GA-4

मंगलवार, अप्रैल 16, 2019

नींद: नौ कविता ग्यारह क़िस्त-3

तुम हिचकी की तरह आई थी
और किसी दर्द की तरह गई

जाने से कहाँ कोई जाता है
उसका कुछ ना कुछ रह ही जाता है
जैसे मेरी दादी की छड़ी रह गई
और तुम्हारी अनकही बात

खेत में बीज रोपते वक़्त
या किसी ढलान से उतरते हुए
तुम्हारी बहुत याद आती है
मेरा हमशक्ल दीपक के नीचे
अंधेरे की शक्ल में रहता है

ईश्वर जरूर हरी घास के मैदान में बैठा
कोई उदास निठल्ला आदमी है
वो जब जब घांस नोचता है
ज़िगर तक जाने वाली मेरी नसों में खिंचाव उठता है
किसी दिन जब मैं हृदयाघात से मरूँगा जान लेना
ईश्वर की नौकरी लग गई है
और उसने अपने आसपास की सारी घास नोच दी है

रात के तीन बजे जब रात जा चुकी है
दिन आ रहा है
मैं बीच में खड़ा हूँ
किसी एक्सीडेंट के इंतज़ार में
कि नींद की कोई गाड़ी
150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आये
और मुझसे टकरा जाए
मैं जियूँ या मरूँ
कम्बख़त मुझे नींद तो आए।

अनुराग अनंत

नींद: नौ कविता, ग्यारह क़िस्त-2

जब उंगलियों पर गिनते हुए मैं आठवें पोर पर पहुँचा
रात के रोंओं में आग भभक उठी

तुम्हारे बिखरे और ढीले वाक्यों से झरे अक्षरों ने एक शब्द रचा
जिसका अर्थ ईशा मसीह के सिर पर ठोंकी गई कील सा था

मैंने सलीके से अपनी सलीब उठाई
और नींद ने आख़री सांस ली
सजा सुनने के बाद अपराधी ने अपने खाली जेब में हाँथ डाल कर
ख़ुद को अपने खालीपन में भर लिया
जो काम सृष्टि के पहले दिन से टालता रहा मैं
उस रात आख़िर कर लिया

आखरी बार जब पूछी गयी मेरी इच्छा
तो मेरे साथ उस स्त्री ने भी कहा
हमें रेखाओं को अनदेखा करने दिया जाए
कोई ना बचाए हमें
हमें जीवन की तलाश में मरने दिया जाए

ये बात जो कविता में दर्ज़ हुई है
मेरे किसी जागृत स्वप्न से छिटक कर गिर गई है

अनुराग अनंत

नींद: नौ कविता, ग्यारह क़िस्त-1

स्वप्न मेरा संस्कार था
मैंने जागते हुए स्वप्न देखे
ये रात का अपमान था
और नींद पर लानत

रात ने श्रापा मुझे
और नींद ने धिक्कार दिया

मैं जागते हुए बरसात की रातों को रोता रहा
लोग चिंतित थे
कि पिछवाड़े बहती नदी दिन-ब-दिन खारी क्यों होती जा रही है

सातों समंदर सप्त प्रेमियों के तप्त अश्रु हैं
जो उनकी आत्मा के गड्ढ़ों में एकत्र हुआ
बरसात की रोती रातों में

तुम्हारा स्पर्श हथेलियों पर
भूखे भिखारी की तरह हाय हाय करता रहा
और तुम्हारे घर से दस कदम की दूरी पर
पान की दुकान में एक घायल इंतज़ार तिल तिल कर मरता रहा

ये बिखरे तंतुओं की तरह बिखरी बातें
रात भर जोड़ता रहता हूँ
मेरे भीतर उग आए पहाड़ पर
जागते हुए पत्थर तोड़ता रहता हूँ

जिस रात मैं पत्थर से पानी हो सकूँगा
बस उसी रात फिर से सो सकूँगा

अनुराग अनंत

लिफाफों का दुःख !!

