GA-4

रविवार, मार्च 13, 2011

ख़त

एक ख़त लिखा था ,
बस एक 
शायद आंसू  से लिखा था ,
तभी मेज पर पड़ा पड़ा रोने लगता है ,
फूट -फूट कर बिखर जाता है ,
हर्फ़ - हर्फ़ जोड़ कर ,
समेत कर ,सहेज कर ,
रख देता हूँ ,बिठा देता हूँ ,
बच्चे  की तरह हँसने लगता है फिर ,
और फिर
 कभी -कभी नादानी भरा सवाल पूछता है,
 प्यार किसे कहते हैं ?
मैं नहीं बता पता हूँ ,
तो फिर से वो रोने लगता है ,फूट- फूट  कर ,
बिखर जाता है ,
फिर हर्फ़ -हर्फ़ जोड़ कर बिठा देता हूँ,
 बच्चे की तरह ,
तुम्हारा --अनंत 

मंगलवार, मार्च 08, 2011

कहूँ कैसे की क्या ग़म है

कहूँ कैसे की क्या ग़म है ,
क्यूँ आँखें ये मेरी नम है , 
दरो -दिवार भीगीं है ,
खून से लथ-पथ आँगन है ,
सिसक कर रो रहा है जो,
कि व्याकुल हो रहा है जो ,
शहीदों का पियारा  वो,
 भारत माँ का  दामन है ,
मराठी नाम कर कोई मेरी हिंदी डरता है ,
देशद्रोही हो कर देशभक्त कहलाता है ,
कर के गुमराह जनता को लड़ता है  -भिड़ता है ,
जला कर बस्तियां देखों रोयियाँ  पकता है , 
न जमजमा,न तरन्नुम  ,न कोई गीत गुंजन है ,
फिरकापरस्त कड़ी पाशों के खिलाफ ये ''अनंत ''का गर्जन है ,
 शहीदों का पियारा ये भारत माँ का दामन है ,

किले पर चढ़ कर हर वर्ष कोई कुछ बोल जाता है ,
मेरी गरीबी भाषण में कैसे तोल जाता है ,
छिन गयीं रोटियाँ मेरी कि अब फांके पर जीता हूँ ,
कम्बखत है वो कैसा जो हिंद को बढ़ता बताता  है,
जिधर मैं देखता हूँ  बस मुझे अवसाद दीखता है, 
  अलगाववाद ,   क्षेत्रवाद ,आतंकवाद , दीखता है ,
 सरकारें हो गयीं दरिंदा भूंख का सामान अब  हम हैं ,
शहीदों का पियारा  ये भारत माँ का दामन है ,

यूं  ही खोते रहोगे तुम गर यूं  ही सोते रहोगे तुम ,
अपनी ही रहा पर कब तक कांटे  बोते रहोगे तुम ,
उठो आब क्रांति कि कोई नई ज्वाला जला दो तुम ,
शहीद तुममे जिन्दा हैं उन्हें ये बात  दो तुम ,
बनो अब बोस बाबु सा कि संसद को हिला दो तुम ,
भगत ,आज़ाद , बिस्मिल ,की याद तजा करा दो तुम ,
परायों का नहीं प्यारे ये हमारा ही चमन है ,
शहीदों का पियारा ये भारत माता का दमकान है ,
तुम्हारा- -अनंत 

सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

jis path par shool bichhe na ho

जिस पथ पर शूल बिछे न हों ,
उस पथ पर चलना क्या चलना ,
जो काम कठिन न हो प्रियवर ,
उस काम को करना क्या करना ,
जो मरुथल में नदी बहाते हैं,
पर्वत की धूल उड़ाते हैं,
कंटक का मुखडा चूम -चूम ,
कंटक को फूल बनाते हैं , 
कुछ ऐसे वीरों के कंधे पर देश कोई चलता है ,
 रक्त चाट कर महा पुरूषों का समाज कोई बदलता है ,  
जीवन लघु से लघुतर है ,
इसके बीत जाने पर हाँथ का मलना क्या मलना ,
जिस पथ पर शूल बिछे न हों ,
उस पथ पर चलना क्या चलना, 
सूरज उगता है, तम बह जाता है,
जो मन में आता है ,कह जाता है ,
सिन्धु  तीर पर बना स्वप्न महल,
खुद- ब- खुद ढह जाता है ,
जो ह्रदय लगन से हीन हुआ , 
समझो वो पतित मलीन हुआ ,
वो शक्ति केंद्र ,वो महा बली , 
बस उसी दिवस  से दीन हुआ, 
जिस दीप से तम  मिटा नहीं, 
उस दीप का जलना क्या जलना ,
 जिस पथ पर शूल बिछे  न हों, 
उस पथ पर चलना क्या चलना , 
 तुम्हारा-- अनंत 

गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

                                ठहरा  हुआ उदास  सा पानी ,
                                  कहता हुआ  कुछ कहानी , 
                                      जब -जब मचलता है ,
                                   आँखों से कुछ निकलता है ,
                                   और चहेरा  भीग जाता है ,
                                    चिहराई हुई दीवारें ,
                               परत -दर -परत जब गिरती है ,
                                      कुछ जख्म टहलते है ,
                                       एक पीर बिखरती है ,
                       धुआं  माथे पर हाँथ रख कर बैठ जाता है,
                                  और चेहरा भीग जाता है ,
                                     एक सीढ़ी नुमा ख्याल ,
                            उतर कर दिल में छिप कर लेट जाता है ,
                                धडकनें सर पर हाँथ फेरती है ,
                            चाँद के चेहरे पर सूरज उभरता है ,
                             और फिर चेहरा भीग जाता है ,
                          कोई हवा जब ,फर्श पर पड़े  जर्रे को ,
                                     अर्श पर बिठाती है ,
                          उसके रुंधे हुए गले को माला पहनाती है ,
                    तो वो जर्रा रोते हुआ जमीन की ओर देखता है ,
                                  और चेहरा भीग जाता है ,
                                 जब आधी रात को ,दो  पेड़ ,
                             अकेले घुटनों तक रजाई ओढ़ कर ,
                                बरसात की बात करते है ,
                              तब न जाने कहाँ से आ कर ,
                             सावन का मेघ बरस जाता है ,
                               और चेहरा भीग जाता  है ,  
                                     तुम्हारा --अनंत  

बुधवार, फ़रवरी 23, 2011

न जाने मैं क्यों रोता हूँ ,

न जाने मैं क्यों रोता हूँ ,
मेघ नाचते हैं पूरी रात ह्रदय में ,
जब बचता है थोडा समय सूर्योदय में ,
मन के खेत जोत के साथी, यादें तेरी बोता हूँ 
न जाने मैं क्यों रोता हूँ ,
ये सारा जग रात ओढ़ कर सो जाता है ,
स्वपन नगर में ,स्वप्न देख कर खो जाता है,
पर मैं तो अंगारों की शैया पर ,न जगता हूँ न सोता हूँ 
न जाने मैं क्यों रोता हूँ ,
तुझे मेरी क्या फ़िकर है प्यारे ,
तूने तो तोड़े बंधन सारे ,
अब कुछ कैसे कहूं मैं तुझसे,क्या मैं तेरा होता हूँ ,  
न जाने मैं क्यों रोता हूँ ,
तुम्हारा --अनंत

सोमवार, फ़रवरी 14, 2011

maa

मै चला आया हूँ घर से , 
दो  आँख रोती होगी ,
एक गंगा सी बह रही होगी,
तो एक यमुना हो रही होगी ,
मचलता होगा एक मन , 
ये पूछने के लिए, 
कि आज क्या  खाओगे
सुबह उठने के बाद ,
बढ़ते होंगे दो बेकस कदम ,
मेरे कमरे कि तरफ ,
मुझे जगाने के लिए ,
और मेरा खाली बिस्तर देख कर ,
वापस आ जाते होंगे मायूसी ओढ़कर,
पूजा करते वक़्त जुड़ते होंगे दो हाँथ ,
और एक  मुंह,
 एक मन के साथ  मांगता होगा दुआ, 
मेरे लिए ,
रात को सोते  वक़्त,
एक माँ कलप कर मेरा नाम  ले लेती होगी,
मै चला आया हूँ घर से , 
दो आँख रोती होंगी ,
तुम्हारा--अनंत 
आप यदि घर से बहार है तो आप के घर पर भी दो आँख रोती होगी
 या फिर यदि आप अपने घर से जब कभी बहार जायेंगे ,तो कोई रोये चाहे न रोये दो आँख जरूर रोयेंगी ,
 इस कविता पर अपनी टिप्पड़ी जरूर दे ,

