GA-4

मंगलवार, सितंबर 02, 2014

जहाँ “कुछ” नहीं है, वहां “कुछ नहीं” है !!

खाली जगह में भरे हुए एकांत को
जब जब महसूसा है
मुस्कुराया हूँ मैं
और कहा है खुद से
जहाँ “कुछ” नहीं है
वहां “कुछ नहीं” है

“कुछ” के चले जाने के बाद
“कुछ नहीं” बचता है “कुछ” की जगह में
और इस “कुछ नहीं” में
होतीं हैं “कुछ” की यादें
उसकी हंसी, उसका गुस्सा
उसका पागलपन, उसका नशा
उसकी चूड़ियों की खनक
उसके बालों की महक
उसकी पायल की झंकार
उसकी गीली-गीली पुकार

अँधेरे से कमरे में
अवसाद के बगल में
“कुछ नहीं” की शक्ल में
एकांत के बिस्तर पर
ऊब की उंगलियाँ फोड़ते हुए   
“कुछ नहीं” पड़ा रहता है, सातों दिन
कुछ नहीं करते हुए

“कुछ नहीं” कुछ इस तरह बात करता है मुझसे
कि और किसी को आजकल सुन ही नहीं पाता मैं
दुनिया की सारी आवाजें भाप बन जातीं हैं
जब “कुछ नहीं” उगता है सूरज की तरह
मेर ज़हन के हर एक कोने से

मैं एक टूटी हुई राग हाँथ में उठता हूँ
उस पर गिरह पर गिरह लगता हूँ
और जब गाने की कोशिश करता हूँ
तो मेरे शब्द उदास और आवाज़ घायल हो जाती है

मेरा मन करता है
कि मैं किनारों के संवाद को लिखूं
और नदियों के मौन को सहलाऊं

दो पहाड़ियों के बीच की खाई में
भरी हुई हवा से पूछूँ
कि कैसा लगता है उसे
जब रोतीं है पहाड़ियां
होतीं हैं उदास
और लिखतीं हैं, कोहरों के बदन पर कविताएँ

मन करता हैं
पूछूँ, उस आदिम मौन से
कि कैसे उसने शब्दों के समंदर को
अनुशासन पढ़ाया है

मन करता है
पूछूँ, सूनसान रास्तों से
कि कौन सा मुसाफिर
उन्हें यहाँ तक ले कर आया है

मन करता है
मैं इस तरह खामोश रहूँ
कि आवाज परिभाषित हो, मेरी ख़ामोशी से
और विश्व भर की भाषाओँ को
मेरी शांति के सहारे की जरुरत पड़े

मैं जानता हूँ
कि उदास रहना कितना ख़तरनाक है
इस उदास समय में 
और मैं ये भी जानता हूँ
कि मेरी एक सांस और दूसरी सांस के बीच
सिवाय उदासी के “कुछ नहीं” है

“कुछ नहीं” जब करवट लेता है
मैं उदासी की एक गोली खा लेता हूँ
दूसरी करवट पर, दूसरी गोली

“कुछ नहीं” की हर हलचल के साथ
मैं उदासी की एक गोली खाता हूँ
इसतरह मैं उदासी का मरीज हूँ
और उदासी ही मेरी दवा है

कितना अजीब होता है न
मरीज, मर्ज और दवा का रिश्ता
अनंत भुजाओं वाले त्रिभुज की तरह
फैला होता है, जीवन के हर कोने तक
हर कण तक

बिना मरीज के मर्ज नहीं
बिना मर्ज के, दवा का क्या काम?
कितना प्रेम है न, तीनों में
कितना सामंजस्य है
एक के बिना दुसरे का कोई अस्तित्व नहीं
जहाँ एक नहीं, वहाँ दूसरा नहीं

मैं सोचता हूँ
मरीज, मर्ज और दवा ही जीवन का अकाट्य सत्य है
ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे लिए ईश्वर है
और मेरे लिए मृत्यू

जब सोचता हूँ मैं ये सब
“कुछ” हँसता है, मेरे भीतर और पूछता है
क्यों परेशान हो ? क्या हुआ ?
मैं कहता हूँ
“कुछ नहीं”

“कुछ” चला जाता है
और “कुछ नहीं” रह जाता है
“कुछ” की जगह पर


तुम्हारा-अनंत 

सोमवार, सितंबर 01, 2014

प्यार, इंसान, कुत्ता और भगवान !!

