GA-4

बुधवार, सितंबर 10, 2014

तुम सिगरेट की तरह, बहुत बाद में आई मेरी जिंदगी में

तुम सिगरेट की तरह
बहुत बाद में आई मेरी जिंदगी में
और मौत की तरह
सबसे बाद में जाओगी शायद

तुम्हारे आने के बाद
और जाने से पहले का समय
धुएँ के शहर में,
रास्ता भूला हुआ समय है
जिसकी पीठ पर कांटे
और पांवों में पर्वत उग आयें हैं

इस समय
मैं न एक कदम चल पाता हूँ
न एक नींद सो पाता हूँ
मैं बस वहीँ खड़ा हूँ
जहाँ से, तुम्हारी बालकनी दिखती है
पर तुम नहीं दीखती

मैं तुम्हे याद करना चाहता हूँ
तो अपनी पैदाइश का शहर भूल जाता हूँ
और जब तुम्हे चूमना चाहता हूँ
तो कोई मेरी नसें काट देता है
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
तो खुद से नफ़रत कर बैठता हूँ
और जब तुमसे नफ़रत करना चाहता हूँ
तो मर जाने का मन करता है

पंखों पर लटकती, नदियों में डूबी
और जहर से नीली पड़ीं, प्रेमियों की लाशों ने मुझसे कहा था-
कि उन्हें कवितायेँ लिखनी नहीं आतीं थी
और कवितायेँ लिखने वालों ने कहा था-
कवितायेँ लिखना, मौत को जीने की तरह ही होता है

मंदिरों में पत्थरों को पूजतीं लड़कियां, पत्थर होतीं हैं
तुम भी एक पत्थर थी
सिगरेट की तरह ख़तरनाक पत्थर

तुम्हे जिसने भी बनाया है
उस पर मुक़दमा होना चाहिए
क्योंकि उसने नहीं लिखा तुम्हारे माथे पर
“तुम्हे पीना जानलेवा हो सकता है”
जैसे लिखा होता है सिगरेट पर

पीता तो मैं तुम्हे फिर भी
पर एक तस्सल्ली होती
कि तुमने बताया था, पहले ही
कि तुम जान ले लोगी

अब जब मैं तुम्हे पिए बैठा हूँ
धुएँ से घिरे समय में, भटकते हुए  
अपनी कटीं नसों से बातें कर रहा हूँ
और बस यही सोचता हूँ
कि न जाने कितने और मरेंगे
तुम्हारे नूर के ज़हर से
न जाने कितने और मरेंगे
बिना ये जाने कि उनका मरना बिलकुल तय है

तुम्हारा-अनंत  


गुरुवार, सितंबर 04, 2014

काश तुम साथ होती !

तुम साथ होती तो 
बारिश की बूँदों को हम पढ़ सकते थे
बात कर सकते थे 
खामोश रास्तों और गुमसुम पेडों से 

तुम साथ होती तो 
जाडे की हथेलियों पर मैं कविताएं लिख सकता था 
और तुम हवाओं की देह मे घुली 
ओस की बूँद पर बाँचती उन्हें 

तुम साथ होती तो 
दिन मे अड़तालीस बार हँसते हम 
और हमारा जीवन छानबे गुना बढ़ जाता

तुम साथ होती तो 
हम मृत्यु से करते मजाक
और मृत्यु, शरमा कर कहती 
तुम लोग बड़े शरारती हो 
अब ऐसा मजाक उड़ाओगे 
तो मैं फिर कभी नहीं आउंगी 

तुम साथ होती तो 
सुबह की अलमस्त अंगड़ाई से 
निकलता प्रेम का अखण्डकाव्य 
और हम उसे जीवन के सितार पर 
गाते रहते जीवन भर 

तुम साथ होती तो 
मैं कुछ न सोचता
कुछ न लिखता 
कुछ न बोलता
बस जीता रहता मैं तुम्हे  
और तुम जीती रहती मुझे 
बरसते रहेते अनवरत बादल खिड़की से बाहर 
और हम खिड़की पर खड़े 
चिड़ियों की तरह बातें करते 

तुम साथ होती तो 
ये सारी कल्पनायें सच होतीं 
ये जो जिंदगी जैसी, जिंदगी है 
ये असल में जिंदगी होती 

काश तुम साथ होती !

तुम्हारा- अनंत 

सूफ़ी और काफिर !!

जैसे अता करते हैं रोज पाँच वक्त नमाज़, नियम से 
वैसे ही वो मुझे धोखा देती है 
रोज पाँच वक्त, नियम से 

मैं हर धोखे के साथ हंसता हूँ
वो हर धोखे के साथ रोती है 
मैं हर धोखे के साथ सूफ़ी होता जाता हूँ 
वो हर धोखे के साथ काफिर होती जाती है  

आएगी जब कयामत मारे जायेंगे 
काफिर और सूफ़ी दोनों ही 

पर सूफियों की बनेगी मज़ार 
जिन पर लोग मुहब्बत की दुआएें मागेंगे 
और काफिर को पत्थरों से मार कर 
लोग भूल जायेंगे कि उन्होने किसी का कत्ल भी किया है 

मैं अपनी और उसकी मौत जब देखता हूँ 
तो बस यही सवाल गूंजता है 
कि वो मुझे सूफ़ी 
और खुद को काफिर क्यों बना रही है ? 