रविवार, फ़रवरी 13, 2011


तुम्हे मेरी  आँखो में कुछ खरगोश सा दिखता है ?  
एक खरगोश सा सपना,
दिल से आँख तक दौड़ लगता है ,
रुकता है ,
हाँफते हुए झांकता है ,
बाहर दुनिया में ,
और सहम कर बैठ कर जाता है ,
एक खरगोश सा सपना ,
दिल से आँख तक दौड़ लगता है ,
हरी घास पर दौड़ता हुआ रेला ,
किसी पतंग के मांझे सा उलझा हुआ झमेला ,
जब डराता है उसे ,तो वो बेचारा अकेला ,
दिल कि जमी पर ,
एक कब्र खोद कर दफ़न हो जाता है ,
नंगी लाश पर बिछा हुआ कफ़न हो जाता है ,
ये सपना है गरीब का ,
जो दिवाली पर अपनी दहलीज़ पर दीपक ,
होली में अपने बच्चों के हाँथ में पिचकारी ,
सुबह शाम पेट में रोटी ,
पढता हुआ बेटा,
पढ़ती होई बेटी ,
देख कर,
मन ही मन बच्चों सा मुश्कुरता  है ,
एक खरगोश  सा सपना ,
दिल से आँख  तक दौड़ लगता है ,
''तुम्हारा -- अनंत ''

गुरुवार, जनवरी 13, 2011

वो

तुम अक्सर वो नहीं होते ,
जो तुम सोचते हो ,
कि तुम हो,
तुम अक्सर वो भी नहीं होते ,
जो लोग सोंचते हैं
कि तुम हो ,
तुम अक्सर अपने ''वो''
और लोगों के ''वो ''
से अलग एक और ''वो'' होते हो,
और इसी तीसरे ''वो'' को जानना ही
खुद को जानना है
तो हम क्यों नहीं जीते ,
उसी तीसरे ''वो'' के लिए,
जो न हमारा है ,
न लोगों का है ,
बल्कि वो बस ''वो'' है ,सच्चा ''वो'' ,
क्षितिज के अंतिम बिंदु पर बैठा ,
अकेला उदास सा धयानामग्न ,
प्रतीक्षारत ,राह ताकता, कि
''वो'' आएगा ,''वो'' कि तलाश में,
जीवन कि तलाश में ,
सच कि तलाश में ,
तुम्हारा--अनंत

बुधवार, नवंबर 24, 2010

तुने हमे ठुकराया है

तुने हमे ठुकराया है ,
हम हैं प्रेम पंथ पर चलने वाले ,
विरह अग्नि में जलने वाले,
अश्रु -कणों को नयन दबा कर ,फिर से अधर मुस्काया है ,
तुने हमे ठुकराया है ,
हम सूरज है ढलने वाले ,
हम शिला - खण्ड है गलने वाले,
बिन प्रेम प्राण इस जग जीवन में, कहाँ कोई जी पाया है ,
तुने हमे ठुकराया है ,
ओ! मेरे ह्रदय में पलने वाले ,
ओ! यथार्थ में न मिलने वाले ,
स्वप्नों में तुझको पा कर ,ये मन कैसे बौराया है
तुने हमे ठुकराया है ,
''तुम्हारा --अनंत''

मुझे छुओ मत जल जाओगे

मुझे छुओ मत जल जाओगे ,
तपन है कितनी ,दर्द है कितना ,
जलता है यहाँ तिनका -तिनका,
तुम मेरे पास न आओ प्यारे ,शोक अग्नि में गल जाओगे ,
मुझे छुओ मत जल जाओगे ,
कोई मुझे जला कर चला गया है ,
मुझे बड़े प्रेम से छला गया है ,
सब ढल जाते हैं इस आसमान में ,तुम भी इक दिन ढल जाओगे ,
मुझे छुओ मत जल जाओगे ,
मत कहो कि मैं कहूँ कहानी,
आँखों से फिर झरेगा पानी ,
पत्थर पिघला गाथा सुन कर ,तुम भी व्यर्थ पिघल जाओगे ,
मुझे छुओ मत जल जाओगे ,
''तुम्हारा -अनंत ''

