सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

jis path par shool bichhe na ho

जिस पथ पर शूल बिछे न हों ,
उस पथ पर चलना क्या चलना ,
जो काम कठिन न हो प्रियवर ,
उस काम को करना क्या करना ,
जो मरुथल में नदी बहाते हैं,
पर्वत की धूल उड़ाते हैं,
कंटक का मुखडा चूम -चूम ,
कंटक को फूल बनाते हैं , 
कुछ ऐसे वीरों के कंधे पर देश कोई चलता है ,
 रक्त चाट कर महा पुरूषों का समाज कोई बदलता है ,  
जीवन लघु से लघुतर है ,
इसके बीत जाने पर हाँथ का मलना क्या मलना ,
जिस पथ पर शूल बिछे न हों ,
उस पथ पर चलना क्या चलना, 
सूरज उगता है, तम बह जाता है,
जो मन में आता है ,कह जाता है ,
सिन्धु  तीर पर बना स्वप्न महल,
खुद- ब- खुद ढह जाता है ,
जो ह्रदय लगन से हीन हुआ , 
समझो वो पतित मलीन हुआ ,
वो शक्ति केंद्र ,वो महा बली , 
बस उसी दिवस  से दीन हुआ, 
जिस दीप से तम  मिटा नहीं, 
उस दीप का जलना क्या जलना ,
 जिस पथ पर शूल बिछे  न हों, 
उस पथ पर चलना क्या चलना , 
 तुम्हारा-- अनंत 

3 टिप्‍पणियां:

AsHu ने कहा…

वृक्ष हों भले खड़े हों घने हों बड़े ,पत्र एक छाहँ भी मांग मत-मांग मत अग्निपथ - अग्निपथ................ तू न रुकेगा कभी,तू न थमेगा कभी कर शपथ - कर शपथ अग्निपथ-अग्निपथ... इसी तरह अपने 'अनंत ' 'अनुराग' से अनंत ब्रम्हांड को तुम प्रकाशित करते रहो..............

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सार्थक संवेदनशील रचना ...

हल्ला बोल ने कहा…

धार्मिक मुद्दों पर परिचर्चा करने से आप घबराते क्यों है, आप अच्छी तरह जानते हैं बिना बात किये विवाद ख़त्म नहीं होते. धार्मिक चर्चाओ का पहला मंच ,
यदि आप भारत माँ के सच्चे सपूत है. धर्म का पालन करने वाले हिन्दू हैं तो
आईये " हल्ला बोल" के समर्थक बनकर धर्म और देश की आवाज़ बुलंद कीजिये...
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