शुक्रवार, दिसंबर 14, 2012

एक उजड़ा शहर .....


उसका असर कुछ इस कदर हो गया है,
कि असर का असर भी बेअसर हो गया है,
इस लुटे हुए दिल को कोई दिल क्यों कहेगा,
ये दिल तो एक उजड़ा शहर हो गया है,
राहें और मंजिल जिसकी दोनों ही गुम हैं,
वो मदमस्त राही बेफ़िकर हो गया है,
जो समंदर की सोहबत में रह करके लौटा,
वो थोड़ा सा साहिल, थोड़ा लहर हो गया है,
ये बद्हवास ख्वाबों की दौड़ थमती नहीं क्यों,
आज आदमी खुद एक सफ़र हो गया है,
तुमने लालच से उसे ऐसा मैला किया है ,
कि जो पानी था अमृत, वो जहर हो गया है,
तुम्हारा--अनंत
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