तुम कितनी जल्दी बदल गए

तुम कितनी जल्दी बदल गए ,
बरगद की छाया सा शीतल ,
कितना प्यारा था तेरा आँचल ,
जिस दीपशिखा से मिली रौशनी ,उस दीप में सारे स्वप्न जल गए ,
तुम कितनी जल्दी बदल गए ,
कभी यहाँ रुके ,कभी वहाँ चले,
कभी उगे -उगे, कभी ढले -ढले ,
ये अनाथ यादों के जुगनू ,भटक -भटक कर पल गए ,
तुम कितनी जल्दी बदल गए ,
हम थोडा भी बदल न पाए ,
चाल बदल कर चल न पाए ,
हम ताक रहे थे नभ के तारे ,तुम उन्हें पकड़ने उछल गए ,
तुम कितनी जल्दी बदल गए ,
''तुम्हारा --अनंत ''

बहता दरिया

अब तो आँखों में इक लहर सी रहा करती है ,
जरा चूके कि झट से बहा करती है ,
पत्थर कहा करती थी ,दुनिया पहले मुझे ,
अब तो बहता हुआ दरिया कहा करती है ,
गुमसुम हैं ,उदास हैं ,
खुद से दूर हैं ,हम तेरे पास हैं ,
मंजर हैं बेरुखा
खार है लम्हों के बदन पर
कितनी खुशमुना हो जाती वो घड़ी
जब तू साथ रहा करती है ,
पत्थर कहा करती थी दुनिया पहले मुझे ,
अब तो बहता हुआ दरिया कहा करती है ,
इक पल भी कहाँ गुजरा है ,
कम्बख्त मुझे रुलाए बिना ,
तेरी यादों के मासूम सोते नहीं ,
इक ग़ज़ल सुनाए बिना ,
सुना देता हूँ जब ग़ज़ल ,
याद तेरी छाती से लिपट कर सोया करती है ,
पत्थर कहा करती थी, दुनिया पहले मुझे ,
अब तो बहता हुआ दरिया दरिया कहा करती है ,
लुका -छिपी कभी ,कभी दौड़ा-भागी का खेल ,
तेरी याद और मैं खेलते हैं,
दिल के आँगन में ,
देखता हूँ मैं तुझे दूर खड़ा हो कर ,झलकती है तू मुझे ,
मेरी यादों के बचपन में,
सुबह से शाम तलक ,मेरी रूह बस तुझे छुआ करती है ,
पत्थर कहा करती थी दुनिया पहले मुझे,
अब तो बहता हुआ, दरिया कहा करती है ,
प्यार कहते हैं किसे ,अभी तक न समझा हूँ मैं,
कुछ आस -पास है मेरे ,बस उसी में उलझा हूँ मै,
क्या यादों का ये बवंडर ,उलझनों -कशक ,
किसी क वास्ते ,धडकनों की धक् -धक् ,
प्यार है ...............
या खुदा !
ये प्यार भी क्या अजीब चीज हुआ करती है ,
पत्थर कहा करती थी दुनिया पहले मुझे ,
अब तो बहता हुआ दरिया कहा करती है ,
''तुम्हारा --अनंत ''

मंगलवार, नवंबर 23, 2010

मुझे तुमसे प्यार है, हाँ मुझे तुमसे प्यार है

बहुत दिनों से मैं चुप था ,खामोश था ,
मेरे भीतर का अरमान जमीदोश था,
आज हुआ क्या ये ,
ये कैसे हुआ उजाला ,
न जाने मैंने तुमसे कैसे कह डाला ,
मुझे तुमसे प्यार है, हाँ मुझे तुमसे प्यार है ,
यूँ देखता था तुम्हे,
बस तुम्हे देखता था ,
देख कर है हर बार ये सोचता था ,
कब आयेगा वो दिन जब कहूँगा दिल की बात,
लिख रहा हूँ जो ,मै ये आज की रात ,
मुझे तुमसे प्यार है,हाँ मुझे तुमसे प्यार है ,
तितलियों की पर की तरह,
नाजुक से दिल के ख्वाब थे ,
मै इक सियाह जहान था ,
तुम मेरे अफताब थे ,
तेरी इश्क की रौशनी में ,
मैंने दिल की दिवार पर लिख डाला ,
मुझे तुमसे प्यार है ,हाँ मुझे तुमसे प्यार है ,
''तुम्हारा --अनंत ''