लिफाफों का दुःख
चिठ्ठियों के दुःख से कभी कम नहीं रहा
डाकिए दो दुःखों के बीच पुल बनाते रहे सदा
और गांव की सरहद पर बैठा देवता
एक हज़ार साल पहले किसी के प्रेम में फांसी पर लटक गया था

मेरे पास तुम्हारी दो ही चीजें थीं
एक तुम्हारी स्मृति
और दूसरी तुम्हारी स्मृति की स्मृति
याद और याद की याद

ये ऐसे ही रहा जैसे
दुःख के भीतर दुःख
लिफ़ाफ़े के भीतर चिट्ठी
डाकिए के भीतर पुल
और सरहद पर बैठे देवता के भीतर प्रेमी

अनुराग अनंत

मुझे देह की चाह नहीं थी/ मैंने तुम्हारा मन मांगा था !!

मुझे देह की चाह नहीं थी/ मैंने तुम्हारा मन मांगा था
तुमनें नयनों में अश्रु दिए थे/ पर मैंने तो सावन मांगा था

तुमनें स्वर्णिम स्वप्न दिखाए 
और स्मृतियों को दिया सहारा
मैं उलझी भटकी नदिया न्यारी
तुमनें मुझको दिया किनारा
मैं हिय मंदिर में रहने वाला
निर्वासित कुलदेव बेचारा
हाँ सच है मैं डूब रहा था
तुमनें मुझको पुनः उबारा

तुमने जग दे डाला मुझको
पर मैंने घर आंगन माँगा था

मुझे देह की चाह नहीं थी/ मैंने तुम्हारा मन मांगा था।

जग में जितने दग्द हृदय हैं
सब मंदिर, सब देवालय हैं
पीड़ाओं के शत सिंधु यहां हैं
खंडित हिय के हिमालय हैं
मैं पीड़ाओं का साधक हूँ
तुममें पीड़ाओं के शिवालय हैं।

मैंने उसी पावन पीड़ित मन का
एक पवित्र आलिंगन मांगा था

मुझे देह की चाह नहीं थी/ मैंने तुम्हारा मन मांगा था

जैसे निद्रा में स्वप्न जागता
वैसे तुम मुझमें जागी थी
तुम प्रेम समर्पण की साधक थी
तुम अनंत अनुरागी थी
नयन तुम्हारे मारक मोहक
तुमने नयनों में पीड़ाएं पागीं थीं

मैंने तुम्हारे निशब्द नयनों का
गंगाजल पावन मांगा था

मुझे देह की चाह नहीं थी/ मैंने तुम्हारा मन मांगा था

अनुराग अनंत

आज फिर रात भर नहीं सोए ना तुम दोनों !!

दिमाग़ में कई गालियाँ थीं। और दिल में एक बरजोर नदी। दिमाग़ गलियों में उलझ जाता था। वो धुंध के पार जो है उसे देखने को कहता था। दिल मानता ही नहीं था। कहता था, "मंजिल तक जाए बिना रुक नहीं सकता, जो पहाड़ी, रोड़े, ईंट, पत्थर आएंगे, वो मेरे वेग का शिकार होंगे"।

एक रात जब दिल अंधे मोड़ से टकरा कर उससे रास्ता तराश रहा था। दिमाग़ ने दिल के कंधे पर हाँथ रख कर कहा कि तुम जिसे मंज़िल मानते हो वो किसी और रास्ते पर है। तुम जितनी दूर उसके पीछे चलोगे। वो उतनी ही आगे उस रास्ते पर निकल जाएगा। या फिर किसी और रास्ते पर।