तुम्हारी आँखों ने मुझे मारा
और मैंने मृत्यु को जिया जीवन की तरह
सांस के अंतिम हिस्से में
जब काँच करकता था  
तो मैं तुम्हारा नाम लेता था
और तुम थोडा सा भगवान हो जाती थी
और मैं थोडा सा कुत्ता!

प्यार
इंसान, कुत्ते और भगवान को
इंसान, कुत्ता और भगवान बनाता है

उदासी के आठवें प्रहर में
मैंने लिखा ये डायरी में
और लिखते ही उड़ गए शब्द
आकाश में नहीं, पाताल में

मैं तनहा पड़ा था
और तुम बह रही थी, आँखों से
कविता की तलाश में
भटकता कोई आदिम फ़कीर, मुझे देखता
तो चूमता हज़ार बार
और मैं सोचता रहता, तुम्हारे बारे में
जैसे कोई भूखा सोचता है
रोटी के बारे में

तुम खुद को खोदना कभी
तुम्हारी अंतिम तह में
मैं दबा हूँ, साबूत
तुम्हे मालूम है या नहीं
मैं नहीं जानता
पर मैं मरा नहीं हूँ
जिन्दा हूँ वहाँ
इतना पता है मुझे

वहीँ से आती है मुझे साँसें
और वहीँ धड़कता है मेरा दिल
बाकी सब धोखा है
तुम्हारी 'न' में सोई हुई मौत
और मेरी 'हाँ' में जागती जिंदगी
सब धोखा है !

तुम्हारा-अनंत  

शनिवार, अगस्त 30, 2014

लोकतंत्र का त्रिभुज और कविता !!

मेरी चुप पर
एक चांप लगा कर
बनाया तुमने लोकतंत्र का त्रिभुज
जिसके एक बिंदु पर संविधान है
दुसरे पर संसद
और तीसरे पर
संविधान और संसद के जने भ्रम हैं 


संविधान, संसद और भ्रमों से घिरा आदमी
केंद्र में बैठ कर हाशिए को गा रहा है
और मेरे भीतर का कवि
इन सब के नंगे चेहरे को आइना दिखा रहा है
इन्हें इनकी जगह से हटा कर
कविताएँ बैठा रहा है
इसलिए मेरी कविताओं के सर पर सींग
और नाखूनों में बघनहे उग आए हैं

ये कविताएँ प्रेमिकाओं की जगह
माओं के काम आएँगी
जंगलों में लड़ेंगीं, गोलियां चलाएंगी
और जब तुम मासूक और मौसम की बात करोगे
तो तुम्हे और तुम्हारी बातों को घसीट कर
भूख और भात की ओर ले आएंगी


तुम्हारा—अनंत 

गुरुवार, अगस्त 21, 2014

भाषा के अँधेरे कमरे में...!!

कांटो की कोख से पत्तियां चुरा कर खाने की कला
सिर्फ और सिर्फ बकरियों के पास ही है
इसीलिए काँटों के इस जंगल में वो जिन्दा हैं
तबतक, जबतक किसी को भूख न लगे

जब वो काटीं जाती हैं
तो हिंदी सिनेमा के गाने, देशप्रेम से पाट दिए जाते हैं
और हज़ार चेहरे वाले लोग
गोल गुम्बद के ऊपर मेला सजाते हैं
उनकी आँखों में आंसू
और होंठो पर मुस्कान एक साथ रह सकती है
वो किसी भी समय राष्ट्रगान गा सकते हैं

वो इतने माहिर हैं कि
संविधान उनके सामने
भीड़ में खोये हुए बच्चों की तरह रोता है
और वो भाषा के अँधेरे कमरे में
संविधान का चेहरा चूम कर नीला कर देते हैं