शनिवार, नवंबर 20, 2010

बंधन

तोड़े नहीं टूटेगा ,दिल का है जो ये बंधन ,
इस बंधन से बंधा हुआ है ,तेरा मेरा जीवन ,
एक डोर  है हाँथ मेरे ,
एक डोर है हाँथ  तेरे ,
मैं तुझको खींच रहा  हूँ ,
तू रह -रह मुझको खींचे ,
कोई रोक नहीं सकता है ,
अब तेरा -मेरा मिलन ,
तोड़े नहीं टूटेगा ,दिल का है जो ये बंधन ,
इस बंधन से बंधा हुआ है ,तेरा मेरा जीवन ,
टूटेगी सांस मगर ,
रिस्ता नहीं टूटेगा ,
छूटेगा जग सारा ,
पर तेरा हाँथ न छूटेगा ,
प्रीत की डोर से है ,
बंधा, तेरा मेरा मन ,
तोड़े नहीं टूटेगा ,दिल का है जो ये बंधन ,
इस बंधन से बंधा हुआ है तेरा मेरा जीवन ,
हम अलग हो कर भी ,
अलग नहीं है रे ,
रूह है साथ हमारी ,
है साथ हमारी साँसे ,
मैं प्रेम बिम्ब हूँ प्रिये ,
और तुम हो प्रेम दर्पण ,
तोड़े नहीं टूटेगा ,दिल का है जो ये बंधन ,
इस बंधन से बंधा हुआ है तेरा मेरा जीवन ,
बरसेगी ख़ुशी जहाँ ,
मेघ प्रेम का बरसेगा ,
तृप्ति होगी वहां ,
न मन तेरा -मेरा तरसेगा,
उस स्वप्न महल की तुम छत हो जाना ,
और मैं हो जाऊँगा आँगन ,
तोड़े नहीं टूटेगा दिल का है जो ये बंधन ,
इस बंधन से बंधा हुआ है तेरा मेरा जीवन
''तुम्हारा ---अनंत ''

गुरुवार, नवंबर 18, 2010

वो तो बस एक गुलाब थी !!

वो तो बस एक गुलाब थी
ओस की बूंदों सी कोमल थी
तितली जैसी वो चंचल थी
मेरे अँधेरे स्वप्न नगर की ,वो एक मात्र आफताब थी
वो तो बस एक गुलाब थी

वो नदिओं की काटन थी
बर्फीली पहडीओं की मुस्कान थी
हम जिस प्रेम नगर के फर्श थे यारों ,वो उसकी मेहराब थी 
वो तो बस एक गुलाब थी

मैं अब तुमसे क्या बतलाऊँ
खोल के जिगर कैसे दिखलाऊँ
बस इतना सुन लो मेरे मुहं से ,वो तो बस लाजवाब थी 
वो तो बस एक गुलाब थी 

''तुम्हारा --अनंत ''

इस दिल में गम ही गम है यारों

इस दिल में गम ही गम है यारों ,
हँसते है हरदम, हम मुस्काते है,
झरनों सा बहते है इठलाते है ,
है अधरों पर मुस्कान हमारे , आँखे बिल्कुल नम है यारों ,
इस दिल में गम ही गम है यारों ,
हम उस पागल को खूब समझाते है ,
आंसू पोछ कर धीरज धरवाते है ,
पर कंहा मानता है वो पागल,मन तो आखिर मन है यारों ,
इस दिल में गम ही गम है यारों,
बहुत छला है हमे अपनों ने ,
हमे जला दिया है सपनो ने ,
मृत्यु मांगी जीवन पाया ,ये तो घोर सितम है यारों,
इस दिल में गम ही गम यारों ,
खंड -खंड कर तोड़ दिया है,
मेरी चाहत का गला मरोड़ दिया है ,
सच कहता हूँ यकीं मान लो ,ये वक़्त बहुत बेरहम है यारों ,
इस दिल में गम ही गम है यारों ,
''तुम्हारा --अनंत ''