दिल अब दिमाग़ से लिपट चुका था। आँसू आंखों से बाहर आ कर इस विस्फोट के साक्षी हो रहे थे। यही कोई रात के तीन बजे होंगे। दिमाग़ ख़ामोश था। उसने अपनी बात इतनी बार दोहराई थी कि उसे अब कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी। दिल बैठा कुछ गुनगुना रहा था। हाँथ में उसके स्वाद बदलने वाली सिगरेट थी और आंखों में सूनापन। दिल हार नहीं मानता। उस रात भी नहीं माना। लेकिन अब वो पहले सा बेसब्र नहीं था। दिमाग़ ने कहा चलो क्या यही कम है कि थोड़ा संभले तो तुम। दोनों खिलखिला के हँसे। सूरज आसमान पर उगा और रात भर इंतज़ार करती नींद ने शिक़ायत की, "आज फिर रात भर नहीं सोए ना तुम दोनों"

अनुराग अनंत

मैं कविता की आग में जल मरूंगा !!

सुनों !
मुझे जलने की धुन सवार है
जैसे सवार थी उस बौद्ध भिछुक पर
जो चाइना मुर्दाबाद करते हुए जल गया
या फिर उस स्टूडेंट की तरह
जो तेलंगाना जिन्दाबाद करते हुए मर गया

मेरे हांथो में पत्थर है
और सीने में गोली
मुझे मारने में तुम्हे मुश्किल से दो मिनट लगे
पर खत्म करने में सदियाँ कम पड़ेंगी

मैं आवाजों के घेरे में घिरे हुए आदमियों की आवाजों से घिरा हूँ
मेरी चिंता में काली तस्वीरें है
और खून में लिथड़ा एक अँधेरा रो रहा है

तुम्हारी चिंता में सुनहरे पंख और मरमरी बदन हैं
सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना और शाम का भोजन है
फ़िल्में, गाने, चुटकुले, प्यार की अफवाहें और अश्लील हंसी तुम्हारे चारो तरफ पसरी है
और मेरे चारो तरफ है नारे और खामोश घुटन, सन्नाटा और शोर

एक आग है, एक नंगी आग है मेरे चारो तरफ
जिसमे मैं जल मरूंगा
सुनो!
मैं जल मरूंगा
जैसे जले हैं मुझ जैसे ही कई

मेरे जलने की दुपहर तुम कहना
गर्मी कितनी ज्यादा है, अबकी सर्दी बहुत ज्यादा पड़ेगी
थोड़ी सी जम्हाई आएगी तुन्हें
और तुम कहोगे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता
भ्रष्टाचार इस देश को डूबा देगा

तुम चिंता करना कि
सचिन सौ सेंचुरी मार पायेगा कि नहीं ?
सलमान शादी करेगा कि नहीं ?
तुम भगवान से मनाना
शाहरुख खान कभी बूढा न हो
अमिताभ बच्चन कभी न मरे
राखी सावंत पर तुम चर्चा करना
और निष्कर्ष निकलना कि वो चरित्रहीन है
तुम बेवजह हंसना और रोना
फिर भूल जाना कि आज तुमने क्या कहा था
आज क्या हुआ था या किया था
ताकि तुम कल फिर वही बातें कह सको
तुम कल फिर वही काम कर सको

और मुझे कल फिर जलना पड़े

सुनो!
मुझे जलने की धुन सवार है
मैं कविता की आग में जल मरूंगा

अनुराग अनंत

सोमवार, फ़रवरी 12, 2018

दिल्ली..!!

तुम दिल्ली थी
तुम्हें हर कोई पाना चाहता था

मैं भी दिल्ली था
मुझे हर कोई लूट लेना चाहता था

हम दोनों का दिल भी दिल्ली था
सौ बार उजड़ने के बाद भी
बस ही जाता था

समय भी दिल्ली था
वो मुझे, तुम्हें, हमारे दिल को
'कुछ नहीं' समझता था

लोग भी दिल्ली थे
'सब कुछ' समझते थे
कभी चुप रहते थे
कभी हँसते थे

वो बात भी दिल्ली थी
जो हमारी कहन की पहुँच से
हमेशा दूर ही रही

एक बात बताओ न
सब दिल्ली-दिल्ली क्यों है यहाँ ?