स्कूल जाने वाले बच्चों को
नागरिक शास्त्र की मशीन में झोका जा रहा है
और जब वो बाहर निकलते हैं
तो उनके पाँवों में पहिए जड़े होते हैं
उनके दिमाग में कुछ रंगीन सा हमेशा रेंगता रहता है
वो तेज़ाब को पानी कहते हैं
और आंसूं के चेहरे पर थूक देते हैं
गैर इरादतन ही मारते हैं सैकड़ों तितलियाँ
पक्षियों का पंख उखाड कर हँसते हैं
और जब वो देश का नाम लेते हैं
तो शर्म आती है भूखे लोगों को

उनकी जमीन और सपनों की परिभाषा में
सम्भोग महकता है
जब वो खेलते हैं कोई खेल
तो अश्लीलता हँसती है
और उनकी हथेली पर नाचने लगते हैं, सातों दिन, नंगे ही

चौराहों पर बात करते हुए लोग
अफवाहों को सांस समझ बैठे हैं
अगर अफवाह न हो तो वो खुद को मरा
और देश को उजड़ा हुआ मान बैठेंगे
इसलिए अफवाहों की फैक्ट्री
हर दिमाग में लगाने की परियोजना पर काम तेजी से चल रहा है
हर पढ़ा-लिखा आदमी खुद अफवाह में बदल रहा है

मैं जब उनसे कहता हूँ, भूख
तो वो फसल सुनते है
मैं जब दर्द कहता हूँ
तो वो मुझे देख ही नहीं पाते
मेरे शरीर में भाप और कांच घुलकर बहते हैं
और मैं न चाहते हुए भी पारदर्शी हो जाता हूँ
सब साफ़ दीखता है आरपार
मेरे भीतर का किसी को कुछ नहीं दीखता
जहाँ एक कैंसर दिनरात शतरंज खेलता रहता है

यहाँ जिन लोगों के हांथों में  देश है
उन्होंने इसे आड़ा, तिरछा, सीधा, उल्टा
हर तरह से गाया है
गाँधी उनके लिए गाय हैं
और भगत सिंह भात
उन्हें जब भी मौका मिला
या भूख लगी है
उन्होंने गाय का मांस और भात
खूब चाव से खाया है

थप्पड़ खाए हुए किसी आदमी की सूरत से
टपकते चावल के माढ पर
भिनभिनाती हुई मख्खियों की बोली में
मैंने प्रेम गीत सुना है
पर जब जब दुहराना चाह है उसे
लोगों ने कहा कि
मैं पलायन गीत गा रहा हूँ

मैं उस वक्त खुद को
किसी एक्सप्रेस रेल के जनरल डिब्बे में
टॉयलेट के पास गठरी सा पड़ा पाता हूँ
मेरे हांथों में एक पॉलिथीन होती है
जिसमे बाप की चिंताओं की पूरी
और माँ के आंसुओं का आचार होता है
मैं उसे खाता हूँ
और भिनभिनाती हुई मख्खियों की तरह गाता हूँ

छोटे कस्बों और गांवों का प्यार
चेहरों पर आंसुओं का दाग बन कर रह जाता है
महानगरों और शहरों का प्यार
किसी रात बेडशीट पर बहता है
और फिर लॉन्ड्री में धुल कर
फिर से बिछ जाता है

मैं इन सब के बीच
खुद की और अपनी कविता की पहचान तलाशता रहता हूँ
कभी लगता है, मैं और मेरी कविता
किसी महंगी दवा का अजीब ट्रेडमार हैं
और कभी लगता है
नंगे पैर बहुत दूर से आ रहे किसी आदमी के पैरों की बवाई

तुम्हारा -अनंत

मंगलवार, अगस्त 19, 2014

तो तुम मुझसे प्यार कर रहे होते !

अंधे जुगनुओं की बाढ़ में
डूबकर मरे सूरज की लाश पर
रोते हुए अधमरे दीपकों को
अगर तुम सुन सकते
तो तुम्हे पता चलता
कि प्रेम की सबसे सफल परिभाषा
कराहों का कोलाज ही है !

उलझे हुए भीतचित्रों में
उलझी हुई उलझन को
अगर तुम देख सकते
तो तुम्हे पता चलता
कि सच्चे प्रेमी के लहू में
जंग खाए हुए ब्लेड
और दीमकों की ख़ामोशी के सिवा
कुछ भी नहीं है !