मै तेरी याद में पागल हो जाऊँगा

मै तेरी याद में पागल हो जाऊँगा ,
दिल के जख्म पके हुये है ,
कदम रूह के थके हुये है ,
आंसू बरसाएगा जो ,मैं वो बादल हो जाऊँगा ,
मैं तेरी याद में पागल हो जाऊँगा ,
यादों की ये गरम हवा है,
जिसमे मेरा जिस्म जला है ,
जल कर रख बनूँगा ,या फिर तेरी आँखों का काजल हो जाऊँगा,
मैं तेरी याद में पागल हो जाऊँगा ,
अब तक तेरा इंतजार मैं करता हूँ ,
तेरी यादों में जीता हूँ ,मरता हूँ ,
तू जब गुजरेगी मेरी गली से ,मैं तेरे पांव का पायल हो जाऊँगा ,
मैं तेरी याद मे पागल हो जाऊँगा ,
मैं एक आजाद पछी था यारा ।
जिसे तुने निज नयन से मारा ,
मुझे पता था कि तेरी गली में जा कर, मैं घायल हो जाऊँगा ,
मैं तेरी याद में पागल हो जाऊँगा ,


''तुम्हारा --अनंत ''

मंगलवार, नवंबर 16, 2010

एहसास

मैं तो बस एक एहसास हूँ,
तितली कि पंखों की रंगत ,
चिड़ियों की कोमल सी हरकत ,
नदी ,पहाड़ी, जंगल ,झाड़ी जमीन और आकाश हूँ ,
मैं तो बस एक एहसास हूँ ,
मंदिर, मस्जिद,मुझे न देखो ,
देख सको तो खुद में देखो ,
क्यों दर-दर भटक रहे हो प्यारे ,मैं कब से तुम्हारे ही पास हूँ ,
मैं तो बस एक एहसास हूं,
लोग मुझे सागर कहते है ,
अल्लहा,ईसू नानक ,नटनागर कहते है ,
पर सच तो ये है मैं ,गरीबों की भूख और प्यास हूँ ,
मैं तो बस रक एहसास हूँ ,
''तुम्हारा --अनंत ''

सोमवार, नवंबर 15, 2010

मुझको बस याद तेरी ही आएगी

जब तक सांस चलेगी तन में 
मुझको बस याद तेरी ही आएगी
रोते रहेंगे नयन मेरे 
मेरी कलम बस प्रणय गीत ही गाएगी 
मुझको बस याद तेरी ही आएगी
जब-जब बहेगी शीत पवन
बजेगी पायल झन-झन 
केश उड़ेंगे लहर-लहर 
झूम के नाचेगा मेरा मन 
यादों के पर्दों के पीछे 
तू खड़ी- खड़ी मुस्काएगी 
मुझको बस याद तेरी ही आएगी 
मेरी कलम बस प्रणय गीत ही गाएगी

है अधरों पर तेरे मुस्कान 
जलते हैं मेरे अरमान 
जान रहे हैं एक दूजे को हम
फिर भी बनते है अनजान 
मैं तो मृत हो जांउगा
जब तू मुझे छोड़ कर जायेगी 
मुझको बस याद तेरी ही आएगी
मेरी कलम बस प्रणय गीत ही गाएगी 

तेरे बिना भी क्या जीवन है 
तू ही तो मेरा जीवन है 
साँसों के कण-कण में तू है
तू ही मेरी धड़कन है 
मैं तुझको तो भूल न पाऊंगा 
क्या तू मुझको भूल जायेगी 
मुझको बस याद तेरी ही आएगी 
मेरी कलम बस प्रणय गीत ही गाएगी 

जो जीते है वो मरने से कब डरते है 
चलने वाले गिरने से कब डरते है
जो महकाते है सारा उपवन 
वो पुष्प झरने से कब डरते है
मैं ईश्वर कि जगह तुझे पुकारूँगा 
जब मृत्यु मुझको लेने आएगी 
मुझको बस याद तेरी ही आएगी 
मेरी कलम बस प्रणय गीत ही गाएगी 

''तुम्हारा --अनंत ''