तुम्हारा अनंत 

मंगलवार, सितंबर 02, 2014

इससे पहले कि

घोड़े जैसे मुंह वाला ये समय
चींटी से भी धीमा चल रहा है, मेरे लिए
हो सकता है तुम्हारे लिए ये समय
गति की परिभाषा हो
और तुम हर पल में सदियाँ जी रहे हो

खैर इससे पहले कि
आदमी भाप बन जाएँ
उनकी चिंताएं, सवाल और दर्द
दर्ज कर लिए जाएँ

उनकी आँखों में
आइना उतरने से पहले
हम अपनी-अपनी तस्वीरें देख लें
वर्ना आइनों के झूठ को हम सच कहेंगें
और सच दूर खड़ा होकर रोयेगा
किसी गूंगे बच्चे की तरह

इससे पहले कि
आदमी सीढ़ियों से उतर कर
नदी बन जाए
उनसे पूछ लिया जाना चाहिए
क्या इसके अलवा उनके पास कोई और विकल्प नहीं है
और सीढियों से उतरना और नदी बनना क्या इतना जरूरी है
कि जीवन की परिभाषा में क्रांति करनी पड़े

तुम्हारे और हमारे समय में
इतना अंतर है कि
तुम जिन्हें इंसान समझते हो
वो हमारे लिए मशीन और जानवर हैं
और जिन्हें हम इंसान समझते हैं
उन्हें तुम कुछ समझते ही नहीं

खैर जंगलों में बजते गीतों में आग लगे
और जलते हुए लोग चलें आयें शहर की ओर
तुम आदमी को आदमी की तरह देखो
इससे पहले कि
तुम्हारी बनाई सारी आकृतियाँ टूटें
तुम अपनी रेखाओं, त्रिभुजों, वृतों और चतुर्भुजों की परिभाषाएं और माप सुधार लो
और कहो कि जीवन गलतियाँ सुधारने का दुसरा नाम है

खेत-खलियान, जंगल और जमीन
कल-कारखाने, दुखिया और दीन
नहीं रह सकते अब बहस से बाहर

इसलिए इससे पहले कि
तुम्हारी भाषा के गोल महल में
भटकतीं आत्माएं और व्यथाएं
बगावत कर दें
तुम उतार कर फेंक दो, अपना मुकुट
अपना सिंहासन जला दो
और त्याग दो शाही वस्त्र
और कहो कि
मुझे मंजूर है आदिम बराबरी

और यदि नहीं करते तुम ऐसा
तो समय का चेहरा बदल दिया जायेगा
आदमी सीढियों से उतर कर
नदी बनकर बहेगा
और जीवन की परिभाषा में क्रांति कर दी जाएगी

उस वक़्त तुम नहीं होगे वहाँ
याद करने के लिए
मेरी चेतावनियाँ और भविष्यवाणियाँ
 तुम्हारा-अनंत 

ये जाना है प्रेमी ने, प्रेम करके

वक़्त के हांथो मजबूर प्रेमी
समय का सबसे बड़ा दुश्मन होता है
वो समय को पूरी तरह नष्ट कर देना चाहता है
इसीलिए वो एकांत से बातें करता है
और चाँद की ओर देख कर उदास हो जाता है
वो कमरे की बत्तियां बुझा देता है
और कभी कुछ नहीं करता

एकांत से बातें करने
चाँद को देख कर उदास होने
और अँधेरे में पड़े रहकर, कुछ न करने से
समय नष्ट हो जाता है
ये प्रेमी ने जाना है, प्रेम करके

प्रेम करने के बाद
आत्मा की भाषा बदल जाती है
और उसे अनुवाद और अनुवादक की जरुरत पड़ती है
पर यदि अनुवादक मना करदे, अनुवाद करने से
तो अपनी ही आत्मा अनजान सी लगती है
और प्रेमी कैद हो जाता है, अपनी ही देह में
एक परग्रही आत्मा के साथ

कितना दुखद होता है
अपनी ही देह में
अपनी ही आत्मा को परग्रही होते हुए देखना
ये प्रेमी ने जाना है, प्रेम करके

प्रेमी के दिल में, हर वक़्त
नीलाम होते घर की किसी दीवार पर पड़े जाले सा भाव उमड़ता है
और आस-पास की आक्सीजन एकदम ख़तम कर देता है
ऐसे समय में कविता लिखना, जीते रहने का एकमात्र विकल्प है
इस तरह दुनिया में जितने कवि है
वो सभी जीने की विवशता में
कविता को पी रहें हैं
और बस इसी तरह जी रहें हैं

