मंगलवार, जनवरी 17, 2012

''हम भारत की चिड़ियाँ ...............................

बेचारी चिड़ियाँ
भूखी जनता का पेट भर गया है ,
चुनते-चुनते ,
लोकतंत्र  ,लोकहित ,लोकमत ,
लोक के लिए परलोक की बातें है ,
अखबार से ले कर सोशल नेटवर्किंग साइट्स तक ,
चुनने  के लिए दबाव डाल रहे है,
अब कौन कहे कि किसे चुनें ,
सब जहर के बीज है,
बेचारी चिड़ियों की फ़िक्र किसे है,
जो एक बार चुन कर,
पांच सालों तक अपनी आवाज़ खो देंगी,
कटवा लेंगी अपने पँख लाइन में खड़े होकर,
रचा जायेगा उनके कटे पंखों की बिसात पर बहुमत का चक्रव्यू,
मुर्छित पड़ी रहेंगी सभी चिड़ियाँ  नेपथ्य के अँधेरे में लिथड़ी हुई,
और मंच पर मुसलसल जारी रहेगा संसद का एकल नाट्य,
पूरी हनक के साथ अगले पांच सालों तक,
मन करता है चुपके से एक सच्चाई लिख आऊँ उस महान किताब के पहले पन्ने पर ,
कि जिस पर लिखा है ''हम भारत के लोग ................
की जगह ...''हम भारत की चिड़ियाँ ................................
पर क्या करूँ मैं ये नहीं कर सकता ,
क्योंकि इस देश में सच्चाई मर गयी है 30  जनवरी 1948  को,
राज घाट में ''हे राम'' कह कर
और उसकी लाश दफना दी गयी है,
गरीबों के खून से छपे हरे नोटों में,
मुस्कुराती हुई तस्वीर की कब्र में,
मुझे याद आ रही है वो कहानी,
जिसमे सभी चिड़ियाँ फंस गयी थी बहेलिए के जाल में,
वो एक साथ जोर से उड़ी थी पूरी ताकत के साथ,
और आजादी मिल गयी थी उन्हें,
मुझे लगता है कि समय आ गया है उड़ने का,
पूरी ताकत साथ उड़ो कि आजादी मिले सभी चिड़ियों को....
 
तुम्हारा--अनंत   
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