अनुराग अनंत

तेरा चेहरा वो खंज़र है हुस्ना..!!

हुस्ना तेरे साथ बिताया हर लम्हा
रह रह कर कविता बनकर रिसता है
भीतर है कोई जो तेरी याद में रोता है
बाहर है कोई जो हर एक बात पर हंसता है
तेरा चेहरा वो खंज़र है हुस्ना 
जिसका क्या कहना
वो हर धड़कन के साथ
थोड़ा और ज़िगर में धंसता है
हुस्ना तेरे साथ बिताया हर लम्हा
रह रह कर कविता बनकर रिसता है...
अनुराग अनंत

गुरुवार, दिसंबर 28, 2017

दिल की बात !!

मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि
मैं आजतक वो नहीं कह सका
जो मुझे कहना था

मैं अकेला नहीं हूँ
तुम भी हो मेरे साथ
जो नहीं कह पाया है दिल की बात

फ़र्क बस इतना है कि
मैं ये बात कह पा रहा हूँ
और तुम हो कि
इतना भी नहीं कह पाते

मुझे मेरी ख़ामोशी में चुभन महसूस होती है
इसलिए मैं कविता बनाता हूँ

तुम्हें तुम्हारी ख़ामोशी महसूस ही नहीं होती
इसलिए तुम बेवकूफ बनाते हो
खुद को भी
और दुनिया को भी

अनुराग अनंत

सोमवार, दिसंबर 25, 2017

प्यार...!!

प्यार से
सबसे पहले आधा 'प' अलग हुआ
और बचा सिर्फ 'यार'
जिसमे बाद में
'र' रुपये में बदल गया
और 'या' से याद ही बची सीने में

और तुम हो कि पूछते हो
मजा आ रहा है जीने में ?

अनुराग अनंत

मैं एक रहस्य ही हूँ..!!

मैं खुद को एक नदी समझता था
और वो मुझे एक तालाब समझती थी
मुझे लगता था
मैं नदी की तरह आगे निकल जाऊंगा
और उसे लगता था कि
मैं तालाब की तरह वहीँ रह जाऊंगा

वो ना तालाब थी, ना नदी
वो पानी थी
और उसके जाने के बाद
मैं ना तालाब रहा, ना नदी

मैं क्या हूँ ?
अब ये एक रहस्य है

और शायद
मैं एक रहस्य ही हूँ !!

अनुराग अनंत

बुधवार, दिसंबर 20, 2017

एक अधूरी सी कहानी..!!

एक अधूरी रात
अधूरा इश्क़
अधूरी ज़िंदगी

एक अधूरी मुलाकात
अधूरा ख़ुदा
अधूरी बंदगी

एक अधूरी वाह
अधूरी आह
अधूरी चाह है

एक अधूरी नदी
अधूरा समंदर
अधूरी थाह है

एक अधूरा सा कदम है
एक अधूरा सा सनम है
एक अधूरे से हम हैं

एक अधूरा सा ख़्वाब है
एक अधूरा सा जवाब है
एक अधूरा इन्तेख़ाब है

एक अधूरा सा अधूरापन अधूरा रह गया है
कोई अधूरी बात में अधूरी बात अपनी कह गया है
ये अधूरा खंडहर, अधूरा खड़ा, अधूरा ढह गया है
ये अधूरा सा अश्क़, अधूरा है, अधूरा बह गया है

यह अधूरापन पूरा कर रहा है जिंदगानी
क्या है मेरा तआरुफ़ जो पूछो ,तो बताऊं !
एक अधूरी सी व्यथा है, एक अधूरी सी कहानी ।।

अनुराग अनंत

नैना तेरे दरस बिना...!!