उसकी याद आई है

आज फिर से उसकी याद आयी है ,
शाम के आँचल मैं दर्द बिछा कर,
चारों तरफ अश्कों की बूँद सजा कर,
छेडी फिर से वही तान ,वही ग़ज़ल सुनाई है ,
आज फिर से उसकी याद आई है,

न जाने क्यों दुखता है मन ,
आँखों से बहता है सावन,
लोग भीगाते है अपनी काया ,मैंने अपनी रूह भिगाई है,
आज फिर से उसकी याद आई है ,

मै बोल रहा था वो शांत खडी थी,
मैं बहा पड़ा था वो अड़ी खडी थी ,
उसने चुप रह कर, मेरे प्रेम की हंसी उड़ाई है,
आज फिर से उसकी याद आई है ,

मैंने सुना था अनमोल प्यार है ,
प्यार ही जीवन का आधार है,
पर उसने मेरे प्रेम की, कैसी बोली लगाई है
आज फिर से उसकी याद आई है ,

मेरे दर्द को कविता कहने वालों ,
मेरी अश्रु -धार में बहने वालों ,
सुन कर मेरी व्यथा -कथा ,तुम्हारी भी आँखे भर आँई है ,
आज फिर से उसकी याद आई है ,

''तुम्हारा --अनंत ''

मत रोको मुझे कह लेने दो

मत रोको मुझे कह लेने दो ,
कुछ उफान सा है भीतर ,
मन मेरा है बिलकुल जर्जर ,
बन गया हूँ अश्रु -नदी मै यारों,मुझको अब तुम बह लेने दो ,
मत रोको मुझे कह लेने दो,
तुम मुझपे दया क्यों करते हो,
मेरे खातिर तुम आँहें क्यों भरते हो ,
ये प्रेम का मीठा दर्द है प्यारे ,मुझको हंस कर सह लेने दो ,
मत रोको मुझे कह लेने दो ,
कल नवीन जब सूर्य उगेगा ,
ये अनंत तब नहीं रहेगा ,
मैं बुझा हुआ दीपक हूं यारों ,मुझको अपने दिल में रह लेने दो ,
मत रोको मुझे कह लेने दो ,
''तुम्हारा --अनंत ''

मन करता है खुल कर रो लूं



मन करता है खुल कर रो लूं ,
कब तक दर्द दबे दिल में,
कब तक नाव रहे साहिल में ,
बूँद बने- बने जी ऊबा है, मन करता है सागर हो लूं ,
मन करता है खुल कर रो लूं
ये यादों का बोझ निराला है ,
बड़ी मुस्किल से इसे संभाला है ,
जब तक जीवन बाकी है ,तब तक इसको हंस कर ढो लूं ,
मन करता है खुल कर रो लूं ,
सब नहा रहे मुझमे आ कर,
मै सूखा पड़ा हूँ सागर हो कर ,
कोई मुझपे बरसे ऐसा कि, अपना तन- मन आज भिगो लूं ,
मन करता है खुल कर रो लूं ,

                               '' तुम्हारा --अनंत ''

शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

तुम हमे सहारा मत देना

तुम हमें सहारा मत देना ,

हम रज ढेर बने उड़े पवन में ,

बन कर तिनका हम जले अगन में ,

जब हम गुजरे तेरे नगर से, तू हमे गुजरा मत देना,

तुम हमे सहारा मत देना,

हम राह पड़े है पाहन से ,

तुम हमे देखते घर के आँगन से ,

प्यासा कंठ हमारा है पर ,तुम हमे झूठे प्रेम कि धरा मत देना ,

तुम हमें सहारा मत देना ,

जीवित है हम बेमन से ,

हम ऊब गए है जीवन से ,

देख लिया है हमने तेरा सत्य रूप ,अब दरश दुबारा मत देना ,

तुम हमे सहारा मत देना,

''तुम्हारा--अनंत''