तुम अगर चेहरों की चपेट में आए
भावों का भाव लगा सकते
तो तुम जान सकते
कि इनकी कीमत
ढहे हुए किले पर उगे
पीपल या बरगद के पेड़ से भी कहीं ज्यादा है !

अगर तुम्हे पता होता
एकांत के सहवास
और चुप्पी के सम्भोग से
पैदा हुए अवैध सन्नाटों की संताने
कहाँ रहतीं है ?
तो तुम मुझ तक पहुँच सकते थे !

अगर प्यास के पाँव पर पड़े छाले
और सफर में साथ चलते फासले
अपना दर्द कह सकते
तो मैं तुम्हे अपनी ठीक ठीक पहचान बता देता !

पर अफ़सोस
टूट कर प्यार करना
समय  की काँख में दबा होना होता है
और बहुत सारे
अगर और काशों की
मुठभेड़ में मारे गए आदमी का अंतिम बयान भी !

अगर तुम समझ सकते
कि कोई नहीं मरना चाहता
अगर और काशों की मार से

कोई नहीं चाहता टूटे हुए किले पर
बरगद या पीपल की तरह उगना

कोई नहीं चाहता
कि उसके खून में
जंग खाए हुए ब्लेड और दीमकों की ख़ामोशी बहे

कोई नहीं चाहता
सफर में प्यासे पाँव
फासलों को ढोते हुए चलना

कोई नहीं चाहता
समय की काँख में दबना

अगर तुम ये सब समझ सकते
तो तुम मुझसे प्यार कर रहे होते !

तुम्हारा-अनंत

बुधवार, अगस्त 06, 2014

मध्यम वर्ग की एक कमजोर कविता !!

भूख के भेस में जिंदगी
और जिंदगी की शक्ल में सपने 
चलते रहें हैं हमारे साथ 
और हम चलने के नाम पर 
ठहरे रहे हैं कहीं 
भूख और सपनों के बीच 

उजाले के भरम में 
अँधेरे को चुना है 
हर बार, बार बार
और एक गीत 
जिसका कोई खास मतलब नहीं होता
भूखे और सपनीले लोगों के लिए  
हमने खूब गाया है

उलझन को गूंदा है, चिंता को बेला है 
और मजबूरी को सेंक कर खाया है 
आजादी के बाद देश ऐसे ही चलते आया है 

दर्द का दाग तिलक सा सजाकर 
भीतर रो कर बाहर मुस्का कर 
खड़े हैं हम फैक्ट्रियों से लेकर खदानों तक 
मॉल के स्टालों से लेकर खेतों-खलिहानों तक

हमने जाना है कि दर्द एक जंगल है 
जिसमे आग लगी है 
हम बाहर निकलने के लिए गीत गा रहे हैं 
कविता लिख रहे हैं 
और नारे लगा रहे हैं 
कभी कभी हम ईश्वर का भी नाम लेते हैं
पर पहले से ज्यादा फंसते जाते हैं 
जीना मजबूरी है इसलिए हम जीते हैं 
रोटी की ढपली पर जीवन को गाते हैं

चाहने के नाम पर हमने चाहा है 
जी भर जीना 
पेट भर खाना
और नींद भर सोना
पर बहुत चाहने के बाद भी हम ये कहाँ पाते हैं

हम लोग भूख और सपनों के बीच उलझे हैं 
समझने के नाम पर बस इतना समझे हैं 

तुम्हारा- अनंत 

बुधवार, नवंबर 13, 2013

बसंत जिस गाँव में मारा गया था !!

इश्तिहारों में छपे चेहरे
जब देश की नियति तय कर रहे हों
और भ्रम की नींव पर खड़े
आज़ादी के किले ढह रहे हों
जब चौराहों पर खड़ीबैठी और चलती लाशें
जल्लादों को मसीहा बताने पर तुलीं हों
तब उस वक्त रोटी के सवालों पर लड़ता आदमी क्या करेगा ?
क्या कहेगा ?

