस बैंक पहुंचाते हैं ,
शान तिरंगे कि धूमिल करके ,उसके नीचे जाम लड़ाते हैं ,
रोटी को जनता रोती हैं ,ये उसके आंसू पर मुस्काते हैं ,
लोकतंत्र में लोक कि इज्जत लूट-लाट कर ,
ये सब नेता अब छैल-छबीले हो गए 
लोकतंत्र के सारे तंत्र ढीले हो गए,
राजनीतिक दल नटों के कबीले हो गए ...........

तुम्हारा --अनंत 


एक टिप्पणी भेजें