चुभती है मुस्कान तुम्हारी

चुभती है मुस्कान तुम्हारी ,
सत्य प्रेम निर्मल जल से ,
तट मन का गुंजित कल कल से ,
कट गए प्रेम के पंख प्रिये ,निरस्त हुई उड़ान हमारी ,
चुभती है मुस्कान तुम्हारी ,
हम भटके प्रेम पंथ पर पागल से ,
हम रह -रह बरसे बादल से ,
प्रेम नगर में लूटे हुये ,राही सी है पहचान हमारी ,
चुभती है मुस्कान तुम्हारी,
नयन झरे अश्रु ढल मल से ,
कोई इन्हें पोंछ दे आँचल से,
कोई धीरे से प्रेमाघात लगा दे ,हंस कर निकले जान हमारी ,
चुभती है मुस्कान तुम्हारी ,
''तुम्हारा--अनंत ''

जैसा था तुमसे कह डाला

जैसा था तुमसे कह डाला ,
जीवन का अंधकार दिखया,
गुण दिखलाये ,विकार दिखाया ,
विधि कर कर न कष्ट शेष कोई ,जितना था सब कष्ट सह डाला,
जैसा था तुमसे कह डाला,
मन कहे तो मुझसे मिलना साथी ,
वरना निरीह मलूँगा छाती ,
अब और युद्ध न होगा मुझसे ,लो देखो हथियार ये डाला,
जैसा था तुमसे कह डाला ,
टूटी सितार का नाद बना मैं ,
उदास आँखों में ठहरा विषाद बना मैं ,
कुछ तो है तुझमे जो तुने ,मुझमे फिर से नवीन लय डाला ,
जैसा था तुमसे कह डाला ,
'' तुम्हारा --अनंत''

गुरुवार, नवंबर 11, 2010

बहुत दिनों के बाद लिखने बैठा हूँ ,

बहुत दिनों के बाद लिखने बैठा हूँ ,
तेरी स्मृतियों ने खूब सताया ,
मुझको रह -रह कर तडपाया,
जो दिल कि बात दबी थी अब तक ,मैं उसको कहने बैठा हूँ ,
बहुत दिनों के बाद लिखने बैठा हूँ ,
रुका- रुका सा जग सारा है ,
रुकी हवा है ,रुकी नदी कि धारा है ,
पर मुझको देखो मैं पागल, सहरा मैं बहने बैठा हूँ ,
बहुत दिनों के बाद लिखने बिठा हूँ ,
तू किसी और की हो कर चली गयी ,
मेरी साँची प्रीत यूं ही छली गयी ,
पर इन्तजार के मंडप में ,मैं जोड़ी -जामा पहने बैठा हूँ ,
बहुत दिनों के बाद लिखने बैठा हूँ ,
''तुम्हारा --अनंत ''

न कहो मुझे गाने के लिए

न कहो मुझे गाने के लिए ,
वो शाम अभी भी याद मुझे है ,
जिस शाम हम तुझे समझे है ,
थोडा वक़्त लगेगा साथी, वो रूप तेरा भुलाने के लिए ,
न कहो मुझे गाने के लिए ,
बहुत दूर मैं चला गया हूँ ,
मै अपनों से छला गया हूँ ,
अब कोई वजह बाकि ही नहीं है ,वापस मुड कर आने के लिए ,
न कहो मुझे गाने के लिए ,
जी भर गया मेरा आब जमीन से ,
ऊब चूका हूँ अब दुनिया और दीन से,
उडूँगा अब जब आश्मान में ,ये छोटा पड़ जायेगा उड़ने के लिए ,
न कहो मुझे गाने के लिए ,
''तुम्हारा --अनंत ''

मै बिलकुल ही टूट गया था

मै बिलकुल ही टूट गया था
शब्द विफल थे,भाव निशब्द थे ,
स्वप्न मेरे सब स्तब्ध थे ,
मै किससे कहता बात ह्रदय की ,जब साथी मेरा रूठ गया था ,
मैं बिलकुल ही टूट गया था ,
कुछ पा कर मैंने खोया था ,
मैं उस दिन सारी रात रोया था ,
वक़्त के एक धक्के से उसका हाँथ, मेरे हांथों से छूट गया था ,
मैं बिलकुल ही टूट गया था
मैं प्रेम गली में ठगा खड़ा था,
मेरा टूटा दिल यंहा- वहाँ पड़ा था ,
कोई आपना था जो मुझको, बहला फुसला कर लूट गया था,
मैं बिलकुल ही टूट गया था ,
''तुम्हारा --अनंत''