बांझ हुए नैना तेरे दरस बिना
इन नैनन का यारा अब क्या करना

इन नैनन से देखा तुझको
अब कुछ देखन को न जिया करे
तुझको देख के जीते मरते थे
अब कैसे जिएं और कैसे मरें
नयनों से अश्क़ झरे ऐसे
जैसे झरता हो कोई झरना

बांझ हुए नैना तेरे दरस बिना....

नयना के सब रंग उतर गए
सपने सब के सब बिखर गए
तुम रंग थे मेरे इन नयनों के
तुम बिन बेरंग हुए नयना
मेरे नयना सजना भूल गए
जब से बिछड़े तुम सजना

बांझ हुए नैना तेरे दरस बिना.....

न देखूँ जग न याद जगे
न तुझको देखन की लाग लगे
जो तू ही मुझसे बिछड़ गया
तो क्यों न बिछड़ें ये नयना
जो तू ही जीवन मे रहा नहीं
तो फिर इन नयनों का क्या रहना

बांझ हुए नैना तेरे दरस बिना
इन नैनन का यारा अब क्या करना....

अनुराग अनंत

गुरुवार, दिसंबर 07, 2017

या रब अब दंगा न दीजो !!

हमसे उन्होंने कहा
कि हमें मंदिर बनाना है
हमें मस्जिद बनाना है
उन्होंने हमें बताया
कि हमारे राम को खतरा है
हमारे रहीम पर मुसीबत है
उन्होंने हमें दलीलें दीं
कि हमारे धर्म को मिटाने की साजिश हो रही है
हमारे दीन को कोई खतम करना चाहता है
उन्होंने हमसे कहा
कि हमें ये सब बचाने के लिए आपस में लड़ना पड़ेगा
और हम उनकी बात मन कर लड़ने लगे
लड़ाई हुई, दंगे हुए
लड़ाई-दंगों में
मंदिरें टूटीं
मस्जेदें टूटीं
राम मरा
रहीम क़त्ल हुआ
हमारा धर्म और दीन छाती पीट-पीट कर हमारी लाशों पर रोते रहे

और जिन्होंने हमें लड़ने के लिए कहा था
वो हमारे घरों में हमारी बहन-बेटियों की इज्जत से खेलते रहे
हमारे घर लूटते रहे
चुनाव जीत कर सरकार बनाते रहे
टीवी पर आते-जाते रहे
अखबारों पर मुस्कुराते रहे
बड़ी-बड़ी इमारतों पर झंडा फहराते रहे
राष्ट्रगान गाते रहे
यज्ञ-हवन और अभिषेक करते रहे
अजान-नमाज़ और रोज़े अता करते रहे

और हम जो जिन्दा आदमी थे कभी
महज़ गीनती और तारीख भर हो कर रह गए

अनुराग अनंत

हम भारत के भूखे लोग..!!

पेट जब पीठ पर टिक जाता है
तो कोई तर्क नहीं टिकता है
चाँद, चाँद नहीं रहता
चाँद रोटी हो जाता है।

आदमी जितना निरीह होता जाता है
उतना ख़तरनाक़ और खूंखार हो जाता है
भूखा आदमी सवाल हो जाता है,
बवाल हो जाता है
दीवार हो जाता है

वो चौराहे के बीचोबीच खड़ा हो कर
दर्ज़ करता है, अपना हस्तक्षेप !!
और प्रस्तावना में 'हम भारत के लोग...'
की जगह लिख देना चाहता है
हम 'भारत के भूखे लोग....'

पर ठीक उसी समय याद आता है
भूख से पहले उसके पास जाति है
धर्म है, क्षेत्र है, भाषा है, और गर्व है

जिस दिन वो भूख के अलावा सबकुछ भूल जाएगा
उसदिन बादशाह को छट्ठी का दूध याद आ जाएगा।

अनुराग अनंत

आदमी आदी हो गया है..!!

