मंगलवार, जनवरी 01, 2013

मैं कपास नहीं बनना चाहता !!!!!

मेरी माँ लोरी सुनाते वक्त 
रोटी खिलाते वक्त 
मेरे कपड़े पछीटते वक्त 
और मुझे पीटते वक्त 
चाहती है कि मैं कपास बन जाऊं 
मुझे दीपक की बाती बनना है 
और कुल को उजाला करना है 

कुल एक अँधेरा कमरा है 
जहाँ कितने भी दीपक जला दो 
अँधेरा बना ही रहता है
और बनी रहती है
इस कमरे को रोशन करने की फ़िकर
जो मुसलसल रेंगती चली जाती है
एक पीढ़ी से अंतिम पीढ़ी तक

मैं कैसे समझाऊं कि ये वक्त
माचिस की तीलियों का वक्त है
लोहे का वक्त है
दलदल और चौराहों का वक्त है
कपास जीते जी मार दिया जायेगा
या मारते-मारते जिलाया जायेगा
इसलिए मेरे भीतर का कपास
माचिस की तीली या लोहा बन जाना चाहिए
ये उतना ही जरूरी है
जितना कोई भी गैरजरूरी काम जरूरी होता है

वो मुझमें दिल्ली देखना चाहती है
पर मुझमे दंतेवाडा, झारखण्ड और देश भर के जंगल उग आये है
वो चाहती है कि मैं सागर बन जाऊं
और सारी नदियों की नियति हो जाऊं
पर मैं नदियों को विद्रोह सिखाने में लगा हुआ हूँ
वो चाहती है कि मैं जो चाहूँ वो मुझे मिल जाये
मैं चाहता हूँ जो चाह कर भी कुछ नहीं चाह पाता
उसका चाहा उसे मिल जाये

वो किसी राम भगवान से मनाती है
कि मुझे सद्बुद्धि दे
मैं एक लिजलिजे डर से भर जाता हूँ
और सपने में एक गर्भवती महिला को जंगलों में छोड़ने चला जाता हूँ
जब नीद तोड़ कर उठता हूँ
तो पाता हूँ कि मैं भगवान बन चुका हूँ
और मेरे कुल का कमरा उजाले से भर गया है
दीवारों पर मेरे नाम के नारे हैं
और लोगों के दिल में मेरे नाम का भ्रम

मैं माँ की आँखों में एक सुकून देखता हूँ
उसकी इच्छाओं, कुंठाओं, प्रेमों और पूर्वाग्रहों में लिथड़ा हुआ कपास मुस्कुराता है
जिसकी सकल मुझसे हूबहू मिलती है

यकीन मानिये मैं चीख उठता हूँ
मैं कपास नहीं बनना चाहता !!!!! 


तुम्हारा--अनंत 
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