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गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

उजाला दर्द है...... दर्द उजाला है

अँधेरे में ख़ामोशी ओढ़ बैठा उजाला,
कलम थाम कर कुछ लिख रहा है,
रगों के लहू और जिस्म के पसीने को,
कलम में भर  कर,
वो दिलों में बह रहा है,
गजलों के शेरों में उजाला पेवस्त है,
भूख चबाये दर्द पिए वो अलमस्त है,
चादर मजार पर पड़ी है उजाले की,
शहर की चौक पर उजाला घुट रहा है,

कमर पर लटके बच्चे के रोने की आवाज़,
माथे पर चुह्चुहाते लाल सिन्दूर की टपकन,
और पैर में पड़े पायल की आवाज़ ,
रचते है एक कोलाज,
जिसकी सूरत मिलती है द्रोपदी से,
शायद उजाला देखना  चाहता है,
महाभारत फिर से,
कर रक्खी  है बगावत उजाले ने,
वो बागी बना भटक रहा है,
जीते हैं सब हंसी में उजाला ग़मों का शौक़ीन  है,
ख़ामोशी की इस गहरी खाई में,
लिथड़ा पड़ा उजाला,
हर ग़मगीन आवाज़ में घुल कर बोल रहा है ,

उजाला दर्द है...... दर्द उजाला है    

तुम्हारा--अनंत

इंसान बारूद है........

इंसान फूट पड़ता है,
धमाके के साथ,
इंसान बारूद है,

ये बारूद चिंगारियों से नहीं दगता,
ज्वालामुखी के लावों से भी नहीं,
आग की सुनामी भी पचा जाता है ये,
ये बारूद जुल्म की इंतहाँ से फूट पड़ता है,
इंसान फूट पड़ता है,
धमाके के साथ,
इंसान बारूद है,

बारूद सीलन से ख़राब हो जाता है,
सीलन ख़ामोशी है,
चुप्पी है,
डर है,
दब्बूपन है,
मौन है,
सुरक्षा के लिए आकुलता है,

सीलन बढ़ रही है वतन में,
मुझे डर है,
कि कहीं वतन का सारा बारूद ख़राब न हो जाए,
और मैं फिर कभी  न कह पाऊँ कि......
 
इंसान  फूट पड़ता है,
धमाके के साथ,
इंसान बारूद है,
 
तुम्हारा --अनंत