अतः कवि होने की एकमात्र कसौटी
मृत्यु को नकार कर जीना है
और आक्सीजन की जगह, कविताओं को पीना है

एक कोमल कहानी ख़त्म होने से पहले
कई बार आंसुओं से नहाती है
बिना आक्सीजन के जीते हुए कवितायेँ लिखती है
और प्रेमी को ये बताती है
कि शब्द सिर्फ बोलने के लिए ही नहीं हैं
जीने के लिए भी हैं

शब्द कैसे कविता
और कविता कैसे जीवन बनती है
ये जाना है प्रेमी ने, प्रेम करके


तुम्हारा-अनंत  

जहाँ “कुछ” नहीं है, वहां “कुछ नहीं” है !!

खाली जगह में भरे हुए एकांत को
जब जब महसूसा है
मुस्कुराया हूँ मैं
और कहा है खुद से
जहाँ “कुछ” नहीं है
वहां “कुछ नहीं” है

“कुछ” के चले जाने के बाद
“कुछ नहीं” बचता है “कुछ” की जगह में
और इस “कुछ नहीं” में
होतीं हैं “कुछ” की यादें
उसकी हंसी, उसका गुस्सा
उसका पागलपन, उसका नशा
उसकी चूड़ियों की खनक
उसके बालों की महक
उसकी पायल की झंकार
उसकी गीली-गीली पुकार

अँधेरे से कमरे में
अवसाद के बगल में
“कुछ नहीं” की शक्ल में
एकांत के बिस्तर पर
ऊब की उंगलियाँ फोड़ते हुए   
“कुछ नहीं” पड़ा रहता है, सातों दिन
कुछ नहीं करते हुए

“कुछ नहीं” कुछ इस तरह बात करता है मुझसे
कि और किसी को आजकल सुन ही नहीं पाता मैं
दुनिया की सारी आवाजें भाप बन जातीं हैं
जब “कुछ नहीं” उगता है सूरज की तरह
मेर ज़हन के हर एक कोने से

मैं एक टूटी हुई राग हाँथ में उठता हूँ
उस पर गिरह पर गिरह लगता हूँ
और जब गाने की कोशिश करता हूँ
तो मेरे शब्द उदास और आवाज़ घायल हो जाती है

मेरा मन करता है
कि मैं किनारों के संवाद को लिखूं
और नदियों के मौन को सहलाऊं

दो पहाड़ियों के बीच की खाई में
भरी हुई हवा से पूछूँ
कि कैसा लगता है उसे
जब रोतीं है पहाड़ियां
होतीं हैं उदास
और लिखतीं हैं, कोहरों के बदन पर कविताएँ

मन करता हैं
पूछूँ, उस आदिम मौन से
कि कैसे उसने शब्दों के समंदर को
अनुशासन पढ़ाया है

मन करता है
पूछूँ, सूनसान रास्तों से
कि कौन सा मुसाफिर
उन्हें यहाँ तक ले कर आया है

मन करता है
मैं इस तरह खामोश रहूँ
कि आवाज परिभाषित हो, मेरी ख़ामोशी से
और विश्व भर की भाषाओँ को
मेरी शांति के सहारे की जरुरत पड़े

मैं जानता हूँ
कि उदास रहना कितना ख़तरनाक है
इस उदास समय में 
और मैं ये भी जानता हूँ
कि मेरी एक सांस और दूसरी सांस के बीच
सिवाय उदासी के “कुछ नहीं” है

“कुछ नहीं” जब करवट लेता है
मैं उदासी की एक गोली खा लेता हूँ
दूसरी करवट पर, दूसरी गोली

“कुछ नहीं” की हर हलचल के साथ
मैं उदासी की एक गोली खाता हूँ
इसतरह मैं उदासी का मरीज हूँ
और उदासी ही मेरी दवा है

कितना अजीब होता है न
मरीज, मर्ज और दवा का रिश्ता
अनंत भुजाओं वाले त्रिभुज की तरह
फैला होता है, जीवन के हर कोने तक
हर कण तक

बिना मरीज के मर्ज नहीं
बिना मर्ज के, दवा का क्या काम?
कितना प्रेम है न, तीनों में
कितना सामंजस्य है
एक के बिना दुसरे का कोई अस्तित्व नहीं
जहाँ एक नहीं, वहाँ दूसरा नहीं

मैं सोचता हूँ
मरीज, मर्ज और दवा ही जीवन का अकाट्य सत्य है
ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे लिए ईश्वर है
और मेरे लिए मृत्यू

जब सोचता हूँ मैं ये सब
“कुछ” हँसता है, मेरे भीतर और पूछता है
क्यों परेशान हो ? क्या हुआ ?
मैं कहता हूँ
“कुछ नहीं”

“कुछ” चला जाता है
और “कुछ नहीं” रह जाता है
“कुछ” की जगह पर


तुम्हारा-अनंत