आदमी आदी हो गया है
आदमियों की नकल का

वो फ़ायदा उठता है
आदमियों जैसे हाँथ-पैर
पेट,पीठ और शकल का

आप किसी आदमी जैसे को
आदमी समझ लेते हैं
इस तरह एक भरम है
जो आदमियत की परिभाषा हो गया है

आदमी गोल-मटोल तर्क हो गया है
एक चुकी हुई भोथरी भाषा हो गया है

ये आदमी अकेले में आईने से डरता है
और जिस दिन सच्चाई से आईना देख लेता है
बस उसी दिन मरता है

आदमी, आदमी जैसे काम बहुत कम करता है
जब सर तान कर चलने की जरूरत होती है
वो रपट कर गिरता है
आदमी मरते हुए जीता है
और जीते हुए मरता है
आदमी, आदमी जैसे काम बहुत कम करता है।

अनुराग अनंत

और बड़ा सपना..!!

एक दिन मेरा मन किया, मैं कुछ बहुत अच्छा लिखूँ।

मैंने तुम्हारा नाम लिखा।

और फिर दुनिया की सारी कविताओं ने दाद दी
सारे कवि अचंभे से निहारते रहे मुझे
मेरे आस-पास मोर के पंख की तरह बिखर गए संसार के सारे महाकाव्य

इस तरह मैं, मैं नहीं रहा
मुझे एक झटके से पता चला
सपना जब कागज पर उतरता है
तो और बड़ा सपना हो जाता है

अनुराग अनंत

'मैं' से 'तुम' तक की सुरंग !!

सुरंगों के इस देश में
जहाँ हर शहर, कस्बे और मुहल्ले में
किसी न किसी सुरंग का किस्सा आम है

मैं भी एक सुरंग ढूंढ रहा हूँ
जो मुझसे हो कर तुम तक पहुंचती हो

कोई मुझमें प्रवेश करे तो तुममें निकले
कोई तुममे डूबे तो मुझमे उतराए

मैं आजकल बस दिन रात वही सुरंग ढूढ़ रहा हूँ
और लोग हैं कि कहते हैं
मैं कवि होता जा रहा हूँ
शायर सा दिखने लगा हूँ
मैं बदलता जा रहा हूँ

मुझे भी लगता है
गर नहीं ढूढ़ पाया ऐसी सुरंग
तो इस तरह बदल जाऊंगा
कि सुरंग हो जाऊंगा

'मैं' से 'तुम' तक की सुरंग !

अनुराग अनंत

संभावनाएं !!

संभावनाएं संभव है सारी संभावना खो दें
और भावनाएं अनाथ भवनों के अहाते में लावारिश पशुओं सी बेड़ दीं जाएं

आँसूओं में बहें आशाएं
और आशंकाओं पर जा कर टिक जाएं आस्थाएं

वो आएं तो शायद इस तरह आएं
कि बदल जाएं सब की सब परिभाषाएं
अपनी पीठ खुजलाने को रीरियाए व्याकरण
और किसी दरबारी कवि सी हो जाएं भाषाएं

जो तुम देखो तो हर आदमी में तुम्हें सधा हुआ आदमी दिखे
हर आदमी में बंधा हुआ आदमी दिखे

मन में पालती मारकर बैठ जाए पागलपन
और जो तुम उसको एक छंटाक परसो
तो ज़िद करके तुमसे मांगे
खाने को एक मन

रात के अंधेरे में गूंजता रहे
'भात-भात' का संगीत
और दूर कहीं कोई माँ
अपने बच्चे की लाश पर
लालसाओं का लेप लगा कर
सुरक्षित कर ले
भीतर बहुत भीतर किसी तहखाने में

संभावना ये भी है कि जब तुम्हें चीख़ कर रोना हो
अपने डर को खोना हो
तुम्हें मिल जाए कोई क़िताब
तुम उसकी प्रस्तावना पढ़ो
और घटित होने पर आमादा किसी घटना की तरह
घटित होने से पहले ही स्थगित हो जाओ
अनुराग अनंत