बुधवार, मई 04, 2011

मंदिरों-मस्जिद को उसका घर

मेरी हसरतों को बस खार ही  नसीब हुए,
फूलों को किसी और ने चुरा लिया ,
खता किसी और की क्या कहें ''अनंत''
हमने ही आंसुओं को मुकद्दर बना लिया ,
सोया कभी दर्द ओढ़ कर ,
कभी दर्द को बिचौना  बना लिया ,
जिया दर्द को  दिल में साथ ले कर ,
दर्द को हमने हमसफ़र बना लिया ,
लोग डरतें हैं ,हादसों से ,
हमने हादसों से दिल लगाया ,
ये हादसे ही तो थे ,
जिन्होंने हमें  शायर  बना दिया ,
चौक पर पर खड़ी थी शरीफों की ज़मात,
मै गुजरा उधर से आइना ले कर ,
न जाने क्यों वो बेवजह बिगड़े मुझ पर,
शायद मैंने उनको उनकी असलियत दिखा दिया ,
माँगू क्यों दुआ मै किसी पत्थर के सामने ,
किसी पत्थर दिल ने ही पत्थर को खुदा बना दिया ,
रहता था और रहता है, वो इंसानों के दिलों में ही ,
ये तो फिरकापरस्तों ने मंदिरों-मस्जिद को उसका घर बना दिया 
तुम्हारा --अनंत
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