ख़ामोशी के इस महापर्व में
क्या पसीने के साम्मान में खून बहाने वाले भी खामोश हैं  
या हमें ही नहीं सुनाई देती 
उसकी आवाजें
चीखें, और ललकारें 

उनके सवालों का लश्कर न जाने कहाँ है ?
उनके खून में बहती जलन
और सांस में बैठी घुटन का
न जाने क्या बयाँ है ?

एक नंगा सच है इस समय का कि
रीढ़ की हड्डी वाले लोग
बरदास्त नहीं है इस तिलिस्मी बसंत को
जवाबों के इस उत्सव में
सवालों के माथे पर मौत लिखी जा रही है
और जो लोग जिन्दा रहने की ज़िद में हैं
बन्दूक की नोंक पर
या देशप्रेम की झोंक पर
जंगलों में ठेले जा रहे हैं

विचारधारा के पेट में पलती नययाज़ औलादें
एक साथ पैदा हो गयीं हैं
और आदमीजिसके पास विचारधारा है
स्वयं नाजायज़ होता जा रहा है 

दोपहर की ऊब के वक्त
जब जूठी थाली की तरह पड़ा हुआ आदमी
खुद की लाश को ये समझाता है
कि यही सब कुछ तो होना थाजो हुआ है
और जो हुआ हैउसमें गलत क्या है ?
उसी वक्त उसके
खून में सना अँधेरा
उसे अधमरे सांप सा डसता है
आधा मारता हैआधा मरता है

उन्हें देखो, वो अब सरताज हैं 
वो भूख के मुंह में देशप्रेम के नारे ठूस देना चाहते हैं
शायद उन्हें नहीं मालूम
कि भूखे आदमी के लिए रोटी बड़ी है और देश छोटा
शरहदों से ज्यादा उन्हें अपने बच्चों की फिकर है
उनका राष्ट्रगान, वो लोरी है जिसे सुनकर भूखा बच्चा सोता है
उन्होंने एक लहर चलाई है, जिसमे सबकुछ चमकता दीखता है
बच्चों की लोरी, मेहनतकश का देश, उसकी रोटी, जमीन और जंगल पर
कंकरीट की कतारें, कारखानों का सैलाब और दौलत का समंदर
लहराते हुए दीखते हैं

इस बीच
उधर मुझसे और मेरी लाश से दूर खड़ा
मेरा प्यारा देश !
सपनो के जूते कसता है
कभी हँसता हैकभी रोता है
मरे हुए सूरज की लाश
अपने कंधों पर ढोता है
अधमरी रौशनी को जहर पिलाकर
बंजर जमीन पर बोता है
और मैं चीखता हूँ

क्या लोकतंत्र में यही होता है ?

भूख का इतिहास
और दर्द का भूगोल
बदलने पर विदूषक तुले हैं
और मैं सोच रहा हूँ
की हम किस माटी में ढले है ?
बसंत जिस गाँव में मारा गया था
शायद उसी गाँव में पले हैं

जिस रास्ते पर चलते चलते
गांधी एक भूल/ एक भ्रम
एक लचीला शब्द हो गए
अब तक शायद उसी पर चले हैं
रात के आगोश में
षड्यात्रों के आग में कई सूरज जलें है
उनकी लाश पर भी तिरंगा था
कंठों में राष्ट्रगान, और जहन में जवाब था
सवाल उनसे छीन  लिए गए थे
या ऊंचाई पर चढ़ने के लिए
बोझ समझ कर उन्होंने ही फेंक दिए गए थे

इस तिलिस्मी बसंत को सवाल पसंद नहीं हैं 
इसलिए या तो हमारे सवाल भी छीन लिए जायेंगे
या फिर मजबूरी में हमें उन्हें फेंकना पड़ेगा
सवालों के बिना दोनों ही सूरत में
षड्यात्रों में की आग में सूरजों का जलना तय है
इसीका मुझे भय है

उन्हें जो करना है, वो कर रहे हैं
एक-एक कर के, इस गाँव में भी बसंत मर रहे हैं
अब हम अपने पते के जवाब में कहने वाले हैं
जिस गावों में बसंत मारा था
हम उसी गाँव के रहने वाले हैं !!

तुम्हारा अनंत